हाल ही में खबर आई कि बरेली के धनेली गांव की 6-12वीं कक्षा तक की 50 लड़कियों ने, छेड़छाड़ और यौन हिंसा के डर से स्कूल से अपना नाम कटा लिया है. इसी तरह कुछ समय पहले हरियाणा के रेवाड़ी जिले में एक गांव की 40 लड़कियों ने स्कूल के रास्ते में बलात्कार के डर के चलते स्कूल से नाम कटाया था. इन 40 में से दो लड़कियां राज्य स्तर की कबड़्डी चैंपियन थीं. पिछले साल बरेली की मीरगंज तहसील के 12 गांवों की लगभग 200 लड़कियों ने स्थानीय युवाओं द्वारा यौन हिंसा के डर से स्कूल जाना छोड़ दिया था.

सड़क, बाइक या कार दुर्घटना में मौत के बाद भी आस-पास के लोग पैदल चलना या बाइक और कार चलाना नहीं छोड़ते. फिर बलात्कार के बाद लड़कियों ने स्कूल क्यों छोड़ दिए? बलात्कार के बाद पूरा शरीर साबुत होता है और दिमाग भी कोमा में नहीं चला जाता (यदि बलात्कार से अलग कोई वीभत्स क्रूरता न की गई हो तो). फिर बलात्कार के बाद सामाजिक जीवन से ऐसा पलायन क्यों?

परिवारों ने अपनी सुविधा के हिसाब से घर के भीतर होने वाले बलात्कारों को मामूली घटना और सार्वजनिक बलात्कारों को भयंकर दुर्घटना की तरह प्रचारित किया है जबकि किसी भी लड़की के लिए बलात्कार की पीड़ा समान ही होती है

नेशनल क्राइम रिकार्ड के अनुसार 2014 में होने वाले कुल बलात्कारों में 86 प्रतिशत बलात्कार जान-पहचान के लोगों ने किये थे. बलात्कार के 674 मामलों में सगे-संबंधी शामिल थे. 966 मामलों में करीबी पारिवारिक सदस्य, 2,217 में रिश्तेदार और 8,344 मामलों में पड़ोसी शामिल थे. अहम सवाल यह है कि घरों में होने वाले बलात्कार की इन घटनाओं के बाद जब लड़कियों ने घर नहीं छोड़े तो वे स्कूल क्यों छोड़ रही हैं. क्या किसी अंजान व्यक्ति द्वारा किये गए बलात्कार की तकलीफ परिचित द्वारा किये गए बलात्कार से कम होती है?

तार्किक तरीके से देखा जाए तो परिवार और जान-पहचान के लोगों द्वारा दिये गए धोखे ज्यादा तकलीफ और दर्द देते हैं. लेकिन घर के भीतर होने वाले बलात्कारों में चूंकि घर-परिवार के लोग शामिल होते हैं तो ऐसे में पीड़िता की इज्जत लुटी हुई नहीं समझी जाती और इसे घर का मामला कहकर वहीं खत्म करने की कोशिश की जाती है. धीरे-धीरे पीड़िता भी इससे निकल आती है क्योंकि पूरा परिवार ऐसा व्यवहार करता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

परिवारों ने अपनी सुविधा के हिसाब से घर के भीतर होने वाले बलात्कारों को मामूली घटना और सार्वजनिक बलात्कारों को भयंकर दुर्घटना की तरह प्रचारित किया है जबकि किसी भी लड़की के लिए बलात्कार की पीड़ा समान ही होगी, फिर चाहे वह किसी परिचित ने किया हो या किसी अनजान ने. ऐसा क्यों है कि परिवार के भीतर होने वाले बलात्कारों में लड़की की इज्जत पर कोई आंच नहीं आती, जबकी सार्वजनिक बलात्कार में इज्जत इतनी बड़ी बन जाती है कि लड़की का सामान्य जीवन ही खत्म हो जाता है? बलात्कार करने वाले (घर-बाहर दोनों के ही) आदमियों की इज्जत कभी लुटते नहीं सुनी. इसी से शक होता है कि उनकी इज्जत होती भी है या नहीं.

इज्जत’ शब्द के उच्चारण मात्र से जहन में महिला की छवि घूम जाती है, जैसे इज्जत शब्द महिला का ही पर्यायवाची है. ‘इज्जत का प्रेत‘ महिलाओं के सिर पर चौबीसों घंटे, ताउम्र सवार रहता है. यह ‘प्रेत‘ उनकी ‘योनि‘ (जिसे कि ‘सृजन द्वार‘ कहना चाहिए) में कुंडली मारकर बैठा रहता है. जैसे ही कोई ‘अंजान पुरुष‘ महिलाओं के ‘सृजन द्वार‘ में जबरन प्रवेश करता है, ‘इज्जत का प्रेत‘ सरपट उनकी देह छोड़कर भाग जाता है. इधर इज्जत के प्रेत ने किसी महिला की देह छोड़ी, उधर उसका सांसें लेना भारी !

बलात्कार करने वाले (घर-बाहर दोनों के ही) आदमियों की इज्जत कभी लुटते नहीं सुनी. इसी से शक होता है कि उनकी इज्जत होती भी है या नहीं

निहायत आश्चर्य व अफसोस की बात है कि आज भी लेखकों, विचारकों, चिंतकों, पत्रकारों आदि से बनने वाले बौद्धिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा बलात्कार की शिकार महिला के लिए लेखन और सोच में ‘इज्जत लुट गई‘, ‘अस्मत तार-तार हो गई‘ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है. राष्ट्रीय अखबारों और स्तरीय पत्रिकाओं में भी यही शब्द लिखे जाते हैं. कोई भी यह क्यों नहीं कहता कि अमुक व्यक्ति ने बलात्कार करके अपनी इज्जत लुटवाई?

बलात्कार के बहुत प्रसिद्ध मामलों में ही बलात्कारी को सजा मिल पाती हैे. बाकी के सारे बलात्कारी ‘बाइज्जत बरी‘ हो जाते हैं और पीड़िता को ‘इज्जत लुटी हुई‘ घोषित कर दिया जाता है. आखिर शरीर और कोमल भावनाओं के साथ हुई हिंसा का भला महिलाओं की इज्जत से क्या और कैसा संबंध है?

बलात्कारी एक्सीडेंट में सिर्फ घायल करने वाले वाहन का काम करता है. उस घायल को संवेदना का जो ‘मरहम‘ रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज और मीडिया लगाते हैं उसमें पीड़िता की इज्जत लुटने का ढिंढ़ोरा ज्यादा बजता है. समाज पीड़िता को तो आत्महत्या के लिए विवश कर देता है, लेकिन बलात्कारी की सामाजिक हत्या क्यों नहीं करता?

बलात्कार या यौन हिंसा के डर से स्कूल छोड़ने जैसी तमाम घटनाएं दो तरह की विफलताओं की तरफ साफ इशारा कर रही हैं. एक, पुलिस प्रशासन और अदालती न्याय की विफलता जिसके कारण लड़कियों और उनके माता-पिता में यह भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा कि अब उनके आस-पास ऐसी घटनाएं नहीं होंगी. दूसरा, समाज की पीड़िता के साथ खड़े होने की विफलता.

बलात्कारी तो निःसंदेह सजा का हकदार है ही लेकिन ‘इज्जत लुट गई‘ कहने, लिखने, सोचने वाले और लड़की की सामाजिक हत्या करने वाले भी निश्चित तौर पर माफी के काबिल नहीं हैं. बार-बार अपराधी, पुलिस तंत्र और न्याय व्यवस्था के निकम्मेपन पर चिल्लाकर हम अपने अपराध और नाकामी को आखिर कब तक छिपाते फिरेंगे?

यदि बलात्कार की शिकार लड़कियों से हमें जरा भी सच्ची संवेदना है तो ‘इज्जत लुट गई‘, ‘अस्मत तार-तार‘ हो गई जैसी शब्दावली का प्रयोग तत्काल बंद करना चाहिए

अदालतें तो फिर भी कुछ बलात्कारियों को सजा दे देती हैं लेकिन, बलात्कार की पीड़ित लड़की/महिला को समाज में ससम्मान खड़ा करने और किसी मुकाम पर पहुंचाने के हमारे पास कितने उदाहरण हैं? क्या पुलिस, प्रशासन या अदालतों ने व्यवहार में बलात्कार की पीड़िताओं का साथ देने और सम्मान करने से मना किया है? किसने ‘इज्जत लुट गई‘ कहकर पीड़िता के जख्मों पर नमक छिड़का है? आखिर पीड़िता को स्कूल से निकालने, उसके साथ बातचीत बंद करने, उसे अजीब सी नजरों से देखने और घर में ही कैद रहने को किसने मजबूर किया है?

यदि बलात्कार की शिकार लड़कियों से हमें जरा भी सच्ची संवेदना है तो ‘इज्जत लुट गई‘, ‘अस्मत तार-तार‘ हो गई जैसी शब्दावली का प्रयोग तत्काल बंद करना चाहिए. साथ ही कानून बनाकर ऐसी शब्दावली प्रयोग करने वालों को भी दंड़ित करना चाहिए.

लड़कियों/महिलाओं को खुद भी ‘इज्जत लुट जाने‘ की आत्मघाती प्रवृत्ति से बाहर निकलना होगा क्योंकि, बलात्कार हो जाने के बाद भी न तो महिलाओं की योग्यता कम या खत्म होती है और न ही उनके सपने, संवेदनाएं, स्नेह, ममता, प्रबंध कौशल, जूझने की क्षमता या जरूरतें...कुछ भी तो कम या खत्म नहीं होता और न ही खत्म होती है उनकी ‘इज्जत‘.

जिस तरह का माहौल है उसमें आशंका है कि आने वाले समय में बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाएं बढ़ेंगी ही और सजा के प्रतिशत में भी कुछ खास इजाफा नहीं होने वाला. ऐसे में इस इज्जत के प्रेत को विदा करके ही लड़कियां/महिलाएं सहज जीवन जी सकेंगी.