गुजरात के उना तालुका का छोटा सा गांव मोटा समधियाला. यूं तो अमूमन अपने ग्रामीण परिवेश के मुताबिक, यह गांव ऊंघता-अलसाया सा रहता है. लेकिन अभी बीती 13 अगस्त को यहां खासी चहल-पहल थी. गांव के छोटे से चौक पर चटक नीली कोटियां पहने और माथे पर नीला टीका लगाए करीब 300 लोग इकट्ठा थे. दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ये सभी लोग कुछ देर पहले ही वेरावल से करीब 100 किलोमीटर की मोटरसाइकिल रैली पूरी कर के आए थे. और यहां स्थानीय तौर पर उभरे दलित नेता केवल राठौड़ का जोशीला भाषण सुनने के लिए जमा हुए थे.

यहां एक बात और बता देना जरूरी है कि मोटा समधियाला वही गांव है, जहां 11 जुलाई को कुछ कथित गौ-रक्षकों ने चार दलित युवकों को कार से बांधकर बुरी तरह पीटा था. इन दलित युवकों पर आरोप लगाया गया था कि इन्होंने गाय को मारा है. जबकि वे मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे, जो उनका काम भी था. इस घटना के बाद पूरे गुजरात के दलितों में आक्रोश पसरा हुआ है. बीते एक महीने में पूरे राज्य में दर्जनों विरोध प्रदर्शन और रैलियां हो चुकी हैं. केवल राठौड़ को सुनने के लिए इस गांव में हुआ यह जमावड़ा भी उसी श्रृंखलाबद्ध विरोध का हिस्सा है.

अमरेली में जो लोग बौद्ध धर्म अपनाने की तैयारी कर रहे हैं, उनमें से एक हैं चलाला गांव के रमेशभाई राठौड़. वे कहते हैं, ‘मैंने इतने सालों तक हिंदू धर्म का ही दामन थाम रखा था. लेकिन उसमें हमें क्या मिला? सिर्फ भेदभाव!’

केवल के भाषण का सिलसिला शुरू हुआ ही था कि तभी वे भीड़ की तरफ सवाल उछालते हैं, ‘आप में से कितने बौद्ध धर्म अपना चुके हैं?’, जवाब में करीब एक तिहाई लोगों के हाथ खड़े हो जाते हैं. तुरंत ही इन लोगों की तरफ अगला सवाल उछाल दिया जाता है, ‘...लेकिन आप लोगों में से कितने अधिकृत रूप से कागजों पर बौद्ध धर्म के अनुयायी माने जाते हैं?’ यह सवाल शायद पेचीदा था, इसलिए जवाब में महज 10-15 लोगों के हाथ ही खड़े होते हैं. यह देखते ही राठौड़ माइक से गरज उठते हैं, ‘क्या बाबा साहेब आंबेडकर के साथ यह धोखा नहीं है?...वह बाबा साहेब, जिन्होंने हमें हमारे अधिकार दिए?...अगर हम हिंदू ही बने रहते हैं, तो हमारे बच्चे हमें कभी माफ नहीं करेंगे!’

उनके इतना कहते ही पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है. लेकिन यह गूंज सिर्फ तालियों की मत समझिए. यह आने वाले वक्त में एक बड़े घटनाक्रम की शुरुआती गूंज भी है. दरअसल, पिछले महीने उना में हुई घटना के विरोध में जिस दलित आंदोलन ने जोर पकड़ा है, वह नई करवट लेने लगा है. हिंदू धर्म के भीतर जातीय अत्याचारों की मुखालफत से शुरू हुआ यह आंदोलन अब हिंदुत्व को छोड़ने की तरफ बढ़ चला है. दलितों के अधिकारों के लिए काम करने वाले तमाम संगठन पूरे गुजरात में रणनीति बना रहे हैं. आंदोलन को अगले चरण में ले जाने की इस रणनीति के तहत बड़े पैमाने पर दलितों का हिंदू से बौद्ध धर्म में अंतरण कराने की योजना है. अब से दिसंबर तक इस तरह की पांच रैलियां आयोजित की जानी तो तय हैं. इनमें करीब 60,000 दलितों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलाने की तैयारी की जा रही है.

हिंदू धर्म छोड़ने की तैयारी

धर्मांतरण के सबसे बड़े आयोजन की तैयारी गुजरात दलित संगठन कर रहा है. अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर में उसकी ओर से चार रैलियां आयोजित करने की योजना है. इनकी तारीखें अभी तय नहीं हैं, लेकिन लक्ष्य निश्चित है- करीब 50,000 दलितों को बौद्ध धर्म में ले जाने का. ये आयोजन राजकोट, अहमदाबाद, वड़ोदरा और पालनपुर में होंगे. इसी तरह, अमरेली जिले में एक अन्य दलित संगठन संभवत: 14 अक्टूबर को एक बड़ा आयोजन करने की तैयारी कर रहा है. इसमें करीब 11,000 दलितों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलाने की तैयारी है.

सौराष्ट्र दलित संगठन ने 2013 में करीब एक लाख दलितों का धर्मांतरण कराया था. उस महाअभियान की यादें अब तक लोगों के जेहन में ताजा हैं

अमरेली में जो लोग बौद्ध धर्म अपनाने की तैयारी कर रहे हैं, उनमें से एक हैं चलाला गांव के रमेशभाई राठौड़. वे कहते हैं, ‘मैंने इतने सालों तक हिंदू धर्म का ही दामन थाम रखा था. लेकिन उसमें हमें क्या मिला? सिर्फ भेदभाव!’ राठौड़ मरे जानवरों की खाल निकालने का काम करते हैं. हालांकि उना में हुई घटना के विरोध में 11 जुलाई के बाद से उन्होंने यह काम बंद कर रखा है. वे बताते हैं, ‘अमरेली में करीब-करीब हर दलित बीते एक महीने से बौद्ध धर्म अपनाने की बात कर रहा है.’ इसी तरह, गिर सोमनाथ जिले के सोलज गांव में रहने वाले नरेश चौहान खुद को पहले से ही बौद्ध कहते हैं. उनके मुताबिक, ‘मैं पिछले कई साल से हिंदू धर्म के बजाय बौद्ध धर्म की परंपराओं का ही पालन कर रहा हूं. अब तो सिर्फ इस पर औपचारिक मुहर लगने का इंतजार है’ गुजरात दलित संगठन ने इस साल जिन 50,000 लोगों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलाने की सूची बनाई है, उनमें सीमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले नरेश भी शामिल हैं.

जूनागढ़ में विशेष हलचल है

सौराष्ट्र क्षेत्र के दलित तो इस धर्मांतरण के लिए कुछ ज्यादा ही उत्सुक नजर आते हैं. इनमें भी जूनागढ़ में इस अभियान को लेकर उत्साह अलग ही नजर आता है. सौराष्ट्र दलित संगठन ने 2013 में करीब एक लाख दलितों का धर्मांतरण कराया था. उस महाअभियान की यादें अब तक लोगों के जेहन में ताजा हैं. जूनागढ़ के खेतिहर मजदूर 30 वर्षीय नरेंद्र माकड़िया याद करते हैं, ‘उस वक्त मैं ज्यादा कुछ समझता नहीं था. लेकिन इस बार मैं यह मौका छोड़ना नहीं चाहता.’ गुजरात दलित संगठन की दीक्षा अभियान सूची में नरेंद्र का भी नाम है. पिछले हफ्ते नरेंद्र ने अपनी तीन दिन की दिहाड़ी भी छोड़ दी. इसलिए कि वे उना में स्वतंत्रता दिवस रैली और मोटरसाइकिल रैली में हिस्सा ले सके. नरेंद्र बताते हैं, ‘मैं जिस खेत में काम करता हूं वहां मुझे गैर-दलितों के मुकाबले में कम मेहनताना दिया जाता है. यही नहीं, खाना-पीना भी अलग से दिया जाता है. ऊंची जाति के लोग हमारी औरतों से भी इज्जत से बात नहीं करते. अब जबकि यह आंदोलन शुरू हुआ है, तो इसे हर तरह से समर्थन देना जरूरी है. फिर चाहे वह धर्म परिवर्तन कर के ही क्यों न हो.’

‘छुआछूत तो आज भी जारी है. दलित मजदूरों को मजबूर किया जाता है कि वे जहां काम करने जाएं, अपने प्याले लेकर जाएं. उन्हें उनमें पैसे फेंक कर दिए जाते हैं, बजाय उनके हाथ में देने के'

भूपत राठौड़ उन एक लाख लोगों में शुमार हैं, जिन्होंने 2013 में बौद्ध दीक्षा ली. वे बताते हैं कि जूनागढ़ में धर्मांतरण का वह अभियान आखिर क्यों बेहद सफल रहा था. उनके मुताबिक, ‘हमने 1992 में जातीय हिंसा को झेला. इसके बाद से पूरे इलाके में आंबेडकर की विचारधारा के प्रति खासी जागरूकता आई. ऊंची जाति के लोग हमें अछूत मानते हैं. लेकिन उस साल उन लोगों ने हम पर सिर्फ इसलिए हमला किया कि हम हिंदू परंपराओं का ठीक से पालन नहीं करते. उन्होंने हमारी दुकानें जला दीं. हमारा दाना-पानी रोक दिया. जवाब में हमें भी मुकाबला करना पड़ा.’ भूपत के मुताबिक, ‘छुआछूत तो आज भी जारी है. दलित मजदूरों को मजबूर किया जाता है कि वे जहां काम करने जाएं, अपने प्याले लेकर जाएं. उन्हें उनमें पैसे फेंक कर दिए जाते हैं, बजाय उनके हाथ में देने के. इसी वजह से मैंने एक बार तो मुस्लिम धर्म अपनाने का भी सोच लिया था. गौ-रक्षक दलितों और मुस्लिमों दोनों को पीटते हैं. मगर वे कम से कम मुस्लिमों को अपने घरों में तो आने देते हैं.’

तीस दिन की मियाद

इस बार गुजरात के दलित आंदोलन का केंद्र उना बना हुआ है. लेकिन उना तालुका में ही धर्मांतरण के आह्वान को लेकर प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं. विजय चौहान, उना के खेतिहर मजदूर हैं. उन्होंने पक्का इरादा कर रखा है कि वे हिंदू धर्म नहीं छोड़ेंगे. वे कहते हैं, ‘मैं अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाऊंगा. जातिमुक्त ढांचे वाले हिंदुत्व की मांग करूंगा. लेकिन मैं इस धर्म को नहीं छोड़ंगा.’ उना के ही सचकवाड गांव की 30 वर्षीय अमीबेन चारोया ने भी अपने परिवार वालों के साथ धर्मांतरण अभियान में हिस्सा लेने के लिए दस्तखत किए हैं. लेकिन उना शहर में हुई स्वतंत्रता दिवस रैली के वक्त तक यह परिवार अपने निर्णय को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं था.

दलित संगठनों की ताजा पहल 1956 की उस घटना से प्रेरित है जब बाबा साहेब ने हिंदुत्व को खारिज कर दिया था और एक भव्य समारोह में उनके साथ करीब 60,000 लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया था

उस रैली में दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने घोषणा की थी कि उनकी ‘उना दलित अत्याचार लड़ात समिति’ राज्य सरकार को 30 दिन की मोहलत देगी. इस दौरान सरकार भूमिहीन दलितों को जमीनें के पट्टे बांटे जाएं. अगर 15 सितंबर तक मांग नहीं मानी गई तो हजारों दलित रेल रोको आंदोलन करेंगे. यहां चारोया परिवार अपनी एक और शर्त जोड़ता है. इस बाबत अमीबेन कहती हैं, ‘हम हमेशा से आंबेडकर की विचारधारा को मानने वाले हिंदू रहे हैं. लेकिन अगर 30 दिन में हमारी मांगें नहीं मानी गईं तो हम बौद्ध धर्म की दीक्षा ले लेंगे.’ वे आगे कहती हैं, ‘मरे जानवरों की खाल उतारने वाले हम जैसे लोगों को हमारे गांव में गौ-रक्षक पिछले दो साल से परेशान कर रहे हैं. अब हमने यह काम छोड़ दिया है और हो सकता है, हम अपना धर्म भी छोड़ दें.’

'इजाजत मिले न मिले, धर्म बदलेंगे'

इस दलित आंदोलन का यह चरण यानी कि धर्मांतरण अभियान निश्चित रूप से बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की ऐसी ही पहल से प्रेरित है. वह 1956 की घटना थी, जब बाबा साहेब ने हिंदुत्व को खारिज कर दिया था और एक भव्य समारोह में उनके साथ करीब 60,000 लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया था. हालांकि आज की तारीख में धर्म परिवर्तन इतना आसान नहीं है. इसके सामने कई तरह की चुनौतियां हैं. देश के कई राज्यों ने धर्मांतरण-विरोधी कानून बना रखे हैं. गुजरात में भी इसी तरह का कानून है. ‘गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता कानून-2009’ के तहत यह अनिवार्य प्रावधान है कि अगर किसी को धर्म परिवर्तन करना है तो पहले जिला स्तर पर नियत अधिकारी से इसकी पूर्व अनुमति लेनी होगी. लेकिन इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद धर्मांतरण के लिए आई आधी अर्जियों पर ही अब तक शासन की ओर से अनुमति दी गई. दलित कार्यकर्ता खुद मानते हैं कि धर्मांतरण के लिए अर्जियां तो खूब पहुंचती हैं, लेकिन उन्हें मंजूरी नहीं मिलती.

हालांकि इसके बावजूद गुजरात दलित संगठन ने इस कानून की परवाह किए बिना आगे बढ़ने का फैसला किया है. इस संगठन के सह-संस्थापक अशोक सम्राट के मुताबिक, ‘हमारे दीक्षा अभियान के तहत जिन 50,000 लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाने की हामी भरी है, उन सभी ने धर्मांतरण के लिए सरकार के पास अर्जिंयां भी जमा करा दी हैं. लेकिन हमें इजाजत मिले, न मिले, हम इस दीक्षा अभियान को अंजाम तक पहुंचाएंगे. सच तो ये है कि इस बार अगर हमें रोकने की कोशिश की गई, तो हम राज्य सरकार के धर्मांतरण-विरोधी कानून को कोर्ट में चुनौती देने से भी नहीं चूकेंगे.’