इस समय भारतीय जनता पार्टी की कई राज्यों में सरकार है. लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि भाजपा के जितने भी मुख्यमंत्री हैं, उनमें अभी सबसे ताकतवर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही हैं. इसके साथ-साथ इस बात से भी इनकार करने वाले लोगों की संख्या न के बराबर होगी कि शिवराज उतने ताकतवर अभी नहीं हैं जितने कि वे सितंबर, 2013 तक थे. 2013 के सितंबर महीने का जिक्र इसलिए क्योंकि इसी महीने में गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था.

इस घोषणा से पहले केंद्र की जिम्मेदारी को लेकर नरेंद्र मोदी का जब भी जिक्र होता था तो साथ में शिवराज सिंह चौहान का नाम भी इसमें जुड़ जाता था. लेकिन उस घोषणा से यह तय हो गया कि भाजपा की आगे की राष्ट्रीय राजनीति नरेंद्र मोदी को आगे करके चलेगी.

जब भाजपा को अपने बूते बहुमत मिल गया तो एक तरह से पार्टी में मोदी का एकछत्र राज कायम होने का रास्ता भी साफ हो गया. इस पृष्ठभूमि में अगर भाजपा की राजनीति को समझें तो पता चलेगा कि 2013 के सितंबर के बाद शिवराज सिंह चौहान लगातार कमजोर हुए हैं.

उनकी ताकत उस वक्त और बड़ी लगती है जब यह पता चलता है कि उन्होंने अपने राज्य में विपक्ष को तकरीबन तहस-नहस कर दिया है

लेकिन इन सब स्थितियों के बावजूद शिवराज सिंह चौहान सत्याग्रह के महामुख्यमंत्री सर्वेक्षण में चौथे स्थान पर हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एक मुख्यमंत्री के तौर पर वे अपने तीनों कार्यकाल में प्रभावी दिखे हैं. विकास के मामले में उन्होंने मध्य प्रदेश में काफी अच्छा काम किया है. कृषि के साथ-साथ उद्योग की तरफ भी उन्होंने जरूरी ध्यान दिया है. उनके कार्यकाल में मध्य प्रदेश कई फसलों के उत्पादन के मामले में देश का शीर्ष राज्य बना. कुपोषण के लिए बदनाम मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई प्रयोग शिवराज सिंह चौहान ने किए हैं. गवर्नेंस के पैमाने पर भी वे प्रभावी दिखते हैं. राज्य में उन्होंने अपनी पहचान जनता के मुख्यमंत्री के तौर पर बनाई है.

यही वजह है कि वे पार्टी में भले ही कमजोर हुए हों लेकिन न सिर्फ अपने राज्य में बल्कि मध्य प्रदेश के बाहर भी उनके प्रति लोग अच्छी राय रखते हैं. हालांकि, व्यापम शिवराज सिंह चौहान की साफ छवि पर एक दाग जैसा है और इसकी चर्चा पूरे देश में हुई है. फिर भी अगर देखा जाए तो कुल मिलाकर उनकी पहचान एक साफ-सुथरी छवि वाले नेता की है. यह एक ऐसी छवि है जो आम आदमी को पसंद आती है.

यही बात उनके पक्ष में तब जाती दिखती है जब गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता के पैमाने पर उन्हें देखा जाए. अभी भाजपा के पास नरेंद्र मोदी हैं लेकिन अगर कभी कोई ऐसा मोड़ आता है जब पार्टी को उनके विकल्प की जरूरत हो तो जो लोग प्रमुखता से दिखते हैं, उनमें शिवराज अहम हैं. यही अहमियत उन्हें पार्टी के अंदर थोड़ा कमजोर होने के बावजूद भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्रियों के मुकाबले ताकतवर बनाए हुए है.

उनकी ताकत उस वक्त और बड़ी लगती है जब यह पता चलता है कि उन्होंने अपने राज्य में विपक्ष को तकरीबन तहस-नहस कर दिया है. कुछ उसी अंदाज में जिस अंदाज में नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए वहां किया था.

यहां पर यह कहना भी जरूरी है कि यदि मनोहर पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री अब भी होते तो भाजपा के मुख्यमंत्रियों में से वे अकेले ऐसे होते तो सत्याग्रह के महामुख्यमंत्री सर्वेक्षण में शिवराज सिंह चौहान को टक्कर दे सकते थे. लेकिन अब वे केंद्र में रक्षा मंत्री हैं.

महामुख्यमंत्री-2016

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 आखिर नीतीश कुमार में ऐसा क्या है कि वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री हैं?

#2 अनिश्चितता का पर्याय होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल उम्मीदें जगाते हैं

#3 क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पिछली गलतियों से जरूरी सबक ले चुके हैं

#4 शिवराज सिंह 2013 जितने ताकतवर नहीं हैं पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा हैं

#5 ममता बनर्जी : जिनसे पार पाना फिलहाल तो बंगाल में किसी के लिए संभव नहीं लगता

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्री पहले पांच में हो सकते थे और एक इस सूची से बाहर