देहरादून से करीब दो सौ किलोमीटर दूर रैथल नाम का एक गांव है. उत्तरकाशी जिले के इस छोटे से गांव में 15 अगस्त के दिन जगह-जगह से लोग पहुंचे थे. ये सभी लोग ‘अंडूड़ी’ मनाने यहां आए थे. ‘अंडूड़ी’ यहां मनाया जाने वाला एक ऐसा पर्व है जिसमें दूध, मक्खन और मट्ठे (छांछ) से होली खेली जाती है. इस त्यौहार को अब ‘बटर फेस्टिवल’ भी कहा जाने लगा है.

हर साल ‘अंडूड़ी’ मनाने यहां आए लोगों को रैथल से सात किलोमीटर की पैदल चढ़ाई चढ़ने के बाद दयारा तक पहुंचना होता है. यह घास का एक मैदान है. ऐसे मैदानों को बुग्याल कहा जाता है. ‘अंडूड़ी’ मुख्यतः दयारा बुग्याल में ही मनाया जाता है. रैथल से दयारा की ओर करीब चार किलोमीटर चलने पर एक बेहद खूबसूरत बस्ती है. गोही नाम की इस बस्ती में करीब 14-15 कच्चे घर हैं. इन घरों को स्थानीय लोग ‘छानी’ कहते हैं. गोही की एक छानी में रहने वाले धर्मदास शाह कहते हैं, ‘हम मूलतः रैथल गांव के रहने वाले हैं. गर्मियों में हम लोग अपनी गाय-भैंसों को लेकर यहां रहने आ जाते हैं. उस दौरान गांव में ज्यादा चारा नहीं होता लेकिन यहां जंगल और बुग्याल में जानवरों को बढ़िया भोजन मिल जाता है. यहां की घास, फूल और जड़ी-बूटियां खाने से मवेशी तीन गुना तक ज्यादा दूध देने लगते हैं.’

गोही की ही तरह इस क्षेत्र में चिलाप्डा, नयटा और दयारा में भी रैथल गांव के लोगों की छानियां हैं. ये लोग अमूमन अप्रैल के अंत या मई महीने की शुरुआत में इन छानियों में आते हैं और सर्दियों की आहट होते ही वापस अपने गांव वापस लौट जाते हैं. जगमोहन सिंह रावत भी रैथल गांव के ही रहने वाले हैं जिनकी छानी दयारा में है. वे बताते हैं, ‘हमारे जानवर यहां सुरक्षित रहे और उन्होंने ज्यादा दूध दिया, इसके लिए ही हम अंडूड़ी मनाकर कुदरत और देवताओं को धन्यवाद कहते हैं. भादों की संक्रांति के दिन यह उत्सव मनाया जाता है. सब लोगों के घर में इस दिन खीर बनाई जाती है और मक्खन-मट्ठे की होली खेली जाती है. हम देवताओं से यह भी प्रार्थना करते हैं कि अगले साल भी वे हमारी ऐसे ही मदद करें. अंडूड़ी के 15-20 दिन के भीतर-भीतर सभी लोग गांव लौट जाते हैं. ‘

बटर फेस्टिवल के जिस रूप में अंडूड़ी आज मनाई जाती है, पहले ऐसा नहीं था. रैथल गांव के रहने वाले पत्रकार पंकज कुशवाल बताते हैं, ‘अंडूड़ी असल में पहले बटर फेस्टिवल न होकर ‘मड फेस्टिवल’ हुआ करता था. बरसात में छानियों के बाहर जो कीचड़ जमा होता था, उसमें मट्ठा मिलाकर अंडूड़ी खेली जाती थी. बुग्याल की इस मिट्टी से त्वचा पर होने वाली बीमारियां भी दूर होती थी.’ पंकज आगे कहते हैं, ‘धीरे-धीरे जब बाहर के लोग भी इसमें शामिल होने लगे तो मिट्टी या कीचड़ से इसे खेलना बंद कर दिया गया. अब तो बीते कई सालों से सिर्फ दूध, मक्खन और मट्ठे से ही अंडूड़ी खेली जाती है.’

अंडूड़ी के दिन दयारा की सभी छानियों के बाहर रंगबिरंगे फूल सजाए जाते हैं. इन फूलों के साथ ही छानियों के बाहर एक पूरी भी टांगी जाती है. फिर एक व्यक्ति जाकर इस पूरी को उतारता है और तब बाकी लोग मिलकर उस पर मट्ठे की पिचकारियां मारना शुरू करते हैं. इस तरह मट्ठे-मक्खन की बरसात का जो सिलसिला शुरू होता है, वह तभी थमता है जब हर एक छानी के बाहर यह दोहराया जा चुका हो और गांव वालों के साथ ही बाहर से आए लोग भी मट्ठे और मक्खन से सराबोर हो चुके होते हैं.

कुछ समय पहले तक बेहद कम लोग ही इस अनोखे उत्सव के बारे में जानते थे. हालांकि इसकी जानकारी आज भी कम ही लोगों को है लेकिन अब यह इतना तो प्रचारित हो ही गया है कि दूसरे राज्यों से भी कुछ लोग इसमें हिस्सा लेने पहुंचने लगे हैं.

इसकी शुरुआत साल 2006 में हुई थी. तब उत्तरकाशी होटल एसोसिएशन ने इस पर्व से बाहर के लोगों को जोड़ने के लिए इसे ‘बटर फेस्टिवल’ के नाम से प्रचारित करना शुरू किया था. फिर ‘दयारा पर्यटन उत्सव समिति’ इस बटर फेस्टिवल का आयोजन और इसका प्रचार करने लगी. इसके लिए समिति को सरकार से अनुदान भी मिलता रहा है. लेकिन इस साल प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता के चलते ऐसा नहीं ङो सका. ऐसे में गांव के युवाओं ने इस साल खुद ही ‘बटर फेस्टिवल’ का प्रचार और इसका सफल आयोजन भी किया.

दिल्ली से इस बटर फेस्टिवल में शामिल होने दयारा पहुंचे पंकज डुंगरिया कहते हैं, ‘मैंने पहली बार इस फेस्टिवल के बारे में अपने एक दोस्त से सुना था. फिर मैंने इंटरनेट पर इसके बारे में पढ़ा. यह अनुभव में जिंदगी भर नहीं भूल सकता. इतने खूबसूरत पहाड़ों के बीच छाछ-मक्खन की होली खेलना किसी सपने जैसा ही है.’

ट्रेकिंग के शौक़ीन देहरादून निवासी रोहित अरोरा कहते हैं, ‘मुझे इस त्यौहार के बारे में दयारा आने के बाद ही मालूम हुआ. मैं 13 अगस्त को दयारा पहुंचा था. जब मैंने सुना कि 16 तारीख को यहां ऐसा आयोजन होने वाला है तो मैं यहीं रुक गया. शायद ही हमारे देश में इससे ज्यादा रोमांचक कोई और त्यौहार होता हो. लोगों को इसके बारे में जानकारी ही नहीं है वरना शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसका मन इसमें शामिल होने को न ललचाए.’

पिछले साल की तुलना में इस साल बटर फेस्टिवल में शामिल होने वाले लोगों की संख्या काफी कम रही. इस बारे में इसके आयोजक बताते हैं, ‘2009 के बाद से अंडूड़ी में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ गया था. इससे यहां भीड़ तो बढ़ी लेकिन अंडूड़ी का त्यौहार अपना मूल स्वरुप भी खोने लगा था. पिछले साल तो मक्खन की हांड़ी लगाकर और उसे तोड़कर अंडूड़ी को महाराष्ट्र की कृष्ण जन्माष्टमी का रूप दे दिया गया था. यह त्यौहार ऐसा कभी नहीं था.’ वे आगे कहते हैं, ‘इस साल गांव के युवाओं ने बिना किसी सरकारी अनुदान के यह आयोजन किया है. इसकी तैयारियां भी काफी देर से शुरू हुई इसलिए ज्यादा प्रचार नहीं हो सका और बाहर से कम ही लोग यहां पहुंचे. लेकिन इस आयोजन ने गांव के लोगों को यह आत्मविश्वास दे दिया है कि आने वाले सालों में वे इसे खुद ही और पहले से बड़े स्वरूप में भी कर सकते हैं.’