नीतीश कुमार सरकार ने बिहार में शराबबंदी को पहले से भी ज्यादा सख्त करने का फैसला किया है. लेकिन उनके इस फैसले को इस बार वैसी वाहवाही नहीं मिल रही जैसी पहली बार मिली थी. बल्कि सिर्फ चार महीने पुराने कानून को बदलने के लिए लाए गए 'बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद विधेयक 2016' के चलते समाज का एक बड़ा वर्ग आशंकित और गुस्से में हैं. इस नए विधेयक को बीती दो अगस्त को बिहार विधानमंडल ने पारित किया है.

इस साल मार्च में 'बिहार उत्पाद अधिनियम (1915)' और 'बिहार प्रतिषेध अधिनियम (1938)' में संशोधन कर इनमें शराब बनाने, बेचने, इकट्ठा करने और इस्तेमाल करने पर रोक लगाने संबंधी प्रावधान शामिल कर दिये गये. इसके बाद एक अप्रैल से राज्य के ग्रामीण इलाकों में और पांच अप्रैल से पूरे राज्य में शराबबंदी का ऐलान कर दिया गया. गुजरात, नागालैंड और मणिपुर के बाद बिहार देश में चौथा राज्य है जिसने पूर्ण शराबबंदी का ऐलान किया है. नीतीश कुमार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बताते रहे हैं और केंद्र सरकार से भी लगातार मांग करते रहे हैं कि वे शराब पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम उठाएं. वे अपनी राष्ट्रीय नेता की छवि बनाने के लिए शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास करते रहे हैं ताकि आगामी आम चुनावों में देश भर की महिलाओं के वोट अपनी ओर खींच सकें.

घर में शराब पाए जाने पर सभी को दोषी मानने के प्रावधान को सही ठहराते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलील दी कि है पिछले चार महीनों में ऐसे भी उदाहरण सामने आए हैं जहां एक पिता ने अपनी नाबालिग लड़की को शराब की बोतल लाने का दोषी बता दिया

बिहार में शराबबंदी की कहानी पिछले विधान सभा चुनाव से जुड़ी हुई है. तब बिहार की महिलाओं ने नीतीश कुमार से शराब पर रोक की मांग की थी. नीतीश कुमार ने महिलाओं को भरोसा दिलाया था कि यदि उनकी सरकार बनी तो शराब पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. हालांकि ऐसा करना सरकार के लिए आसान नहीं था. शराब पर रोक लगाने से उसे एक साल में चार हजार करोड़ रुपए की चपत लगने वाली थी. लेकिन चुनाव में महिलाओं द्वारा नीतीश कुमार के पक्ष में जबरदस्त वोटिंग ने उन्हें शराबबंदी की मांग मानने पर विवश कर दिया.

कुछ लोगों का मानना है कि अप्रैल में लागू किए गए शराबबंदी कानून की विफलता इस बात से ही जाहिर होती है कि केवल चार महीने में ही सरकार को इसकी जगह एक नए और सख्त कानून की जरूरत पड़ गई. हालांकि यह नया कानून भी नीतीश सरकार के लिए मुसीबत बनता दिख रहा है क्योंकि इसके कई प्रावधानों को अव्यावहारिक और तालिबानी माना जा रहा है.

बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद विधेयक 2016 पर आपत्ति की मुख्य वजह इसके कुछ बेहद सख्त प्रावधान हैं. इनके मुताबिक घर में शराब पाए जाने पर परिवार के सभी बालिग सदस्यों सहित मकान मालिक और किरायेदार तक पर आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है; आरोप साबित होने पर कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्र कैद तक की सजा हो सकती है; आर्थिक जुर्माना एक लाख से लेकर दस लाख रूपये तक हो सकता है; यदि कोई समूह या समुदाय शराबबंदी कानून को लागू करने में अड़ंगा लगाता है तो उस पर सामूहिक जुर्माना लगाया जा सकता है. इसके अलावा राज्य में शराब के नए कारखाने लगाने पर तो रोक है लेकिन पहले से चल रहे कारखानों को बंद नहीं किया जाएगा.

इन्हीं तमाम प्रावधानों के चलते भाजपा ने इस नए विधेयक को तालिबानी और राक्षसी कानून कहा है. विधान सभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी पार्टी ने विधेयक में बदलाव के लिए दो संशोधन प्रस्ताव पेश किए थे. पहला यह कि जब राज्य में शराबबंदी है तो शराब बनाने वाले कारखानों के लाइसेंस फिर से जारी करने का प्रावधान हटाया जाए. दूसरा घर में शराब पाए जाने पर सभी बालिगों को दोषी मानने वाला प्रावधान भी हटाया जाए. लेकिन भाजपा द्वारा प्रस्तावित दोनों संशोधनों को सदन ने खारिज कर दिया.

नए विधेयक में यह भी प्रावधान है कि पुलिस बिना वारंट के भी लोगों को गिरफ्तार कर सकती है. कई लोगों का मानना है कि इसके चलते पुलिस इस कानून का दुरूपयोग कर सकती है

विधान सभा में विधेयक का विरोध कर रहे लोगों पर नीतीश कुमार ने सवाल उठाया है कि जब पहले सभी विपक्षी दल शराबबंदी के फैसले में सहयोग के लिए तैयार थे तो अब क्यों वे पीछे हट रहे हैं? उनका कहना था कि नए कानून में सिर्फ एक ही प्रावधान में सजा बढ़ाई जा रही है जबकि तीन में पिछले कानून की तुलना में सजा को कम किया गया है. घर में शराब पाए जाने पर सभी को दोषी मानने के प्रावधान को सही ठहराते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलील दी कि है पिछले चार महीनों में ऐसे भी उदाहरण सामने आए हैं जहां एक पिता ने अपनी नाबालिग लड़की को शराब की बोतल लाने का दोषी बता दिया. इसलिए कानून में सभी की जवाबदेही तय करना जरूरी है.

कानून के जानकारों का मानना है कि इस विधेयक के कई प्रावधान असंवैधानिक हैं. सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कामिनी जायसवाल कहती हैं, 'किसी भी कानून में ऐसा प्रावधान नहीं हो सकता कि घर में शराब पाए जाने पर परिवार के सभी वयस्क सदस्यों पर मुकदमा दर्ज किया जाए.' भारतीय अपराधिक कानून के हिसाब से एक व्यक्ति जिसका अपराध में सीधा हाथ नहीं है केवल तीन परिस्थतियों में सजा पा सकता है. पहला यदि व्यक्ति अपराधिक साजिश का हिस्सा हो, दूसरा अपराध को अंजाम देने के लिए साझा उद्देश्य हो और तीसरा वह उस 'गैर-कानूनी सभा' का हिस्सा हो. ऐसे में शराब पाए जाने पर पूरे पारिवार को दोषी मानने का जो प्रावधान नीतीश सरकार ने बनाया है उसके बारे में कामिनी जायसवाल कहती हैं, 'न्यायालय में चुनौती दिए जाने पर दो मिनट में यह प्रावधान रद्द कर दिया जाएगा. इस विधेयक में बिना सिर-पैर के प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका कोई भी विधि-सम्मत आधार नहीं है.'

नए विधेयक में यह भी प्रावधान है कि पुलिस बिना वारंट के भी लोगों को गिरफ्तार कर सकती है. कई लोगों का मानना है कि इसके चलते पुलिस इस कानून का दुरूपयोग कर सकती है. हालांकि इस विधेयक का समर्थन कर रहे लोगों का मानना है कि इसके दुरूपयोग की संभावनाएं पहले वाले कानून की तुलना में इसलिए कम हैं क्योंकि इसमें दुरूपयोग करने पर पुलिस अधिकारियों को भी तीन साल तक की सजा और एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान भी है. जबकि पिछले कानून में सिर्फ तीन महीने की सजा और 10 हजार रुपए जुर्माने की ही सजा तय की गई थी.

वैसे शराबबंदी की जिस जिद पर नीतीश कुमार अड़े हुए हैं, वह राज्य के लिए हितकारी भी साबित हो सकती है. बिहार में शराबबंदी के शुरूआती दौर के आपराधिक आंकड़े इस बात की ओर इशारा भी करते हैं

इस विधेयक में मौजूद बेहद कठोर सजा के प्रावधान भी इसके विरोध का एक कारण बने हुए हैं. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में तेजाब से हमला करने, नाबालिगों की तस्करी करने और महिलाओं से दुष्कर्म करने जैसे गंभीर अपराधों में जितनी सजा के प्रावधान हैं, लगभग उतनी ही सजा का प्रावधान इस कानून में भी है. पूर्ण शराबबंदी वाले गुजरात और नागालैंड जैसे अन्य राज्यों की तुलना में यह सजा काफी ज्यादा है.

तमाम विरोधों के बावजूद भी नीतीश कुमार इस विधेयक पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने बयान दिया है कि 'चाहे मैं नष्ट हो जाऊं, मैं बर्बाद हो जाऊं लेकिन इस सख्ती में कोई रियायत नहीं दी जाएगी.' उन्होंने शराब पीने वालों को चेतावनी देते हुए कहा है कि 'अगर शराब की लत नहीं छूट रही है तो कहीं और चले जाओ. यहां और कोई गुंजाइश नहीं है.'

जानकारों की मानें तो नए विधेयक में कठोर प्रावधानों को शामिल करना और इन प्रावधानों को लेकर नीतीश कुमार का जिद पर अड़ जाना दरअसल पुराने कानून की विफलता दर्शाता है. शायद इसीलिए नीतीश कुमार शराबबंदी को अब अपनी साख और प्रतिष्ठा का मुद्दा भी बना चुके हैं. पुलिस प्रशासन के बड़े हिस्से को शराबबंदी कानून को सफल बनाने के लिए लगा दिया गया है.

वैसे शराबबंदी की जिस जिद पर नीतीश कुमार अड़े हुए हैं, वह राज्य के लिए हितकारी भी साबित हो सकती है. बिहार में शराबबंदी के शुरूआती दौर के आपराधिक आंकड़े इस बात की ओर इशारा भी करते हैं. नीतीश कुमार ने हाल में ही एक अप्रैल से 25 जुलाई के बीच के आपराधिक आंकड़े जारी करते हुए बताया है कि इस दौरान गंभीर अपराधों में 12.7 फीसदी, हत्या में 35 फीसदी, अपहरण में 54 फीसदी, डकैती में 31 फीसदी और सड़क दुर्घटनाओं में 19 फीसदी की कमी दर्ज की गई है.

लेकिन नीतीश कुमार 'शराब व्यापार' के जिस विशाल पेड़ को काटने की कोशिश अब कर रहे हैं, उसका पौधा भी कभी उन्होंने ही लगाया था. साल 2005 में जब नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई थी तब शराब की बिक्री से सरकार को सिर्फ 320 करोड़ रुपए सालाना का राजस्व मिलता था. साल 2007 में नीतीश सरकार ने राज्य में नई उत्पाद नीति लागू की. इसके तहत गांवों में भी शराब की दुकानों के ठेके दिए जाने लगे और शराब की बिक्री से होने वाले राजस्व में कई गुना बढ़ोत्तरी हो गई.

नीतीश कुमार 'शराब व्यापार' के जिस विशाल पेड़ को काटने की कोशिश अब कर रहे हैं, उसका पौधा भी कभी उन्होंने ही लगाया था 

नीतीश सरकार द्वारा लाए गए इस विधेयक ने शराबबंदी पर एक नई बहस भी छेड़ दी है. हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता जीतनराम मांझी का मानना है कि शराबबंदी का फैसला आदिवासियों के धार्मिक अधिकार में दखल देता है. मांझी के इस तर्क का जवाब संविधान-निर्माण के दौरान हुई बहसों में भी मिलता है. संविधान सभा की बैठक के दौरान भी यह मुद्दा उठा था कि देश में शराबबंदी होनी चाहिए या नहीं. बहस में हिस्सा लेते हुए संविधान सभा के सदस्य महावीर त्यागी ने शराबबंदी का विरोध करते हुए यही तर्क दिया था कि अगर संविधान में शराबबंदी का प्रावधान शामिल किया जाता है तो यह आदिवासियों के धार्मिक अधिकार का उल्लंघन होगा.

इसके जवाब में ओड़िशा से संविधान सभा के सदस्य लक्ष्मीनारायण शाहू ने कहा कि सती प्रथा पर प्रतिबंध और मानव बलि पर प्रतिबंध भी लोगों के धार्मिक अधिकार में दखल देना था, लेकिन फिर भी इन पर प्रतिबंध लगाया गया. आखिर में संविधान सभा ने शराबबंदी लागू करने का फैसला राज्यों की इच्छा पर छोड़ दिया था. यह इच्छा क्या थी, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है बिहार से पहले तक सिर्फ तीन ही राज्यों ने शराबबंदी लागू थी. जानकारों की मानें तो जिन विवादित और अव्यावहारिक प्रावधानों के साथ नीतीश कुमार शराबबंदी की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, वे प्रदेश में शराबबंदी की राह को पहले से भी ज्यादा मुश्किल बना सकते हैं.