रामविलास पासवान के बारे में अगर सियासत के जानकारों से बात करें तो पहली बात वे यही कहते हैं कि पासवान एक प्रमुख दलित नेता रहे हैं. इस जमाने में ज्ञान की गंगा जिस गूगल को कहा जाता है उस पर रामविलास पासवान टाइप करने पर पहले पन्ने पर जो परिणाम आते हैं, उनमें से अधिकांश में उनकी पहचान एक दलित नेता के तौर पर ही दर्ज है. लेकिन आज की जमीनी वास्तविकता इससे थोड़ी अलग लग रही है. हाल के समय में दलितों से संबंधित मुद्दों पर उनकी रहस्यमयी चुप्पी की वजह से कई लोग उनके बारे में पहले से अलग राय रखने लगे हैं.

कई राजनीतिक जानकार दलितों से जुड़े मसलों पर पासवान की चुप्पी को केंद्र सरकार में उनके मंत्री बने रहने से जोड़कर देखते हैं. उनका कहना है कि केंद्र में मंत्री पद उन्हें ऐसी स्थिति में मिला है, जब भाजपा को केंद्र की सरकार चलाने के लिए किसी दूसरे दल की कोई आवश्यकता ही नहीं है. ऐसे में सहयोगी दलों के लिए भाजपा और उसकी सरकार पर दबाव बनाने के लिए बहुत गुंजाइश नहीं है.

जब से रामविलास पासवान 2014 में वापस भाजपा के पाले में आए तब से लालू यादव उन्हें ‘मौसम विज्ञानी’ कहते हैं. लालू के मुताबिक पासवान की एक योग्यता जबर्दस्त है - वे सियासी हवा का रुख भांप लेते हैं और जिसकी सरकार बनने वाली होती है, उसके पाले में चले जाते हैं

नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पहली बार नहीं है कि दलितों के मुद्दे पर केंद्र सरकार निशाने पर है. जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र रोहित वेमुला ने खुदकुशी की थी तो उस वक्त भी केंद्र सरकार को दलित समुदाय से काफी विरोध का सामना करना पड़ा था. दलित विचारकों और कई दलित नेताओं ने उस वक्त सरकार पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया था. अभी गुजरात में जिस तरह से दलित आंदोलन खड़ा हो रहा है, उसमें भी निशाने पर सिर्फ गुजरात की भाजपा सरकार नहीं है बल्कि केंद्र की मोदी सरकार भी है. कहा जा रहा है कि मोदी सरकार दलितों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए कुछ नहीं कर रही है.

ऐसी परिस्थिति में दलित राजनीति को जानने-समझने वाले लोग रामविलास पासवान से हस्तक्षेप की उम्मीद स्वाभाविक तौर पर करते हैं. उनके ऐसा सोचने की एक बड़ी वजह है. जब 2002 में गुजरात का दंगा हुआ तो उस वक्त भी रामविलास पासवान केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे. उस वक्त उन्होंने अभी के प्रधानमंत्री और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को इन दंगों के लिए जिम्मेदार मानते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

केंद्र सरकार से इस्तीफा देने के बाद अपने गृह प्रदेश बिहार की राजधानी पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल पहुंचे रामविलास पासवान ने वहां केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया था कि गुजरात के दंगों को रोकने में केंद्र ने भी अपनी भूमिका नहीं निभाई. यह संवाददाता आज से तकरीबन 14 साल पहले आयोजित उस कार्यक्रम में था. वहां जिस तरह से रामविलास पासवान केंद्र सरकार, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमले कर रहे थे, उससे लग रहा था कि वे वाकई सांप्रदायिकता के मसले पर काफी गंभीर हैं.

इस पृष्ठभूमि वाले रामविलास पासवान से अभी की स्थिति में दलितों पर हो रहे हमलों पर दखल की उम्मीद करना अस्वाभाविक नहीं है. लेकिन 2002 में जिन पासवान ने सांप्रदायिकता के मसले पर केंद्र सरकार का मंत्री पद छोड़ दिया था, वे आज उस वर्ग के लिए कुछ बोल तक नहीं पा रहे हैं जिसकी राजनीति करके यहां तक पहुंचे हैं.

संयुक्त मोर्चा सरकार के पतन के बाद जब वाजपेयी की अगुवाई में भाजपा के उभार का एक सियासी दौर चला तो उस सरकार में भी रामविलास पासवान के पास अहम मंत्रालय था

इस सवाल का सबसे सटीक जवाब उनके एक पुराने सहयोगी अपना नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर देते हैं. उनका कहना है कि अभी के रामविलास पासवान को समझने के लिए कभी राजनीति में उनके साझीदार रहे लालू यादव की एक बात का सहारा लेना पड़ेगा. जब से रामविलास पासवान 2014 में वापस भाजपा के पाले में आए तब से लालू यादव उन्हें ‘मौसम विज्ञानी’ कहते हैं. लालू के मुताबिक रामविलास पासवान की एक योग्यता जबर्दस्त है - वे सियासी हवा का रुख भांप लेते हैं और जिसकी सरकार बनने वाली होती है, उसके पाले में चले जाते हैं. तथ्यों में जाएं तो लालू की बात काफी हद तक सही लगती है.

ज्यादा नहीं बल्कि पिछले 20 साल में ही रामविलास पासवान ने कितनी बार पाला बदला है, सिर्फ इसे ही जान लें तो पता चलता है कि वे सच में ऐसे ‘मौसम विज्ञानी’ हैं जिसका अनुमान तकरीबन सही रहता है. जब 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी तो उस वक्त रामविलास पासवान न सिर्फ इसमें एक अहम केंद्रीय मंत्री थे बल्कि लोकसभा में सत्ताधारी पार्टी की ओर से सदन के नेता भी थे. संयुक्त मोर्चा के उस दौर की दो सरकारों में प्रधानमंत्री रहे एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल राज्यसभा के सदस्य थे. जो लोग संसदीय राजनीति को समझते हैं, उन्हें मालूम है कि सत्ताधारी पार्टी की ओर से लोकसभा का नेता होने का क्या मतलब है.

संयुक्त मोर्चा सरकार के पतन के बाद जब वाजपेयी की अगुवाई में भाजपा के उभार का एक सियासी दौर चला तो उस सरकार में भी रामविलास पासवान के पास अहम मंत्रालय था. 2004 में जब मनमोहन सिंह की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी तो भी रामविलास ताकतवर कैबिनेट मंत्री रहे. बीच में 2009 से 2014 का दौर उनके लिए थोड़ा खराब कहा जा सकता है. 2009 में वे खुद चुनाव हार गए और केंद्र में मंत्री नहीं बन पाए. लेकिन 2014 में वे भाजपा के साथ हो लिए और जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी तो एक बार फिर से कैबिनेट मंत्री बन गए.

रामविलास के साथ आने के बाद भाजपा ने यह बताना शुरू किया कि नरेंद्र मोदी सियासी तौर पर अछूत नहीं रहे बल्कि स्वीकार्य होते जा रहे हैं

2014 में रामविलास पासवान का भाजपा के साथ आना नरेंद्र मोदी के लिए भी बेहद उपयोगी रहा था. रामविलास के साथ आने के बाद भाजपा ने यह बताना शुरू किया कि नरेंद्र मोदी सियासी तौर पर अछूत नहीं रहे बल्कि स्वीकार्य होते जा रहे हैं. इसी बात को आधार बनाकर भाजपा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को विस्तार दिया और कभी मोदी विरोधी रहे कई नेताओं को अपने साथ लाया.

अब सवाल यह उठता है कि नरेंद्र मोदी के लिए इतने उपयोगी रहे रामविलास पासवान के हाथ आज इतने बंधे हुए क्यों दिख रहे हैं? इस बारे में उनके पुराने सहयोगी रहे एक नेता कहते हैं, ‘उन्हें मालूम है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली यह भाजपा अटल-आडवाणी वाली भाजपा से काफी अलग है. यहां अगर वे अपनी कोई अलग सियासी लाइन लेने की कोशिश करेंगे तो उनके लिए सरकार में बने रहना संभव नहीं होगा. संख्या बल के मामले में भाजपा पहले से ही मजबूत स्थिति में है. ऊपर से उनके पास खुद सांसदों की कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं है.’

उनकी चुप्पी की एक दूसरी वजह उनके पुत्र चिराग पासवान भी हैं. रामविलास पासवान को यह भी लगता होगा कि अभी जिस तरह की राजनीतिक स्थिति है, उसमें वे चिराग को राजनीतिक तौर पर स्थापित करने का काम भाजपा विरोध करके नहीं कर सकते.