आपने बावरिया जनजाति समुदाय पर आधारित, विशेष रिपोर्ट (बावरिया जनजाति : हम-आप जैसे ही इंसान जिन्हें राक्षस मान लिया गया है ) में यथार्थ का अत्यंत मार्मिक, हृदयस्पर्शी एवं गंभीर तथ्यों के आधार जो वर्णन किया है, उसके लिए आपका अभिवादन!

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सोने की चिड़िया कहा जाने वाला यह जम्बूदीप (भारत देश) यहां के मूलनिवासियों द्वारा एक समय सुखमय, शांतिमय और समृद्धिशाली और अखंड देश बनाकर रखा गया था. उस समय यह पूरी दुनिया में एक मिसाल था. बाद में विदेशी आक्रांताओं ने यहां की संस्कृति, सभ्यता, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आदि को वर्णाश्रम के आधार पर विघटित कर दिया. भारतीय समाज के मूलनिवासियों को एक लंबी साजिश के तहत साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाकर अलग-अलग बांट दिया.

इसके चलते वे आज अपने ही देश में बेगाने हो गए हैं और अपनी पहचान के मोहताज हैं. जातिओं/उपजातियों में विभक्त इस मूलनिवासी कौम के लोगों का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इनके पूर्वजों ने इस देश की एकता-अखंडता और समृद्धि की सुरक्षा अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर की थी. इन्हीं के वंशज आज अमानवीय शोषण और उत्पीड़न के शिकार होकर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं और भारतीयता के परिचय के लिए तरस रहे हैं.

इस भारतीय लोकतंत्र में जहां समता, स्वतंत्रता, प्रेम, बंधुत्व और न्याय पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था की बात की जाती है वहीं इन लोगों के मूल अधिकारों का हनन किया जाता है. ऐसा उनके साथ सामूहिक रूप से किया जाता है. एक पूरे समूह या जाति को अवैधानिक रूप से अपराधिक गैंग घोषित कर दिया जाता है. बावरिया जाति भी इसी तरह के शोषण का शिकार हुई है.

आज आजादी के इतने वर्षों के बाद भी प्रशासन की उपेक्षा के चलते कई जातियों के खिलाफ (ब्रिटिशकाल के समान) काला कानून /आईपीसी /सीआरपीसी के अधिनियमों का दुरुपयोग किया जाता है.

आज इन्हीं जातियों की तरह अन्य विमुक्त जातियां जैसे बंजारा, नट, केवट, भर, बागरी, अहेरिया, बहेलिया, कंजर, कंकाली, बहुरूपिया, ओध, कंमैलिया, सपेरा आदि प्रशासनिक उपेक्षा के कारण गुलाम, लाचार व बेबस होकर गुमनामी की जिंदगी जीने पर मजबूर हैं.

यह दुर्भाग्य ही है कि प्रशासन-सत्ता की मिलीभगत से षड्यंत्र कर इन जातियों को उनके अधिकारों से वंचित कर मानसिक गुलामी की जंजीरों में जकड़ कर रखा गया है. इसमें से जाने कितने निराश्रित, बेबस, निरीह, मजलूम लोग हैं जिनका पेट भी खाली है और दिमाग भी खाली. इनके पास न रहने का ठिकाना है, न ही जल, जमीन, जंगल है. ऐसे लोगों को इस लोकतांत्रिक प्रणाली से देश की मुख्यधारा में समाहित करने का, समाज व सरकारी स्तर पर संवैधानिक संरक्षण देने का सार्थक प्रयास होगा अथवा सामूहिक रूप से जाति के नाम पर सम्मान और जाति के नाम पर अपमान ही दिया जाता रहेगा?

डॉ पंचम राजभर , आजमगढ़, उत्तर प्रदेश


बिहार में शराबबंदी पर आपकी राय (शराबबंदी कानून के ‘तालिबानी’ प्रावधान नीतीश कुमार की सदिच्छा से निकले हैं या जिद से?) पढ़ी. चाहे सदिच्छा से निकली हो या जिद से लेकिन, शराबबंदी नीतीश कुमार सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. विपक्षी दलों द्वारा इस कानून का विरोध करना सिर्फ विशेष वर्ग के साथ झूठी हमदर्दी दिखाकर अपना वोट बैंक बढ़ाना है.

हां, किसी घर में शराब मिलने पर उस परिवार के सभी सदस्यों को सजा देना तर्कपूर्ण नहीं है. इसके पीछे नीतीश कुमार की मंशा यह हो सकती है कि यदि परिवार के सभी सदस्यों को सजा की बात की जाएगी तो डर, पीने वालों के साथ-साथ उसके परिवार के सभी लोगों को होगा और वे उसे ऐसा करने से रोकेंगे. पीने वालों को यह डर भी रहेगा कि मेरे कारण और लोगों को भी जेल की हवा खानी पड़ सकती है. कुल मिलाकर इन कदमों से शराबबंदी पर अंकुश लगेगा और परिणामस्वरूप अन्य अपराधों पर लगाम लगेगी. (lalan.singh34@gmail.com)


वाह! क्या आलेख (क्या सिर्फ वीर्यदान से कोई पिता बन सकता है?) है. मैंने अब तक जो भी, जहां भी पढ़ा है, संभवतः यह सबसे बेहतरीन लेख है. ऐसा लगता है जैसे यह लेख किसी समर्पित मां ने लिखा है (मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन उससे कुछ बदल नहीं जाएगा). इस लेख में प्रस्तुत की गई भावनाओं को मेरा सलाम! इस लेख का हर शब्द भारतीय पिताओं पर पूरी तरह लागू किया जा सकता है.

एक पिता के तौर पर मैंने हमेशा सबसे बढ़िया करने की कोशिश की है, जब मेरा बच्चा एक शिशु था तब भी और अब भी जब वह छोटा है और हम पर निर्भर है. मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता सकता हूं कि यह जानना कि आपका बच्चा आपको अपनी मां के बराबर ही प्यार करता है, एक ऐसी सुखद अनुभूति है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता. बच्चे को आप जितना प्यार देते हैं उससे कई गुना अधिक आपको वापस मिलता है. (kumar.anirudha@gmail.com)


सत्याग्रह पर मृणाल पांडे का आलेख (उत्तराखंड के इस गांव ने हनुमान को आज तक माफ नहीं किया, न ही उन्हें मंदिरों में जगह दी!) पढ़ा. जहां तक मैं सोच पाता हूं मुझे यह एक हास्यास्पद कहानी के सिवा कुछ नहीं लगता. सुदूर लंका में रातों-रात मीटिंग हुई. सुबह से पहले संजीवनी लानी थी. हनुमान वायु की गति से जाते हैं और सुबह होने से पहले पूरा पहाड़ लेकर लंका पहुंच जाते हैं. उस जमाने में न कोई संवाद माध्यम था, न कोई तार... न टेलीग्राम, न फोन, न इंटरनेट. तो अब सवाल उठता है कि गांव वालों को रातों-रात कैसे पता चला कि हनुमान आ रहे हैं? उस जमाने में पहाड़ को कैसे और किन चीजों से ढका गया. यह घटना सरासर काल्पनिक है. (j.khurshid1982@gmail.com)


उत्तराखंड के इस गांव ने हनुमान को आज तक माफ नहीं किया, न ही उन्हें मंदिरों में जगह दी! पढ़ते हुए ख्याल आया कि एक कोशिश तो बनती हैं पुराणों के सत्य को परखने की.सरकार का कदम स्वागत योग्य है. और आपका आभार इतनी रोचक कथा को प्रस्तुत करने के लिए.

अनुराग भारद्वाज (anuragb8@gmail.com)