केंद्र सरकार के साथ लंबी तकरार के बाद बिहार सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को राज्य में लागू करने के लिए हामी भर दी है. केंद्र और राज्य के बीच चली तकरार की मुख्य वजहें योजना का नाम और प्रीमियम दर थे. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने योजना का नाम ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ रखे जाने पर आपत्ति जताई थी. उनके मुताबिक जब केंद्र और राज्य दोनों को इस योजना के लिए बराबर मात्रा में धन खर्च करना है तो योजना का नाम ‘पीएम-सीएम फसल बीमा योजना’ क्यों ना हो! इसके अलावा बिहार सरकार ने प्रीमियम की दरों को लेकर बिहार के साथ भेदभाव पर भी आपत्ति जता रही थी.

पिछले दिनों नीतीश कुमार सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर केंद्र के साथ तकरार इस हद तक पहुंच चुकी थी कि उनकी पार्टी - जनता दल यूनाईटेड - योजना का नाम बदलने को लेकर गैर-एनडीए मुख्यमंत्रियों से समर्थन मांगने की बात भी करने लगी थी. दूसरी ओर बिहार से सांसद और केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह योजना का नाम बदले जाने की मांग को बेतुका बता रहे थे. उनका कहना था कि इसे लागू करने वाले दूसरे 22 राज्यों ने इस पर कभी आपत्ति जाहिर नहीं की है

इसके पीछे कई राजनीतिक और आर्थिक वजहें भी हैं जिसने नीतीश कुमार जैसी शख्सियत को अपनी बातों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है.

योजना के प्रावधानों पर आपत्ति के बावजूद नीतीश सरकार ने पिछले दिनों इसके लिए हां कर कर दी. नीतीश कुमार हालिया दिनों में अपनी छवि को लेकर बेहद संजीदा रहे हैं. उनके ही मुताबिक वे अपनी बातों से पीछे हटने वालों में से भी नहीं है. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि वे अपनी बात से पीछे हट गए!

बिहार सरकार आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को राज्य में लागू करने के पीछे किसानों का हित बता रही है. बिहार के सहकारिता मंत्री आलोक कुमार मेहता का कहना है कि इस योजना में कई कमियां हैं. इसके बावजूद किसानों के हित में प्रायोगिक तौर पर केवल खरीफ फसल के लिए इसे लागू करने का फैसला किया गया है. वे खरीफ फसल के बाद योजना का व्यापक मूल्यांकन किए जाने की बात भी करते हैं, जिसमें यह देखा जाएगा कि योजना का वास्तविक लाभ किसानों को मिला है या नहीं. साथ ही यह भी देखना होगा कि सरकार और किसान का जो पैसा बीमा का प्रीमियम देने में लगा है, उसका कितना हिस्सा क्षतिपूर्ति के रूप में किसानों को मिलता है.

बिहार सरकार भले ही योजना को लागू किए जाने के पीछे किसानों का हित बता रही हो. लेकिन बात केवल इतनी भी नहीं है. इसके पीछे कई राजनीतिक और आर्थिक वजहें और भी हैं जिसने नीतीश कुमार जैसी शख्सियत को अपनी बातों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है.

साल 2000 में खनिज संपन्न झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला राज्य बन गया है. बिहार की लगभग दो- तिहाई आबादी का मुख्य पेशा खेती है. उद्योग- धंधों के अभाव में राज्य से बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए पलायन करने पर मजबूर है. राज्य की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि मानसून के दिनों में उत्तरी बिहार के अधिकांश जिलों में बाढ़ आ जाती है. जबकि दक्षिण बिहार के इलाके बारिश की कमी के कारण सूखे की चपेट में आ जाते हैं. यानी राज्य एक साथ बाढ़ और सूखे का अभिशाप झेलने के लिए मजबूर है.

पिछले विधानसभा चुनाव में कस्बों और गांवों की उनकी जनसभाओं में सिर्फ कुछ हजार लोग ही आते थे जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं मे भारी भीड़ उमड़ती थी.

ऐसे हालात में राज्य के अधिकतर किसान हर बार फसल बर्बाद होने के डर के साथ खेती करते हैं. इन परस्थितियों में अगर नीतीश सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू करने से पीछे हटती तो यह निर्णय उसेके ही खिलाफ जाता. राज्य की जनता में यह बात जाती कि सरकार राजनीति के चक्कर में उसके हितों के साथ खिलवाड़ कर रही है. इससे विपक्ष को शराबबंदी कानून के बाद सरकार के खिलाफ एक और मुद्दा मिल जाता. इस मुद्दे पर वह पहले ही काफी हंगामा करता रहा है. भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने तो योजना लागू नहीं करने की स्थिति में सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने तक की धमकी दे दी थी.

ऐसे में नीतीश कुमार बैठे-बैठाए विपक्ष को एक और मुद्दा नहीं देना चाहते थे. इसके अलावा वे यह भी जानते हैं कि उनका वोट बैंक कहां हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कस्बों और गांवों की उनकी जनसभाओं में सिर्फ कुछ हजार लोग ही आते थे जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं मे भारी भीड़ उमड़ती थी. नीतीश कुमार जानते हैं कि उनका राजनीतिक आधार गांव ही है. इसलिए वे समता और न्याय की बात लगातार दोहराते रहते हैं.

बिहार की जनसांख्यिकी से जुड़े कुछ आंकड़े देखने पर भी यह बात साफ हो जाती है कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर अपनी बात से पीछे क्यों हट गए. साल 2011 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक राज्य में कुल आबादी का 89 फीसदी हिस्सा गांवों में रहता है. इसमें करीब तीन-चौथाई आबादी किसानों और खेतिहर मजदूरों की हैं. इनके खिलाफ जाने की हिम्मत नीतीश कुमार नहीं कर सकते हैं. छात्र राजनीति से लेकर मुख्यधारा की राजनीति में लंबा समय बिता चुके नीतीश कुमार इतना तो समझते ही हैं कि नाम में इतना भी नहीं कुछ रखा है कि अपनी राजनीति ही उसके लिए दांव पर लगा दी जाए.