पहले आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हालिया तीन ट्वीटों पर गौर कीजिए. खासतौर पर तीसरे वाले. क्रिकेटर से भाजपा के नेता और फिर सांसद बने नवजोत सिंह सिद्धू के बारे में उन्होंने ये सिलसिलेवार ट्वीट 19 अगस्त को किए थे.

पहले ट्वीट में केजरीवाल लिखते हैं, ‘क्या नवजोत सिंह सिद्धू आप ज्वाइन करेंगे? इस बारे में काफी अटकलें चल रही हैं. इसलिए मेरा फर्ज बनता है कि मैं अपना पक्ष भी सामने रखूं. इस महान क्रिकेटर के लिए हम लोगों के मन में बहुत, बहुत आदर है.’

फिर कुछ देर बाद दूसरा ट्वीट आया, ‘वे पिछले हफ्ते मुझसे मिले थे. उन्होंने कोई पूर्व शर्त नहीं रखी है. उन्हें सोचने के लिए कुछ वक्त की जरूरत है. उनकी इच्छा का सम्मान करें.’

फिर आखिरी ट्वीट, ‘वे बहुत अच्छे इंसान हैं और महान क्रिकेटर भी. वे (आप में) शामिल हों या न हों, उनके लिए मेरा सम्मान बरकरार रहेगा.’

केजरीवाल के इन ट्वीट में छिपा संकेत साफ है. और वह यह कि आप में शामिल होना या न होना, पूरी तरह सिद्धू पर निर्भर है. आप अपनी तरफ से उनकी मान-मनौव्वल करने नहीं जाएगी. पार्टी न ही उन्हें शामिल करने के लिए मरी जा रही है.

हालांकि केजरीवाल के दावे के उलट पंजाब के वरिष्ठ आप नेता मानते हैं कि सिद्धू ने पार्टी में शामिल होने के लिए पूर्व शर्त ही नहीं, बल्कि शर्तें रखी हैं. वे चाहते हैं कि चुनाव से पहले ही पार्टी की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया जाए. साथ ही उनकी पत्नी और उनके समर्थकों को टिकट देने में प्राथमिकता दी जाए. लेकिन सिद्धू से पार्टी नेतृत्व ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जा सकता. क्योंकि इससे पार्टी के अन्य वरिष्ठ और पहले से जुड़े नेता नाराज हो सकते हैं. इसी तरह पार्टी के नियमों के मुताबिक, एक ही परिवार के दो सदस्यों को चुनाव लड़ाने के लिए टिकट भी नहीं दिया जा सकता. यानी पत्नी के लिए सिद्धू की टिकट की मांग भी करीब-करीब खारिज कर दी गई है. अलबत्ता, इतना भरोसा जरूर दिया गया है कि सिद्धू को पार्टी का स्टार प्रचारक बनाया जा सकता है. और चुनाव नतीजों के बाद अगर पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आई तो मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम पर विचार किया जा सकता है. बशर्ते, बहुमत से पार्टी के विधायक उन्हें इस पद पर बिठाने के लिए राजी हों या फिर वे इस बाबत आखिरी फैसले के लिए केजरीवाल को अधिकृत कर दें.

केजरीवाल के ट्वीट और आप नेताओं के बयानों से साफ है कि सिद्धू को वे मानदंड बता दिए गए हैं, जिनका पालन करते हुए वे पार्टी में शामिल हो सकते हैं या किए जा सकते हैं

सिद्धू जब राज्यसभा से इस्तीफा देकर एक हफ्ते के लिए सार्वजनिक परिदृश्य से बाहर हो गए थे, तभी से उनके आप में शामिल होने की अटकलें चल रही हैं. इसके साथ ही पार्टी में उनकी एंट्री को लेकर पंजाब के वरिष्ठ आप नेताओं की नाराजगी की भी खबरें सुर्खियां बन रही हैं. आप की पंजाब इकाई के संयोजक और पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता सुच्चा सिंह छोट्टेपुर तो सार्वजनिक तौर पर साफ बयान दे चुके हैं. उनके मुताबिक, पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं करना चाहिए. इस पद पर कौन बैठेगा, इसका फैसला चुने हुए विधायकों पर छोड़ दिया जाना चाहिए. यहां बताते चलें कि सुच्चा सिंह खुद मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में हैं.

यानी केजरीवाल के ट्वीट और आप नेताओं के बयानों से साफ है कि सिद्धू को वे मानदंड बता दिए गए हैं, जिनका पालन करते हुए वे पार्टी में शामिल हो सकते हैं या किए जा सकते हैं. साथ ही, उन्हें यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि इन मानदंडों से बाहर जाकर उन्हें पार्टी में जगह नहीं दी जा सकती. हालांकि पार्टी किसी सिख चेहरे पर ही पंजाब में दांव लगाने के लिए उत्सुक दिखती है. मगर इसके बावजूद कई लोग मानते हैं कि राज्य में वह आदर्श चेहरा सिद्धू नहीं हो सकते.

इसके कई कारण हैं. पहला- सिद्धू बड़बोले किस्म के नेता हैं. साथ ही, उनके तौर-तरीके भी ऐसे हैं, जो चुनाव के इस अहम पड़ाव पर पार्टी के कई नेताओं की नाराजगी का सबब बन सकते हैं. दूसरा- उन पर हत्या का एक केस चल रहा है. इस केस में करीब एक दशक पहले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराए जाने और सजा सुनाने पर रोक लगा दी थी. मगर वे अब तक बरी नहीं किए गए हैं. ऐसे में, चुनाव के वक्त ही कहीं इस मामले में अदालत का उल्टा फैसला आ गया तो पार्टी परेशानी में पड़ सकती है. तीसरा कारण, जो शायद आखिरी न हो- यह चिंता कि सिद्धू खुद पार्टी में एक शक्ति और सत्ता के केंद्र के तौर पर उभर सकते हैं. और केजरीवाल का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड देखने पर तो यही लगता है कि वे खुद भी ऐसा कभी नहीं चाहेंगे.

सिद्धू भाजपा में बने रहने के लिए मोल-भाव करना चाहते हैं. लेकिन अकालियों के साथ उनके बैर की वजह से यह स्प्ष्ट था कि भाजपा उन्हें पंजाब के मामलों में शामिल नहीं करेगी

हाथ से फिसलते विकल्प

बहरहाल, अब केजरीवाल के ट्वीट के बाद सिद्धू के लिए विकल्प सीमित माने जा रहे हैं. वैसे, जब उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया था और भाजपा नहीं छोड़ी थी, तब उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू ने बयान जारी किया था. उन्होंने कहा था, ‘राज्यसभा से सिद्धू के इस्तीफे को भाजपा से इस्तीफा भी मान लिया जाना चाहिए.’ अमूमन पति की तरफ से मीडिया में बयान देने वाली नवजोत कौर ने उसी वक्त यह भी साफ कहा था कि सिद्धू आप में शामिल होंगे और उनके साथ वे भी. मगर इसके बाद वे अपनी लाइन बदलती हुई भी नजर आईं. वे एक तरफ अकाली दल के खिलाफ बयान देती रहीं, दूसरी तरफ यह संकेत भी कि वे भाजपा छोड़ सकती हैं. साथ ही, उन्होंने पंजाब भाजपा के अध्यक्ष विजय सांपला से सुलह-सफाई के दरवाजे भी खुले रखे और पार्टी की तिरंगा यात्राओं में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उन्होंने सांपला के साथ मेल-मुलाकात और बैठकें भी कीं. इस बीच, सांपला सफाई देते रहे कि सिद्धू ने भाजपा नहीं छोड़ी है इसलिए उनसे पार्टी में लौटने के लिए कहने की कोई तुक नहीं बनती. जबकि, सिद्धू ने पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखी. इससे यह संकेत मिले कि सिद्धू भी भाजपा में बने रहने के लिए मोल-भाव करना चाहते हैं. लेकिन अकालियों के साथ उनके बैर की वजह से यह स्प्ष्ट था कि भाजपा उन्हें पंजाब के मामलों में शामिल नहीं करेगी. और यही सिद्धू नहीं चाहते थे, जो कि उन्होंने भाजपा छोड़ते वक्त कहा भी.

ऐसे में अब सिद्धू के पास एक और विकल्प बचता है कि वे कांग्रेस में शामिल हो जाएं. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तो उन्हें बाकायदा न्योता भी दे डाला है. उन्होंने याद भी दिलाया कि सिद्धू के पिताजी भगवंत सिंह सिद्धू पटियाला जिला कांग्रेस के कार्यालय प्रभारी रह चुके हैं. कुछ और कांग्रेसी नेताओं ने भी सिद्धू से कांग्रेस में शामिल होने की अपील की है. जैसे, कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, ‘हम सब सिद्धू की इज्जत करते हैं. एक क्रिकेटर-कलाकार के तौर पर उनकी अपनी हैसियत है. हम भले अलग-अलग पार्टियों में रहे हों. राजनीतिक तौर पर हमारे विचार न मिलते हों. मगर मोदी (नरेंद्र) ने उन्हें जिस तरह बेवकूफ बनाया और धोखा दिया, वैसा किसी के साथ भी नहीं किया जाना चाहिए. यह मेरी इच्छा है. साथ ही, मैं यह भी कहना चाहूंगा कि सिद्धू को आप या केजरीवाल से भी ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.’

राज्य के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल, जो अभी हाल में ही कांग्रेस में शामिल हुए हैं, कहते हैं कि पार्टी में सिद्धू के स्वागत के लिए वे नंगे पैर उनके पास जाने को तैयार हैं

राज्य के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल, जो अभी हाल में ही कांग्रेस में शामिल हुए हैं, कहते हैं कि पार्टी में सिद्धू के स्वागत के लिए वे नंगे पैर उनके पास जाने को तैयार हैं. राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल भी कहती हैं, ‘वे (सिद्धू) कांग्रेस के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं. उनका भाजपा में शामिल होना सिर्फ एक प्रयोग था. कांग्रेस तो उनके खून में है.’ लेकिन इन तमाम प्रलोभनों के साथ यह भी स्वाभाविक और जाहिर है कि सिद्धू के लिए कांग्रेस में ज्यादा गुंजाइश है नहीं. कांग्रेस में नेताओं की बड़ी जमात मौजूद है, जो पार्टी संगठन और सरकार बनने पर उसमें भी, शीर्ष भूमिकाओं के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रही है. ऐसे में सिद्धू न तो शीर्ष नेता (इसे संभावित मुख्यमंत्री या पार्टी अध्यक्ष समझा जा सकता है) बनने की उम्मीद कर सकते हैं, न उपनेता ही. यहां तक कि पार्टी का युवा नेतृत्व भी उन्हें संगठन में ज्यादा जगह देने के मूड में नहीं है.

इन हालात में दो चीजें एकदम साफ हैं. पहली- सिद्धू फैसला लेने में जितनी देर कर रहे हैं, विकल्प और वक्त उतनी ही तेजी से उनके हाथ से फिसलता जा रहा है. दूसरा- भले निजी तौर पर उनकी साख अच्छी हो, लेकिन उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता गिर रही है, काफी गिर भी चुकी है.