अगर नरेंद्र मोदी अभी गुजरात के मुख्यमंत्री होते और इस राज्य की स्थितियां वैसी ही होतीं, जैसी उनके कार्यकाल में थीं तो निश्चित तौर पर वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री होते. बतौर मुख्यमंत्री अपने आखिरी के कुछ सालों में नरेंद्र मोदी की छवि कुछ इस तरह की बनी थी कि वे देश के दूसरे मुख्यमंत्रियों से बिल्कुल अलग दिखते थे. लेकिन न तो अब वे गुजरात के मुख्यमंत्री हैं और न ही वहां की स्थितियां पहले जैसी हैं.

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने से मुख्यमंत्रियों की आपसी प्रतिस्पर्धा कई तरह से बदल गई. सबसे पहला बदलाव तो इसलिए हुआ कि वे प्रधानमंत्री बनते ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष पर एकछत्र राज की स्थिति में भी पहुंच गए. इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा शासित प्रदेशों के जिन मुख्यमंत्रियों का नाम कभी प्रमुखता से लिया जाता था, वे आज एक तरह से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी पर निर्भर हो गए हैं. उदाहरण के तौर पर कभी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर भी देखा जाता था. वे आज ताकतवर तो हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि अब दोनों की कोई तुलना ही नहीं है.

2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को अपने बूते मिले बहुमत ने मुख्यमंत्रियों की प्रतिस्पर्धा को एक और तरीके से प्रभावित किया. जिस तरह से 30 साल बाद किसी पार्टी को अपने बूते बहुमत मिला, उससे कई लोगों को यह डर भी सताने लगा है कि कहीं यह केंद्र की सत्ता में गठबंधन राजनीति का अंत तो नहीं है. इस पृष्ठभूमि में वे मुख्यमंत्री 2014 के पहले के मुकाबले थोड़े कमजोर नजर आने लगे हैं जिनके बारे में यह माना जाता है कि गठबंधन की राजनीति में उनकी स्वीकार्यता अधिक होगी.

महामुख्यमंत्री चुनने की प्रक्रिया में सत्याग्रह की संपादकीय टीम ने छह पैमाने तय किए: विकास, गवर्नेंस, पार्टी में स्थिति, राज्य के बाहर प्रभाव, गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री बनने की संभावना

कांग्रेस जिस हालत में पहुंच गई है, उसमें उसके पास किसी भी ताकतवर मुख्यमंत्री का नहीं होना बेहद स्वाभाविक है. लेकिन कांग्रेस के कमजोर होने का असर उन मुख्यमंत्रियों की ताकत पर भी पड़ता दिख रहा है जो कभी कांग्रेस के सहारे ही राष्ट्रीय राजनीति में अपनी धमक बढ़ाना चाहते थे. 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले कुछ ऐसे मुख्यमंत्री थे जिनके बारे में यह कहा जाता था कि मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस उन्हें एचडी देवगौड़ा या इंद्रकुमार गुजराल बना सकती है. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों ने पूरे समीकरण को उलट-पलट कर रख दिया.

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है अभी देश का सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री कौन है? कौन है जिसे महामुख्यमंत्री कहा जा सकता है? सत्याग्रह ने अपने स्तर पर इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की. सत्याग्रह की संपादकीय टीम ने कुछ पैमाने तय किए. उन पैमानों के आधार पर मुख्यमंत्रियों के प्रदर्शन या उनके असर को परखने की कोशिश की गई. इन पैमानों को तय करते वक्त यह ध्यान रखा गया कि न सिर्फ अपने प्रदेश में मुख्यमंत्री का काम दिखे बल्कि उसकी सियासी हैसियत भी दिखे.

इस बात का ध्यान भी रखा गया कि सूबे के बाहर किसी मुख्यमंत्री की क्या हैसियत है और उसके आधार पर वह राष्ट्रीय राजनीति पर कितना असर डाल सकता है. साथ ही यह भी समझने की कोशिश की गई कि किसी मुख्यमंत्री में प्रधानमंत्री बनने की कितनी संभावना है.

महामुख्यमंत्री चुनने की प्रक्रिया में सत्याग्रह की संपादकीय टीम ने छह पैमाने तय किए: विकास, गवर्नेंस, पार्टी में स्थिति, राज्य के बाहर प्रभाव, गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री बनने की संभावना. इन छह पैमानों पर देश के अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आंकने की कोशिश की गई.

सत्याग्रह ने इस प्रक्रिया से दो मुख्यमंत्रियों को अलग रखा. ये दो मुख्यमंत्री हैं केरल के पिनराई विजयन और असम के सर्वानंद सोनवाल. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अभी कुछ ही महीने पहले ये दोनों मुख्यमंत्री बने हैं. ऐसे में इतने कम समय में इन्हें इन छह पैमानों पर आंकना न्यायसंगत नहीं होगा.

जब भाजपा के मुख्यमंत्री इन दो पैमानों पर मजबूत नहीं दिख रहे हैं और कांग्रेस में कोई ताकतवर मुख्यमंत्री है नहीं तो फिर जाहिर है कि दूसरे दलों के मुख्यमंत्री ही महामुख्यमंत्री की दौड़ में आगे दिखेंगे

कई सरकारी रिपोर्ट, जमीनी राजनीतिक हालात और राजनीतिक जानकारों की राय के आधार पर सत्याग्रह ने मुख्यमंत्रियों की स्थिति को जब अपने इन छह पैमानों पर समझने की कोशिश की तो कई आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए. भाजपा के कुछ मुख्यमंत्रियों का प्रदर्शन विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर अच्छा दिखा. इनमें से राज्य से बाहर असर और गठबंधन की राजनीति में स्वीकार्यता के पैमाने पर शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह जैसे मुख्यमंत्री अच्छी स्थिति में दिखाई दिये. लेकिन पार्टी के अंदर हैसियत और प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं के पैमाने पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों के प्रदर्शन ने उन्हें ताकतवर मुख्यमंत्रियों की हमारी सूची में नीचे धकेल दिया.

जब भाजपा के मुख्यमंत्री इन दो पैमानों पर मजबूत नहीं दिख रहे हैं और कांग्रेस में कोई ताकतवर मुख्यमंत्री है नहीं तो फिर जाहिर है कि दूसरे दलों के मुख्यमंत्री ही महामुख्यमंत्री की दौड़ में आगे दिखेंगे. कई राजनीतिक जानकारों को यह लगता है कि अगर मोदी कमजोर भी होते हैं तो अभी की स्थिति में उसका फायदा कांग्रेस को नहीं होता दिखता. ऐसे में मोदी के कमजोर होने का सबसे अधिक फायदा क्षेत्रीय दलों को ही होगा.

इस पृष्ठभूमि में कई जानकार यह मानते हैं कि मोदी के कितने भी बुरे दिन आ जाएं लेकिन 2019 में कांग्रेस उस स्थिति में आती नहीं दिखती जिसमें वह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सके या फिर मनमोहन सिंह जैसा कोई प्रयोग दोहरा सके. ये लोग मानते हैं कि यदि 2019 में यदि भाजपा कमजोर होती है तो कांग्रेस के सामने देवगौड़ा या गुजराल जैसा प्रयोग दोहराने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा.

यही वह सियासी स्थिति है जिसमें सत्याग्रह की सूची में मौजूद चोटी के दस मुख्यमंत्रियों में से आठ क्षेत्रीय दलों के हैं और बाकी के दो भाजपा के हैं. कांग्रेस का कोई भी मुख्यमंत्री चोटी के इन दस मुख्यमंत्रियों की सूची में शामिल नहीं है. अगर सिर्फ शीर्ष पांच मुख्यमंत्रियों की बात करें तो इनमें से चार क्षेत्रीय दलों के हैं.

अब भी भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्रियों के मुकाबले शिवराज सिंह चौहान मजबूत दिखते हैं और इसीलिए वे चोटी के पांच मुख्यमंत्रियों में भी शामिल हैं. शीर्ष दस में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी हैं. जबकि चोटी के दस मुख्यमंत्रियों में शामिल आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू, बिहार के नीतीश कुमार, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, तमिलनाडु की जयललिता, ओडिशा के नवीन पटनायक, तेलंगाना के चंद्रशेखर राव और जम्मू-कश्मीर की महबूबा मुफ्ती न तो भाजपा से हैं और न ही कांग्रेस से. इन आठ में से कम से कम छह नाम ऐसे हैं, जिन्हें एक-दूसरे से कम नहीं कहा जा सकता. ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि इनमें से महामुख्यमंत्री आखिर है कौन?

महामुख्यमंत्री-2016

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 आखिर नीतीश कुमार में ऐसा क्या है कि वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री हैं?

#2 अनिश्चितता का पर्याय होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल उम्मीदें जगाते हैं

#3 क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पिछली गलतियों से जरूरी सबक ले चुके हैं

#4 शिवराज सिंह 2013 जितने ताकतवर नहीं हैं पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा हैं

#5 ममता बनर्जी : जिनसे पार पाना फिलहाल तो बंगाल में किसी के लिए संभव नहीं लगता

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्री पहले पांच में हो सकते थे और एक इस सूची से बाहर