वह 26 अगस्त की शाम थी. घड़ी उस वक्त साढ़े छह या शायद सात बजा रही थी. लेकिन भोपाल के भारत भवन के अंतरंग सभागार में पुणे से आए संगीतकार मिलिंद तुलणकर कटोरियां बजा रहे थे. पानी से भरी साधारण सी दिखने वाली चीनी मिट्टी की कटोरियां. उनके सामने बाएं से दाहिनी तरफ अर्धचंद्र बनाते हुए बड़ी से छोटी होती करीब 14-15 कटोरियां रखी हुई थीं. साथ ही, स्टेज के पीछे की तरफ पानी से भरी बाल्टी भी. वे एक-एक कर उन पर लकड़ी की छोटी सी छ़ड़ी से हल्की सी चोट करते और उससे निकले सुर को तानपुरे के साथ मिलाने की कोशिश करते. नहीं मिलता तो फिर कटोरियों से पानी को कम या ज्यादा कर हिसाब-किताब ठीक करने की कोशिश करते. करीब 10-15 मिनट की मशक्कत के बाद वे पूरी तरह आश्वस्त होकर उठ गए क्योंकि उन्हें सभागार के मुख्य द्वार पर दीप प्रज्जवलन की औपचारिकता पूरी करने जाना था.

यह नजारा, देश में संभवत: अपनी तरह के अनोखे कार्यक्रम की शुरुआत से पहले का था. अनोखा इसलिए कि यह पूरी तरह से ऐसे वाद्ययंत्र पर आधारित था जो देश में दुर्लभ होता जा रहा है. अपनी तरह का यूं कि इसमें तीन दिन तक (26 से 28 अगस्त) सुबह-शाम की पांच संगीत सभाओं में सिर्फ और सिर्फ जलतरंग की ध्वनियां ही सुनाई दीं. उद्घाटन की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद मंच पर लौटे मिलिंद ने राग पूरिया कल्याण से ‘जलतरंग महोत्सव’ की शुरुआत की. इसके बाद सिलसिला अनायम पट्टी गणेशन, नरेंद्र चव्हाण, पंडित राजेश्वर आचार्य, संजय संत, सुभाष नांदोसकर से होता हुआ सौम्याजुलू नेमानि और हेमदीप शर्मा पर खत्म हुआ.

क्या जलतरंग जैसा वाद्य यंत्र महज इसीलिए दुर्लभ है कि अब इससे सुनने वालों की ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती? या कोई और कारण भी हो सकते हैं?

इस दौरान मिलिंद और आचार्य के व्याख्यान हुए. नांदोसकर से बॉलीवुड की कुछ पुरानी धुनें सुनने को मिलीं. अनायम पट्टी गणेशन और सौम्याजुलू नेमानि जैसे दक्षिण भारत के वरिष्ठ संगीतकारों ने कर्नाटक संगीत की शुद्धता रखते हुए ‘जल से संगीत की तरंगे’ निकालीं. शास्त्रीय राग तो मेघ से लेकर भैरव, मालकौंस, किरवानी, मधुवंती, हंसध्वनि, मुल्तानी, बिहाग और शांति प्रेरणा तक सभी कलाकारों ने बजाए ही.

यानी संगीत (विशेषकर जलतरंग के) शास्त्र पर चर्चा से लेकर विविध प्रस्तुतियों तक शायद ही कोई पहलू रहा हो, जो देखने-सुनने न मिला हो. लेकिन नहीं मिले तो बस पर्याप्त संख्या में इन प्रस्तुतियों पर ‘वाह’ कह उठने वाले लोग. रविवार शाम की सभा को छोड़ दें तो बाकी चारों सभाओं में बमुश्किल ही सुनने वालों ने सैकड़े का आंकड़ा पार किया होगा.

यहीं से शुरू हुई इस सवाल के जवाब की तलाश कि आखिर इस दुर्लभ वाद्य यंत्र पर ही पूरी तरह आधारित इस कार्यक्रम में सुनने वालों का टोटा क्यों रहा? क्योंकि भारत भवन ऐसी जगह नहीं है, जो लोगों को खींचता न हो. यहां 50-100 लोग तो रोज घूमने ही आ जाते हैं. और संगीत, नाटक, साहित्य, चित्रकला आदि के कार्यक्रमों में तो कई बार अंतरंग सभागार (इसकी क्षमता करीब 500 लोगों के बैठने की है) में पैर रखने की जगह नहीं होती. कई बार तो भवन के खुले आंगनों में बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगाने की नौबत आ जाती है. ताकि लोग वहीं बैठकर कार्यक्रम का मजा ले सकें. मगर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. तो क्या जलतरंग जैसा वाद्य यंत्र महज इसीलिए दुर्लभ है कि अब इससे सुनने वालों की ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती? या कोई और कारण भी हो सकते हैं? इनके जवाब संगीत विशेषज्ञ कुछ इस तरह देते हैं.

लोग तो जल-वायु की अहमियत नहीं समझते, जलतरंग की कैसे समझेंगे

मिलिंद तुलणकर देश के उन चंद कलाकारों में हैं, जो पूरी तरह जलतरंग बजाने, बनाने और इसे संवारने में ही लगे हैं. इसलिए सबसे पहले उन्हीं की राय ली. और जब उनसे जलतरंग के दुर्लभ होने से जुड़े सवाल किए, तो वे छूटते ही बोले, ‘लोग तो आजकल जल-वायु की अहमियत नहीं समझते, जलतरंग की कैसे समझेंगे.’ विस्तार से समझाने का आग्रह किया तो बताने लगे, ‘देखिए, जलतरंग ऐसा वाद्य है, जिसमें प्रकृति के सभी पांच तत्वों (पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु) का संतुलित सामंजस्य होता है. पंचतत्वों के इसी सामंजस्य से संगीत पैदा होता है, वातावरण में तैरता है. जैसे- जलतरंग में ज्यादातर चीनी मिट्टी की कटोरियों का इस्तेमाल किया जाता है और मिट्टी यानी पृथ्वी. जल इस यंत्र का दूसरा अहम हिस्सेदार है. इसे लकड़ी की दो छड़ियों से बजाया जाता है और लकड़ी या काष्ठ अग्नि का निवास स्थान माना जाता है. अब रही बात वायु और आकाश (स्पेस या अंतरिक्ष) की, तो ये दोनों तत्व स्वाभाविक रूप से हर जगह होते ही हैं.’

'जब हमें कोमल स्वर (हाफ नोट) की जरूरत होती है तो हम कटोरी से पानी कम करते हैं. आकाश और वायु की जगह बढ़ जाती है. जब स्वर को भारी करना होता है, तो उसमें पानी ज्यादा भरते हैं'

वे समझाना जारी रखते हैं, ‘जलतरंग में पंचतत्वों का सामंजस्य देखिए. जब हमें कोमल स्वर (हाफ नोट) की जरूरत होती है तो हम कटोरी से पानी कम करते हैं. आकाश और वायु की जगह बढ़ जाती है. जब स्वर को भारी करना होता है, तो उसमें पानी ज्यादा भरते हैं, इस वक्त बाकी दोनों तत्वों की जगह कम हो जाती है. और जब स्वर सामान्य रखना होता है, तो जल, वायु और आकाश का संतुलन एक समान रखने की कोशिश करते हैं. फिर छड़ी (अग्नि) से हम आघात करते हैं. मिट्टी (पृथ्वी) की कटोरी में कंपन पैदा होता है. जल में तरंग उठती हैं और इस प्रयास से पैदा हुआ संगीत वायु के जरिए अंतरिक्ष में तैरते हुए लोगों के कानों तक पहुंचता है.’

इसके बाद मिलिंद अब विडम्बनाओं पर रोशनी डालना शुरू करते हैं, ‘पंचतत्वों के समावेश, सामंजस्य और संतुलन का यह संगीत सिर्फ इसी वाद्ययंत्र से निकलता है, ऐसा नहीं है. यह तो पूरी सृष्टि में फैला है. यही हमारा जीवन संगीत भी है. जलतरंग तो उसे देखने, सुनने, महसूस करने का सिर्फ एक जरिया है. साथ ही, यह यंत्र इस बात को समझने का माध्यम भी है कि हम किस तरह पंचतत्वों के साथ खिलवाड़ करते हुए अपने जीवन संगीत को बेसुरा (अनट्यून) कर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर जलतरंग की कटोरियां बनाने के लिए उच्चगुणवत्ता वाली मिट्टी की जरूरत होती है, जो मिलती नहीं. चीन-जापान से मंगानी पड़ती हैं. या देश में ही घूमते-फिरते लगातार नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कोई अच्छी कटोरी मिल जाए. इसी वजह से एल्यूमीनियम की कटोरियां भी इस्तेमाल होने लगी हैं. जबकि ध्वनि चीनी मिट्टी की कटोरियों की ही अच्छी मानी जाती है. ऐसे ही, पानी प्रदूषित हो रहा है. इसमें तमाम मिनरल्स होते हैं, जिनके सतह पर बैठ जाने पर सुर बिगड़ जाते हैं. इसलिए डिस्टिल वाटर या मिनरल वाटर इस्तेमाल करना पड़ रहा है. पेड़ और जंगल कट रहे हैं. जिसकी वजह से लकड़ी के बजाय नाइलोन की छड़ी का उपयोग शुरू किया गया है.... यही सब तो हमारे जीवन में हो रहा है. हवा, पानी, मिट्टी सब प्रदूषित. जल-जंगल-जमीन खत्म हो रहे हैं. हमारे जीवन में अपने अलावा किसी और के लिए स्पेस बचा नहीं है. यानी जब जीवन संगीत बेसुरा हो रहा हो, दुर्लभ हो रहा हो, तो इस सामान्य से वाद्य यंत्र जलतरंग की क्या बिसात?’

बजाने वालों को भी ज्यादा कद्र नहीं

बनारस के पंडित राजेश्वर आचार्य इसके दूसरे पहलू पर ध्यान खींचते हैं. कहते हैँ, ‘सुनने वालों की बात तो बाद में आती है, पहले तो सुनाने वालों की ही कहानी उलझी है. देश की 135 करोड़ की आबादी में आज मुश्किल से चार-पांच लोग ही ऐसे हैं, जो पूरी तरह जलतरंग के लिए ही काम कर रहे हैं. जबकि दूसरे वाद्य यंत्रों पर अनेक गुणी कलाकारों ने पूरा जीवन लगाया. उनका विकास किया. उनमें समय के साथ परिवर्तन किए. इसलिए वे वाद्य यंत्र आज संगीत जगत में ज्यादा लोकप्रिय हैं. जबकि जलतरंग के मामले में अभी इस कार्यक्रम का उदाहरण ही ले लें. भारत भवन ने देश के 10 कलाकारों को बुलाया था. इनमें दो आए ही नहीं. जबकि ऐसा कार्यक्रम न तो पहले हुआ है, और आगे फिर कभी हो पाएगा, यह भी कोई दावे के साथ नहीं कह सकता. इसके अलावा खास तौर पर जलतरंग के लिए ही मानक तय करते हुए अच्छे किस्म की कटोरियां बनाने की जहमत उठाने को भी कोई तैयार नहीं है... आजकल लोगों की जीवनशैली भी ऐसी है कि उन्हें सहज-सुलभ चीजें अपनी तरफ ज्यादा आकर्षित करती हैं. नई पीढ़ी को ख्याति जल्दी चाहिए लेकिन मेहनत कम करना है. इसलिए जैज, पॉप, रैप जैसी गायकी और गिटार जैसे यंत्र उन्हें ज्यादा मुफीद बैठते हैं. अब इन हालात में जलतरंग जैसा वाद्य लुप्त नहीं होगा तो क्या होगा?’

'जलतरंग की कटोरियां बनाने के लिए उच्चगुणवत्ता वाली मिट्टी की जरूरत होती है, जो मिलती नहीं. चीन-जापान से मंगानी पड़ती हैं'

क्या जलतरंग में कोई तकनीकी दिक्कतें भी हैं

संगीत के कई जानकार कहते हैं, ‘जलतरंग को कभी राग संगीत के लिए उपयुक्त नहीं माना गया. क्योंकि इसमें तमाम ऐसी दिक्कतें हैं, जिनकी वजह से इसके जरिए राग संगीत का वह सौंदर्य शास्त्र नहीं रचा जा सकता, जो गायकी में या अन्य वाद्य यंत्रों से संभव है. मसलन, इसमें मींड (एक स्वर से दूसरे स्वर पर बिना क्रम टूटे ग्लाइड करते हुए जाना) नहीं निकल सकती. इसमें स्वरों या बोल का क्रम हमेशा टूटा रहता है. जैसे कि अगर किसी गीत या बंदिश के बोल हैं - काली घटा छाई, तो गले से या उसके नजदीक समझे जाने वाले वाद्य यंत्रों से यह ऐसे ही निकलेगी. लेकिन जलतरंग में वह कुछ ऐसा होगा- का, ली, घ, टा, छा, ई.’ इस मिसाल के पक्ष में दक्षिण भारत के कलाकारों की दलील दी जाती है, जो जलतरंग को वायलिन की संगत के साथ बजाते हैं. क्योंकि जलतरंग की तकनीकी खामियों को वायलिन काफी हद ढंक लेता है और इस तरह राग संगीत का सौंदर्य बना रहता है. जानकारों की मानें तो इन्हीं कारणों से फिल्म संगीत आदि में जलतरंग को प्रभावोत्पादक वाद्य यंत्र के तौर पर ही अधिक इस्तेमाल किया गया. लेकिन वह चलन भी सिंथेसाइजर वगैरह आने के बाद कम हो गया है. हालांकि जलतरंग वादक इन तर्कों से खुद को सहमत नहीं पाते.

बहरहाल, जलतरंग से निकला संगीत जानकारों के बीच बहस का विषय हो सकता है. लेकिन इससे निकला संदेश शायद ही बहस की गुंजाइश छोड़ता हो कि पर्यावरण (जल-वायु-जंगल-जमीन) के साथ सामंजस्य बनाकर रहिए. संबंधों और रिश्तों में संतुलन रखिए, अपने अपनों को स्पेस दीजिए. ताकि जिंदगी ट्यून में यानी कि सुर में रहे और जीवन संगीत दुर्लभ न होने पाए.