उर्दू आलोचक शमीम हनफी इस्मत चुगतई को अपने जमाने की सबसे मशहूर लेखिका कहते हैं. हालांकि उनके साथ उस वक़्त मंटो भी लिख रहे थे, राजेंदर सिंह बेदी और कृशनचंदर भी. मंटो इस्मत के दोस्त होने के साथ-साथ उनकी टक्कर के लेखक भी थे. स्त्री मुद्दों पर भी उनका लेखन इस्मत से कमतर न था, पर फिर भी हनफी अगर इस्मत को सबसे मशहूर बताते हैं तो इसके पीछे उनकी जिद, स्वाभिमान और स्त्रियों के हुकूक के लिए खड़े होनेवाली छवि का बहुत बड़ा योगदान माना जा सकता है. यह छवि इस्मत के रचे कई किरदारों में खूब झलकती है. जैसे उनके उपन्यास ‘टेढ़ी लकीर’ की मुख्य किरदार शम्मन.

इस्मत चुगतई ने बाकायदा अपनी आत्मकथा लिखी है - ‘कागजी है पैरहन’ पर बावजूद इसके ‘टेढ़ी लकीर’ को हमेशा उनकी आत्मकथा की तरह पढ़ा जाता रहा. कारण यह कि इसकी नायिका शम्मन की जिंदगी और उसकी शख्सियत इस्मत चुगतई के जीवन और स्वभाव से बहुत ज्यादा करीब दिखती है. इतनी कि लोगबाग शम्मन में उनका अक्स ढूंढ़ते थे और उनमें उस शम्मन को तलाशते रहे.

इस्मत ‘टेढ़ी लकीर’ की शम्मन के बारे में कहती हैं, ‘ मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है. उसके साथ आंसू बहाए हैं और कहकहे लगाए हैं. उसकी कमजोरियों से जल भी उठी हूं, उसकी हिम्मत की दाद भी दी है’

अगर यह टेढ़ी लकीर उपन्यास होने के साथ-साथ आत्मकथा होने का भरम देती है तो इसमें दोष इस्मत की बेतकल्लुफ सी उस लगाववादी शैली का भी है जिससे वे शम्मन से एकमेक हुई जाती हैं. टेढ़ी लकीर को अपनी आत्मकथा कहे जाने के सवाल पर इस्मत का कहना था – ‘मुझे खुद से भी यह आपबीती ही लगती है. मैंने इस नॉवेल को लिखते वक्त बहुत कुछ महसूस किया. मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है. उसके साथ आंसू बहाए हैं और कहकहे लगाए हैं. उसकी कमजोरियों से जल भी उठी हूं, उसकी हिम्मत की दाद भी दी है. उसकी नादानियों पर रहम भी आया है और शरारतों पर प्यार भी आया है. उसके इश्क-ओ-मुहब्बत के कारनामों पर चटखारे भी लिए हैं और हसरतों पर दुःख भी हुआ है. ऐसी हालत में अगर मैं कहूं कि ये मेरी आपबीती है तो कुछ ज़्यादा मुबालगा (गलत) तो नहीं. और, जगबीती और आपबीती में भी तो बाल बराबर का फ़र्क होता है...’

बहरहाल यह पूरी तरह से इस्मत की आपबीती हो कि न हो पर इस्मत इसमें बहुत हैं, अपनी आत्मकथा से तनिक भी कम नहीं. यह बात उन्हें पढ़ने-जाननेवाले अच्छी तरह जानते हैं, और इस्मत जैसी हिम्मती और साफ़-दृष्टि की लेखिका को यह सफाई देनी पड़ी तो शायद इसी खातिर. वैसे सच कहा जाए तो शम्मन की कहानी सिर्फ एक लड़की की कहानी या जिंदगी नहीं है. यह आग के गोले के लड़की के जिस्म में रहने और खुद को इसमें जलाते-तपाते और फिर से खुद को रचते रहने की गाथा है. यह उन हजारों लड़कियों की कहानी है जो उस दौर में पैदा हुई थीं जब पाबंदियों और गुमनामियों के बीच उनका वर्तमान और भविष्य अधर में लटक रहा था. यह उस लड़की की कहानी है जो आजादी के सपने और ख्वाब मन ही मन देख-गुन रही थी.

जहां लड़की और उस जमाने की मुस्लिम परिवार की लड़की का मतलब खाना पकाने, बच्चे जनने और उन्हें पालने वाली औरत के सिवाय और कुछ हो ही नहीं सकता था, इस्मत लड़कियों की शिक्षा की बात करती हैं और खुद की शिक्षा भी पूरी करती हैं. इस्मत ने ईमानदारी से उस जमाने की उन स्त्रियों की तस्वीर पन्नों में खींचकर रख दी है. खुद उन्हीं के शब्दों में कहें तो – ‘ताकि आने वाली लड़कियां उससे मुलाकात कर सकें और समझ सकें कि एक लकीर क्यों टेढ़ी होती है और क्यों सीधी हो जाती है. और अपनी बच्चियों के रास्ते को उलझाने के बजाय सुलझा सकें और अपनी बेटियों की दोस्त और रहनुमा बन सकें...‘शम्मन’ जिंदा ही नहीं है, जानदार है. उस पर मुख्तलिफ हमले होते हैं लेकिन हर हमले के बाद वह फिर हिम्मत बांधकर सलामत उठ खड़ी होती है. वह हरबार दिल से सोच-विचार करने के बाद दूसरा कदम उठाती है. यह उसका क़सूर नहीं है कि वह बेहद हस्सास (स्वाभिमानी) है और हर चोट पर मुंह के बल गिरती है मगर संभल जाती है.’

लिहाफ लिखे जाने के बरसों बाद जब किसी मजलिस में इस्मत का बेगम साहिबा से सामना हुआ तो उन्होंने सोचा कि अब तो उनकी खैर नहीं. पर बेगम ने आगे बढ़कर उन्हें गले से लगा लिया

और शम्मन की सबसे बड़ी बदनसीबी है तो यह कि कोई उसे समझ नहीं पाता. हालांकि यह मुश्किल एक जमाने से अब तक तमाम स्त्रियों की रही है. वह प्यार, मुहब्बत और दोस्ती की भूखी है और इन्हीं की तलाश में जिन्दगी के भयानक जंगलों की खाक छानती फिरती है. उसका दूसरा गंभीर जुर्म उसकी जिद है और यही उसकी ख़ूबी भी है. हथियार डाल देना उसकी फितरत और आदतों में शामिल नहीं है. गौर करें तो व्यावहारिक रूप से अहमकाना समझी जाने वाली ये सारी आदतें इस्मत की भी रही हैं. कहानी ‘लिहाफ’ के लिए हजार झमेलों को झेलने के बावजूद अपनी कलम की बेबाकी की जिद पर अड़े रहना, औरतों के हक और हुकूक की बातें लिखते रहना, उस लड़ाई में अपनी जान और सामाजिक छवि की परवाह किए बगैर जुटे रहना. यह इस्मत के भीतर बैठी शम्मन के सिवाय और कौन कर सकता था?

कई बार हम ही नहीं रचते किरदार, किरदार भी हमें बना बिगाड़ रहे होते हैं. टेढ़ी लकीर में इस्मत भले ही अपने समय की स्त्रियों की कहानी कहने के लिए अपनी जिंदगी को प्लॉट में रखकर एक अलग किरदार शम्मन को रचती हैं पर इस क्रम में एक नए सिरे से खुद को रचने लगती हैं. या फिर यह शम्मन उनमें घुस आती है चुपचाप, बिना कुछ कहे-सुने. इसे ही कहानी का यथार्थ होना कहते हैं और यथार्थ का कहानी में तब्दील हो जाना.

यह सोचने की बात है कि आज से लगभग सत्तर वर्ष पहले उनकी कहानी ‘लिहाफ’ आई थी. लिहाफ के रचे जाने का समय सन 1941 है. उस जमाने में लिहाफ के कथानक के केंद्र में वह समलैंगिकता थी जो सार्वजनिकतौर पर आज भी वर्जित विषय है. तब तो यह कोरे दुस्साहस के सिवा और भला क्या हो सकता था लेकिन अब दुस्साहस किया था तो उसकी कीमत भी चुकानी ही थी. इसे इस्मत कोर्ट के चक्कर लगाकर चुकाती रहीं. उन्होंने आज से करीब 70 साल पहले महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी रचनाओं में बेबाकी से उठाया और सुनती-कहती रही तो सिर्फ अपने दिल की. पुरुष प्रधान समाज में उन मुद्दों को चुटीले और संजीदा ढंग से पेश करने का जोखिम भी उठाती रहीं तो सिर्फ इसी खातिर. यहां इस बात को हम ‘लिहाफ’ के इस अंश से समझ सकते हैं - ‘जब मैं छोटी-सी थी और दिनभर भाइयों और उनके दोस्तों के साथ मार-कुटाई में गुजार दिया करती थी. कभी कभी मुझे ख्याल आता कि मैं कमबख्त इतनी लड़ाका क्यों थी? उस उम्र में जबकि मेरी और बहनें आशिक जमा कर रही थी. मैं अपने पराये हर लड़के और लड़की से जूतम-पैजार में मशगूल थी.

‘लिहाफ’ बच्चों के यौन शोषण के उस मुद्दे की ओर उंगलियां दिखाती है जहां हमारी कल्पना भी नहीं जाती. यह इस कहानी की एक गौरतलब बात थी जिसपर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया गया

अम्मां को हमेशा से मेरा लड़कों के साथ खेलना नापसन्द रहा. भला लड़के क्या शेर-चीते हैं जो निगल जाएंगे उनकी लाडली को? और लड़के भी कौन, खुद भाई और दो चार सड़े-सड़ाये जरा-जरा से उनके दोस्त! मगर नहीं, वह तो औरत जात को सात तालों में रखने की कायल और यहां बेगम जान की वह दहशत कि दुनिया-भर के गुण्डों से नहीं. बस चलता तो उस वक्त सड़क पर भाग जाती, पर वहां न टिकती...’

लिहाफ बच्चों के यौन शोषण के उस मुद्दे की ओर उंगलियां दिखाती है जहां हमारी कल्पना भी नहीं जाती. यह इस कहानी की एक गौरतलब बात थी जिसपर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया गया और हम सब समलैंगिकता के तीतर के पीछे दौड़ लगाते रहे. इस्मत हौले से ही ऐसी बातें कह जाती थीं जिन्हें कहना बहुत जरूरी होता था.

अपने इन कटु अनुभवों के बावजूद कहानी लिखते वक़्त वे बेगम के चरित्र के प्रति तनिक भी कटु नहीं होतीं. यह एक रचनाकार की विदेहता है, उसका वह फर्ज जिसे बहुत कम रचनाकार निभा पाते हैं. वे एक बच्ची की उस पीड़ा को भुलाकर जनानाखाने में अकेली जीती बेगम और उनकी बांदी के रिश्ते को एक तर्क और एक वजह देती हैं. ये इस्मत के अपने अनुभव थे और ये बातें उन्होंने खुद स्वीकारी हैं. ‘कागजी है पैरहन’ का एक प्रसंग भी इस ओर साफ इशारा करता है.

लिहाफ लिखे जाने के बरसों बाद जब किसी मजलिस में इस्मत का बेगम साहिबा से सामना हुआ तो उन्होंने सोचा कि अब तो उनकी खैर नहीं. पर बेगम ने आगे बढ़कर उन्हें गले से लगा लिया था. दरअसल बेगम साहिबा अब उस नरक से निकलकर एक शानदार गृहस्थी के सुख को जी रही थीं.

इस्मत चुगतई ने शहरी जीवन में महिलाओं के मुद्दे पर सरल, प्रभावी और मुहावरेदार भाषा में ठीक उसी प्रकार से लेखन कार्य किया है जिस प्रकार प्रेमचंद ने देहात के पात्रों को अपने लेखन में उतारा था

यह कहना इस्मत के लेखन को छोटा करना होगा कि उन्होंने स्त्री विषयक कहानियां ही लिखीं. उनके लेखन का कैनवास बहुत बड़ा है, जिसमें न जाने कितने विषय एक दूसरे के पीछे कतार बनाए चले आते हैं. बड़े आलोचकों की कही कहें तो इस्मत चुगतई ने शहरी जीवन में महिलाओं के मुद्दे पर सरल, प्रभावी और मुहावरेदार भाषा में ठीक उसी प्रकार से लेखन कार्य किया है जिस प्रकार प्रेमचंद ने देहात के पात्रों को अपने लेखन में उतारा था.

इस्मत के अफसानों की औरतें अपने अस्तित्व की लड़ाई से जुड़े मुद्दे उठाती हैं और इसके लिए खूब लड़ती भी हैं. कई बार ये पात्र लड़ने के बजाय तटस्थ वर्णन का एक हिस्साभर होते हैं, कहानी की एक नामालूम कड़ी की तरह पर ये यथास्थितियां भी सोचने और उकसाने का कारक बनती हैं और इस तरह से भी इस्मत ने अपने लेखन में जरूरी बातें कही थीं.