बात 2003 की है जब बतौर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर एक स्कूल के कार्यक्रम में शरीक हुए थे. इस दौरान उन्होंने एक छह साल के बच्चे को अपने सामने गुटखा खाते देखा. उन्होंने उस बच्चे को डांट लगाई और तुरंत तय किया कि गोवा में गुटखा प्रतिबंधित करना है. लेकिन उनके सामने दुविधा यह थी कि वे खुद भी गुटखा खाते थे. ऐसे में उन्होंने पहले खुद गुटखा खाना बंद किया और फिर इसे राज्य में प्रतिबंधित किया.

ऐसे कई किस्से हैं जिनसे मनोहर पर्रिकर को एक सादगी वाले और समझदार नेता की पहचान मिली थी. एक कार्यक्रम के दौरान ऐसी ही एक घटना का जिक्र करते हुए भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज बताती हैं कि एक बार गोवा के मुख्यमंत्री रहते हुए पर्रिकर राजस्थान गए. जयपुर एयरपोर्ट पर उन्हें कई अधिकारी लेने पहुंचे लेकिन वे उन्हें वहां नहीं मिले. काफी पूछताछ करने पर अधिकारियों को पता लगा कि पर्रिकर तो अपना बैग कंधे पर रखकर टैक्सी से खुद ही एयरपोर्ट से होटल जा चुके हैं.

मुंबई के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) से स्नातक करने वाले मनोहर पर्रिकर बतौर मुख्यमंत्री अमेरिका सहित कई देशों की यात्राओं पर सैंडल और हाफ शर्ट पहन कर जा चुके हैं. यहां तक कि वे अपने बेटे की शादी में भी सैंडल और हाफ शर्ट पहन कर ही शरीक हुए थे. मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे गोवा में अपने निजी मकान में ही रहते थे और जरूरत पड़ने पर कहीं भी बिना सुरक्षा के स्कूटर उठाकर चल देते थे.

2015 के जनवरी माह में उन्होंने सीधे-सीधे देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों पर एक गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया था.

उनकी इसी सादगी और कार्यशैली ने उन्हें गोवा के लोगों के दिलों में जगह दी. 2012 में उनके नेतृत्व में पहली बार गोवा में भाजपा ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी. गोवा में हुए चुनाव के बाद पता चला कि पर्रिकर के संघ से जुड़े होने के बाद भी उनकी धर्मनिरपेक्षता की वजह से वहां के ईसाइयों ने भी बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था. उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद गोवा की खनन लॉबी के खिलाफ जिस तरह का रुख अख्तियार किया उसकी तारीफ हर कोई करता है.

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 2014 में पहली बार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो वे मनोहर पर्रिकर को बतौर रक्षा मंत्री दिल्ली ले आए. उनसे पहले यह जिम्मेदारी वित्त मंत्री अरुण जेटली ही संभाल रहे थे. रक्षा मंत्री बनने के कुछ महीने बाद से ही उन्होंने कई ऐसे बयान दिए जिससे लोगों के बीच यह धारणा बनने लगी कि सूझबूझ और सादगी की मिसाल रहे पर्रिकर बड़बोले नेता की तरह बर्ताव करने लगे हैं.

2015 के जनवरी माह में उन्होंने सीधे-सीधे देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों पर एक गंभीर आरोप लगा दिया. उनका कहना था कि देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया था. उनके मुताबिक, 'देश के महत्वपूर्ण सुरक्षा हितों का निर्माण करना पड़ता है, जिसमें 20 से 30 साल का समय लगता है. दुखद है कि कुछ पूर्व प्रधानमंत्रियों ने इन हितों के साथ समझौता किया.'

मई 2015 में मनोहर पर्रिकर ने एक ऐसा बयान दिया जिसने एशिया सहित पूरे अन्तरराष्ट्रीय जगत को चौंका दिया. साथ ही इस बयान ने पाकिस्तान को बैठे बिठाए वह मौका दे दिया जिसकी उसे हमेशा से तलाश थी.

पर्रिकर ने यह बयान किस आधार पर दिया था यह तो वही जानते होंगे. लेकिन, कुछ इतिहास और राजनीति के जानकारों का कहना था कि शायद पर्रिकर यह बात भूल गए कि देश की आजादी के 14 साल बाद भारत के एक प्रधानमंत्री ने ही उनके गृह राज्य गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया था. ये लोग कहते हैं कि पर्रिकर को शायद नहीं पता कि जवाहर लाल नेहरु ने 19 दिसंबर 1961 को पुर्तगालियों पर भारत के हमले के समय क्या किया और कहा था.

इसके बाद मई 2015 में मनोहर पर्रिकर ने एक ऐसा बयान दिया जिसने एशिया सहित पूरे अन्तरराष्ट्रीय जगत को चौंका दिया. उन्होंने एक न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में कहा, 'हमें आतंकियों को आतंकियों के सहारे से ही ख़त्म करना होगा. हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? हमें ऐसा करना चाहिए.' इस बयान ने पाकिस्तान को वह मौका दे दिया जिसकी उसे हमेशा से तलाश थी. पर्रिकर ने यह बयान ऐसे समय में दिया था जब पाक की ओर से आरोप लगाया जा रहा था कि भारत अपनी खुफिया एजेंसी रॉ के जरिये बलूचिस्तान में आतंक को बढ़ावा दे रहा है. पाकिस्तान ने भारतीय रक्षा मंत्री के इस बयान को अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के सामने सबूत के तौर पर पेश किया.

देश में कुछ लोगों को भले ही यह बयान 'मुंहतोड़ जवाब देने जैसा लगा हो' और वे इससे खुश भी हुए हों, लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना था कि कूटनीतिक दृष्टि से इसका भारत की छवि पर बहुत बुरा असर पड़ा है. लेकिन रक्षा मंत्री की बेपहरवाही का आलम यह था कि इसके जवाब में हंसते हुए उन्होंने कहा कि उनके बयान से पाक को जोरदार मिर्ची लगी है.

हाल में पर्रिकर ने आमिर खान के द्वारा 2015 में दिए एक बयान पर टिप्पणी की. इस दौरान उन्होंने ये तक कह डाला कि ऐसा बयान देने वालों को सबक सिखाना जरूरी होता है.

इस बयान के लगभग एक महीने बाद ही पर्रिकर ने जयपुर में एक सेमीनार के दौरान कहा कि भारत ने पिछले 40-50 साल में कोई युद्ध नहीं लड़ा है इसलिए देश में भारतीय सेना का महत्व कम हुआ है. हालांकि, यह बात कहते ही वे तुरंत समझ गए कि उन्होंने एक बहुत बड़ी गलती कर दी है. इसलिए उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि इस बयान को युद्ध को बढ़ावा देने के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए.

इसी तरह हाल में उन्होंने अभिनेता आमिर खान का नाम लिए बिना उन पर एक टिप्पणी की. उन्होंने कहा, 'एक एक्टर का कहना था कि उनकी पत्नी भारत से बाहर जाना चाहती हैं. यह बेहद घमंड भरा और निराशाजनक बयान है.' पर्रिकर यहीं नहीं रुके उनका आगे कहना था, 'यदि कोई ऐसा बोलता है तो उसे सबक सिखाना चाहिए. जब एक्टर ने ऐसा किया तब वह एक आनलाइन ट्रेडिंग कंपनी का विज्ञापन कर रहा था. इसके बाद कंपनी ने अभिनेता से अपना विज्ञापन वापस ले लिया.'

पर्रिकर के इस बयान की वजह से जीएसटी विधेयक पारित कराने की कोशिश में लगी मोदी सरकार को संसद के दोनों सदनों में काफी विरोध झेलना पड़ा. संसद के मॉनसून सत्र के कई घंटे उनके इस बयान की भेंट चढ़ गए.

दरअसल, आमिर ने नवंबर 2015 में एक कार्यक्रम के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा था, 'किरण और मैं अपनी पूरी जिंदगी भारत में रहे हैं. पहली बार उसने कहा कि क्या हमें भारत से बाहर जाना चाहिए? किरण का यह बयान मेरे लिए डरावना और बड़ा था. उसे अपने बच्चे का डर था. वह रोज जब अखबार खोलती है तो डरती है.' आमिर के इस बयान के बाद देश भर में काफी ज्यादा हंगामा हुआ था और ई-कॉमर्स कंपनी स्नैपडील ने भी आमिर खान का ब्रांड एंबेसेडर कॉन्ट्रेक्ट रिन्यू नहीं किया था.

एक तथ्य यह भी है कि मनोहर पर्रिकर जिस असहिष्णुता के बढ़ने की बात कहने पर आमिर पर निशाना साध रहे हैं. खुद उनके ही रक्षा मंत्रालय ने माना था कि देश में असहिष्णुता बढ़ी है.

लेकिन, इससे अलग एक तथ्य यह भी है कि मनोहर पर्रिकर जिस असहिष्णुता के बढ़ने की बात कहने पर आमिर पर निशाना साध रहे हैं. खुद उनके ही रक्षा मंत्रालय ने माना था कि देश में असहिष्णुता बढ़ी है. रक्षा मंत्रालय का थिंक-टैंक कहे जाने वाले 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफेन्स स्टडीज एंड एनालिसिस' (आईडीएसए), जिसके एक सदस्य रक्षा मंत्री खुद हैं, ने बीते 9 दिसंबर को आंतरिक सुरक्षा पर एक राष्ट्रीय सम्मलेन का आयोजन किया था. इस सम्मेलन के लिए तैयार किये गए 'कांसेप्ट नोट' में कहा गया था कि देश में 'धार्मिक असहिष्णुता और भड़काऊ प्रवृत्ति' बढ़ी है.

इन बयानों के अलावा भी मनोहर पर्रिकर ने पिछले दो सालों में ऐसे कई बयान दिए हैं जिनकी उम्मीद उनकी पहले की छवि को देखते हुए, उनसे नहीं की जा सकती थी. इन बयानों के कारण ही जिन पर्रिकर को उनकी सादगी, सौम्यता और काबिलियत के लिए जाना जाता था अब उन्हें अपने विवादित बयानों के लिए जाना जाने लगा है.

लेकिन, इन सभी विवादों के बाद सवाल उठता है कि आखिर क्यों पर्रिकर गोवा से दिल्ली आते-आते बदल गए. इस बारे में कुछ लोग कहते हैं कि पर्रिकर हमेशा से ही ऐसे बड़बोले थे लेकिन दिल्ली से दूर एक छोटे राज्य के मुख्यमंत्री होने की वजह से उनके बयान मीडिया में नहीं आ पाते थे. ये लोग उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मनोहर पर्रिकर ने गोवा का मुख्यमंत्री रहते हुए भारत को हिंदुओं का देश कहने और यहां के मुसलमानों को भी बाहर हिंदू कहे जाने जैसा विवादित बयान दिया था. इसके अलावा उन्होंने अमेरिका जाकर गोवा के कैथोलिक ईसाईयों को हिंदू बता दिया था जिस पर कई विदेशी संस्थाओं और लोगों ने अपना विरोध दर्ज कराया था.

जानकारों की मानें तो रक्षा मंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को बहुत नाप-तौल कर बोलना पड़ता है. ऐसे में पर्रिकर गोवा और दिल्ली में फर्क बताकर अपने गलत बयानों का बचाव नहीं कर सकते. क्योकि ऐसे बयान कूटनीतिक तौर पर भी भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.

कुछ जानकार उनके बड़बोले स्वभाव के पीछे उनकी सादगी और गोवा की पृष्ठभूमि को जिम्मेदार मानते हैं. इनका कहना है कि गोवा के सादगी भरे, मस्तमौला माहौल में रहने की वजह से वे ऐसे हैं. वे जिन बातों को बेहद सहजता से गोवा में बोल सकते थे वही बातें दिल्ली में हंगामा बरपा देती हैं. इस बात को पर्रिकर की एक बात भी मजबूती देती है. पिछले महीने उन्होंने खुद माना था कि वे गोवा में सहज महसूस करते हैं और दिल्ली में उन्हें मजाक करते हुए भी डर लगता है. उनका कहना था कि जब वे गोवा में भाषण देते थे और मजाक करते थे तो कभी कोई मुद्दा नहीं बना लेकिन दिल्ली में उनकी किसी भी बात का गलत अर्थ निकाला जा सकता है.

अपने बयानों के बारे में मनोहर पर्रिकर की राय चाहे जो भी हो लेकिन एक तथ्य यह है कि केंद्र सरकार में जिन मंत्रालयों को बेहद अहम माना जाता है, उनमें से एक उनके पास है. जानकारों की मानें तो रक्षा मंत्री एक ऐसा पद है जिस पर बैठे व्यक्ति को बहुत नाप-तौल कर बोलना पड़ता है. ऐसे में पर्रिकर का यह कहकर अपने गलत बयानों का बचाव करना कि यह गोवा और दिल्ली का फर्क है, कहीं से भी ठीक नहीं कहा जा सकता. बतौर मुख्यमंत्री अगर वे कुछ बोलते तो उस पर टीका-टिप्पणी देश के अंदर होती. लेकिन अगर वे भारत के रक्षा मंत्री के तौर पर कोई हल्का बयान देंगे तो उससे कूटनीतिक तौर पर भी भारत की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.