बड़ा विचित्र सा मरीज था वह. बेंगलुरू के एक निजी अस्पताल में भर्ती था. प्रोस्टेट (पौरुष ग्रंथि) कैंसर से जूझ रहा था. हालत दिनों-दिन बिगड़ रही थी. लेकिन सृजन के लिए उसके मन में अब भी बच्चों सी बेचैनी थी. महज नौ साल की उम्र में इसी बेचैनी ने उसे घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. इस वक्त (73वें साल में) दुनिया छोड़ने की दहलीज पर था. लेकिन मन माने तब न. …और इसी बेचैनी में एक दिन पलंग के सिरहाने बैठी पत्नी (जो अब सिर्फ प्रेमिका और मित्र रह गई थी. फिर भी दिन-रात तीमारदारी में लगी थी) से वह कहने लगा, ‘मैं निष्क्रिय रहकर मरना नहीं चाहता. तुम बच्चों के लिए कोई नाटक बनाओ. मैं उसके गीतों का संगीत तैयार करूंगा.’ वह मना नहीं कर सकी. जानती थी, यही इस मरीज की दवा है. उसने बच्चों के लिए नाटक तैयार किया, ‘कॉकेशियन चॉक सर्किल (खड़िया का घेरा).’ इस नाटक के लिए 12 गीत लिखे गए और उस मरीज ने डॉक्टरों के मना करने के बावजूद अस्पताल के पलंग पर बैठे-बैठे ही उन गीतों के लिए संगीत रच डाला.

पत्नी प्रेमा के लिए उस महान शख्सियत का यह आखिरी सृजनकर्म था, जिन्हें भारतीय रंगमंच में बाबूकोड़ी वेंकटरमण कारंत (बी. वी. कारंत) के नाम से जानते हैं. वे कहते थे, ‘जब तक नाटक करता रहूंगा, तभी तक जिंदा रहूंगा.जब तक जिंदा रहूंगा, नाटक करता रहूंगा.’ इस बात को वे सोलह आने सच साबित कर गए. आखिरी सृजन के कुछ दिन बाद ही वह कोमा में चले गए. और पांच दिन तक इस हाल में रहने के बाद दुनिया से भी रुखसत हो गए. वह तारीख थी, एक सितम्बर 2002.

‘कारंत जी कहीं से भी संगीत या नाटक के लिए प्रभावोत्पादक और सारतत्व खींच लेते थे. लगता था, जैसे पशु-पक्षियों सहित प्रकृति और पास-पड़ोस की हर ध्वनि से वे परिचित हैं’

कला और संगीत तो कारंत कहीं से भी खींच लेते थे

मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय (एमपीएसडी) के वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक चटर्जी ने करीब सात साल तक बी. वी. कारंत कारंत के साथ उनके नाटकों में बतौर अभिनेता काम किया. इस दौरान हुए अनुभवों को साझा करते हुए वे कहते हैं, ‘कारंत जी कहीं से भी संगीत या नाटक के लिए प्रभावोत्पादक और सारतत्व खींच लेते थे. लगता था, जैसे पशु-पक्षियों सहित प्रकृति और पास-पड़ोस की हर ध्वनि से वे परिचित हैं. उसे समझते हैं. यह गुण उन्हें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अपने गुरु पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से मिला था. ओंकारनाथ जी के बारे में बताते हैं कि वे अक्सर शेर-भालू जैसे हिंसक जानवरों के बाड़े के सामने भी गीत-संगीत शुरू कर देते थे. ताकि पता लग सके कि उनके व्यवहार में संगीत का किस तरह असर हुआ. अपने इस रियाज से ओंकारनाथ जी पशु-पक्षियों और प्रकृति के अन्य तत्वों का व्यवहार तथा उनकी ध्वनियों को समझने लगे थे. और आगे चलकर यही कारंत जी ने भी किया.’

आलोक इस सिलसिले में बी. वी. कारंत के आखिरी सालों का ही एक दिलचस्प वाकया सुनाते हैं. उनके मुताबिक, ‘यह 1999 के आखिरी और 2000 के शुरुआती महीनों का किस्सा होगा. दिल्ली स्थित महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय ने कारंत जी से सुमित्रानंदन पंत की कविताओं के लिए संगीत तैयार करने का आग्रह किया था. क्योंकि पंत जी का जन्म शताब्दी समारोह होने वाला था. लेकिन इसी बीच, कारंत जी को कैंसर की बीमारी का पता चला और वे ऑपरेशन के लिए बेंगलुरू चले गए. ऑपरेशन के कुछ ही दिन बाद वे अपना काम (पंत की कविताओं की रिकॉर्डिंग) पूरा करने के लिए दिल्ली आए. पहले दिन जैसे ही वे रिकॉर्डिंग रूम में पहुंचे और वहां का दरवाजा खोलकर आगे बढ़ने लगे, तो पीछे से आवाज आई- ‘चूं ssssss ठक्क.’ यह दरवाजा बंद होने की आवाज थी, जिसे सुनते ही वे ठिठक गए. उन्होंने पलटकर फिर दरवाजा खोला और वह दोबारा पहले जैसी ही आवाज करते हुए अपने आप बंद हो गया. यह सुनते ही उन्होंने मजाकिया लहजे में दरवाजे को हाथ जोड़ते हुए कहा - आप (दरवाजा) तो पूरे सुर में हैं. उनके साथ मौजूद लोगों को लगा कि यह महज एक मजाक है. लेकिन वे लोग उस वक्त अचरज में पड़ गए, जब कारंत जी ने संगीत रिकॉर्डिंग की शुरुआत ही दरवाजे की उस आवाज के साथ की. वह अद्भुत अनुभव था.’

उनके लिए नाटक का मतलब यह नहीं था कि कुछ लोगों को इकट्ठा कर लिया, उन्हें भूमिकाएं दे दीं और हो गया. नाटक उनके लिए ‘जीवन की व्याख्या’ थी

कारंत के लिए कला वह गतिशील परम्परा थी, जिसका रुकना उसका सड़ जाना था

आलोक के मुताबिक, ‘कारंत को ‘विशुद्ध भारतीय आत्मा’ कहा जा सकता है. उन्होंने भारत के हर राज्य की संस्कृति, खान-पान, परम्पराओं को देखा. फिर नाटक किया. उनके लिए नाटक का मतलब यह नहीं था कि कुछ लोगों को इकट्ठा कर लिया, उन्हें भूमिकाएं दे दीं और हो गया. नाटक उनके लिए ‘जीवन की व्याख्या’ थी. उनका मानना था कि ‘कला एक गतिशील परम्परा है. यह रुक गई तो सड़ जाएगी.’ इसीलिए उन्होंने असम, मणिपुर, दिल्ली, चेन्नई, बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, पंजाब के न जाने कितने शहरों में नाटक और कार्यशालाएं कीं. पूरे हिन्दुस्तान में घूम-घूमकर रंगमंच के लिए देश में सबसे ज्यादा काम उन्होंने ही किया. उन्होंने जैसे पूरे देश की नाट्य परम्परा को अंतस्थ कर रखा था.’

कारंत से मौलिक हिंदी रंगमंच और रंग आंदोलन की शुरुआत मानी जा सकती है

आलोक बताते हैं, ‘मौलिक हिंदी रंगमंच की खोज कारंत जी ने ही की. एनएसडी (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) में पढ़ते हुए उन्होंने पहली बार भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘विद्यासुंदर’ और ‘अंधेरनगरी’ किया. यहीं उन्होंने शेक्सपियर के ‘मैक्बेथ’ को यक्षगान शैली में मिलाकर ‘बरनम बन’ के रूप में पेश कर दिया. ‘बरनम बन’ यानी बीहड़ जंगल, जो मानवीय आकांक्षाओं-अपेक्षाओं का है. उसके बाद एनएसडी के ही कुछ साथियों के साथ उन्होंने ‘दिशांतर’ नाम का समूह बनाया. यही समूह देश में पहली बार हिंदी में रंगआंदोलन लेकर आया. शौकिया रंगमंच में होते हुए भी इस समूह ने 99 शो कर लिए थे. मगर 100वां इसलिए नहीं किया कि उन्हें पेशेवर टैक्स भरना पड़ता. पैसे तो किसी के पास होते नहीं थे. इसलिए 99 पर ही मामला खत्म कर दिया...’

‘...बनारस में कारंत जी ने जयशंकर प्रसाद के ‘चंद्रगुप्त’ और ‘स्कन्दगुप्त’ जैसे नाटक किए. भोपाल रंगमंडल में उन्होंने प्रसादका ही ‘विषाख’, गिरीष कर्नाड का ‘हयवदन’ और विजय तेन्दुलकर तथा बसंत देव का ‘घासीराम कोतवाल’ किया. कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्रम’ (संस्कृत नाटक) को बुंदेली और शूद्रक के ‘मृच्छकटिकम’ को मालवी भाषामें (गारा की गाड़ी के नाम से) कर डाला. बच्चोंके साथ गंभीरता से सबसे ज्यादा नाटक उन्होंने किए. चार से 400 तक बच्चों के समूह के साथ उन्होंने नाटक किए, कार्यशालाएं कीं. कर्नाटक की गुब्बी वीरण्णा कम्पनी के साथ काम करते हुए पारसी थिएटर के तमाम गुण वे नौ से 15 साल की उम्र में ही आत्मसात कर चुके थे...’

कारंत की बनाई फिल्म ‘चोमना डुडी’ (चोमना आदमी का नाम और डुडी यानी बाजा) को देखकर फिल्म समीक्षक ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखा - भारत में एक और सत्यजीत पैदा हो गया है

‘...जब लौटकर फिर बेंगलुरु गए तो वहां के सारे कलाकारों को मिलाकर एक समूह बनाया, ‘बेनका’ (बेंगलुरू नगर कलाकार). उन लोगों ने कन्नड़ नाटकों को लेकर काफी प्रयोग किए. मैसूरू में रंगायन की स्थापना की. इस तरह कारंत ने हिंदी में तो रंग आंदोलन शुरू किया ही, बेजान पड़े कन्नड़ रंगमंच को भी खड़ा कर दिया. इसके बाद उनकी नजर परम्परागत थिएटर पर पड़ी, जो दिनों-दिन खत्म हो रहा था. ऐसा ही एक समूह हैदराबाद में है, ‘सुरभि’, इकलौती पारसी थिएटर कम्पनी, जो अब तक है. एक समय इसमें 400 कलाकार होते थे. सब एक ही परिवार के. कारंत जी ने परम्परागत थिएटर को बचाने की गरज से इनके साथ एक नाटक किया ‘बस्सी यम्मा यादम्मा’ जो सुपरहिट हुआ. इसके बाद सुरभि ने आजीवन के लिए कारंत जी को अपना डायरेक्टर बना लिया.’

कारंत ने जब फिल्म बनाई तो उन्हें दूसरा सत्यजीत राय कहा जाने लगा

आलोक बताते हैं, ‘कारंत जी ने फिल्में भी कर के देख लीं. उन्होंने एक फिल्म बनाई ‘वंशवृक्ष’ (1972), जो राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लाई. फिर 1975 में दूसरी बनाई, ‘चोमना डुडी’ (चोमना आदमी का नाम और डुडी यानी बाजा). यह सत्यजीत राय की फिल्म को पीछे छोड़ लंदन फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म/बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड ले आई. इसके बाद फिल्म समीक्षक ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखा- भारत में एक और सत्यजीत पैदा हो गया है. मगर कारंत जी को लगा कि फिल्म निर्माण में चुनौती नहीं है. ‘मृच्छकटिकम’ करने में चुनौती ज्यादा है. लिहाजा, उन्होंने फिल्म करना छोड़ दिया. हालांकि बीच में कुछ फिल्में की, मगर फिल्म-निर्माण को करियर नहीं बनाया...’

‘...कारंत जी के द्वारा चुनौतियां लेने और हमेशा नया करने की एक और मिसाल है. वे जिस धारवाड़ इलाके में पैदा (कुक्कजे, बाबूकोड़ी गांव) हुए, वहीं से यक्षगान का जन्म होता है. इसे वे बचपन से सुनते आए थे. लेकिन अपने करियर में उन्होंने सिर्फ एक बार (‘बरनम बन’ नाटक में) ही यक्षगान का इस्तेमाल किया. क्योंकि उनका मानना था कि यह तो हमें आता है. इसमें कोई चुनौती नहीं है. कुछ अलग करना चाहिए. वे इसीलिए कई बार हबीब तनवीर की आलोचना भी करते थे कि उन्होंने दूसरी संभावनाओं पर विचार नहीं किया. इसी तरह, कारंत जी लोक परम्परा से होते हुए भी उसके सारतत्व ले लेते हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं करते. जैसे ‘हयवदन’ में भागवत का चरित्र यक्षगान से लिया गया. मगर बाकी यक्षगान की इस नाटक में कोई भूमिका नहीं है.’

साहित्य, संगीत, नाटक, फिल्म, जैसे सब कुछ कारंत की हद और जद में था. इसीलिए तो लोग उन्हें महज रंगकर्मी नहीं, बल्कि रंगचिंतक और रंगमनीषि जैसे विशेषण भी देते हैं

कारंत मानते थे कि माध्यम श्रव्य-दृश्य है, इसलिए संगीत को पहले तवज्जो मिलनी चाहिए

आलोक एक और खास चीज पर रोशनी डालते हैं, ‘आम तौर पर ज्यादातर नाट्य निर्देशक पहले दृश्य सोचते हैं. मगर कारंत जी पहले गाने सोचते थे. उसके संगीत के बारे में, कितने लड़के-लड़कियों की आवाज लगेगी, बजने वाले साज कौन से होंगे, ध्वनि प्रभाव, आदि के बारे में विचार करते थे. इस तरह पूरा साउंड ट्रैक तैयार हो जाने के बाद वे उसके दृश्यों पर काम करते थे. उनका कहना था कि यह श्रव्य-दृश्य यानी ऑडियो-विजुअल माध्यम है, तो इसे उसी तरह तैयार करना चाहिए. वे मानते थे कि संगीत अपने आप में काफी कल्पनाशील और प्रभावकारी माध्यम है. इसलिए नाटक में संगीत के इस्तेमाल और दर्शकों पर उसके प्रभाव के बारे में पहले विचार कर लिया जाना चाहिए…’

‘...कारंत जी ने अपने किसी भी नाटक के लिए 1970 के दशक में पहली बार गाना गाया. ‘हयवदन’ के लिए ‘गजवदन हे रम्भा…’ इसे सुनकर पूरा सभागार मंत्रमुग्ध सा हो गया. यह इतना लोकप्रिय हुआ कि इसके बाद उनके हर नाटक, नाट्य संगीत या अन्य आयोजन की शुरुआत हमेशा ‘गजवदन’ से ही हुई. …ये स्तर था, उनकी गायकी और संगीत की समझ का.’

साहित्य, संगीत, नाटक, सब कारंत की हद और जद में था

जाने-माने साहित्यकार उदयन वाजपेयी कहते हैं, ‘साहित्य के मामले में कारंत का दायरा इतना बड़ा था कि वे एक तरफ तो भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक ‘अंधेर नगरी’ करते दिखते हैं. जिसे शायद स्कूल का बच्चा भी डायरेक्ट कर ले. क्योंकि भारतेंदु की रचनाएं बेहद सहज-सरल हैं. वह इसलिए कि भारतेंदु अपने समय में हिन्दी गढ़ ही रहे थे, इसलिए उनके लिए ‘आसान भी चलेगा’ वाला मामला था. क्योंकि तब लोगों को हिन्दी की तरफ आकर्षित करना उनका मुख्य मकसद था...’

‘...वहीं दूसरी तरफ बी. वी. कारंत, जयशंकर प्रसाद की ‘चंद्रगुप्त’, ‘स्कन्दगुप्त’ जैसी जटिल और चुनौती पूर्ण नाट्य रचनाओं को भी मंच पर उतार लाते हैं. जबकि प्रसाद गंभीर हैं. वे सटीकता की मांग करते हैं. उन तक सरल कुछ नहीं चलता. वे राष्ट्रप्रेम, इतिहास, भारतीय संस्कृति, आर्य गौरव, ब्राह्मणवाद, सबकी बात करते हैं. इसीलिए उनकी रचनाओं को मंच पर उतारने के लिए साहित्य, कविता, छायावाद का ज्ञान होना चाहिए. इसीलिए प्रसाद की नाट्य रचनाओं को एनएसडी का निर्देशक भी निर्देशित कर ले, यह जरूरी नहीं. क्योंकि प्रसाद को उनके पूरे दायरे में समझने वाला नाट्य निर्देशक चाहिए. साथ ही, इन तमाम चीजों को समझने वाले 40 कलाकार भी, जो आसान नहीं है..’

‘...मगर जिस कारंत ने बचपन में मां से यक्षगान शैली में पुरंदर दास के भजन और कथावाचक पिता से रामायण-महाभारत, जैसे ग्रंथों के प्रसंग सुने हों, गुब्बी थिएटर में जिसे राजकुमार (सिनेस्टार) और जी.वी. अय्यर जैसे कलाकारों का साथ मिला हो, बनारस में जिसने हजारी प्रसाद और महावीर प्रसाद द्विवेदी से हिन्दी साहित्य तथा पंडित ओंकारनाथ जैसी हस्ती से संगीत की शिक्षा ली हो, उसके लिए तो साहित्य से, संगीत, थिएटर, फिल्म और लोक परम्परा तक, जैसे सब कुछ हद और जद में था. यही वजह है कि लोग उन्हें सिर्फ रंगकर्मी नहीं मानते, ‘रंगचिंतक और रंगमनीषि’ जैसे विशेषण भी देते हैं. पर जिस शख्स ने जिंदगीभर अपने रचनाधर्म को तपस्या सरीखा साधा हो, उसके लिए तो ये विशेषण भी शायद कम ही कहलाएंगे.’