यह एक ऐसी खबर थी जो मंगलवार दिन भर मजाक का विषय बनी रही. उत्तर प्रदेश के देवरिया में आयोजित राहुल गांधी के एक चुनावी कार्यक्रम के बाद भीड़ में खाट लूटने की होड़ मच गई. इस कार्यक्रम का नाम ही खाट सभा था. 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों के दौरान नरेंद्र मोदी ने चाय पर चर्चा की थी. उनका यह कार्यक्रम काफी सफल रहा था. कुछ उसी तर्ज पर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में खाट सभाएं करना चाहती है. देवरिया में ये खाटें इसी मकसद से लाई गई थीं.

अंग्रेजी बोलने वाले शहरी भारत के ड्राइंग रूम में ग्रामीण भारत का प्रवेश दुर्लभ ही होता है. जब होता है तो इसी तरह मजाक उड़ाने के संदर्भ में होता है. मंगलवार को देवरिया की घटना के बाद ट्विटर पर खाट को लेकर मजाक करती लाइनों की बाढ़ सी आ गई. यह एक तरह से भारत की गरीबी का मजाक उड़ाना ही था. यह न सिर्फ अरुचिकर है बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि भारत का खाया-पिया अघाया वर्ग देश की समस्याओं से किस कदर कट चुका है.

ग्रामीण भारत की बदहाली कभी-कभी ही देश के अंग्रेजी अखबारों की सुर्खियां बनती है. टीवी चैनलों के प्राइम टाइम पर बलूचिस्तान जैसे मुद्दों को समर्पित हो गए हैं जिनका देवरिया में रहने वाले किसी शख्स की जिंदगी में कोई महत्व नहीं है. आजकल तो हमारे राष्ट्रीय नेता भी गरीबी की बात बहुत कम ही करते हैं. प्रधानमंत्री के सबसे जोरदार संदेश विदेशी मामलों से जुड़े दिखते हैं. आजकल कोई भारत के मीडिया को देखे तो उसे लगेगा कि यह देश गरीबी से मुक्त होकर अब इससे ऊपर के मुद्दों से जूझने के लिए तैयार हो रहा है.

लेकिन यह सच नहीं है. सोमवार को ही यूनेस्को ने ऐलान किया है कि मौजूदा रफ्तार से देखा जाए तो भारत ने शिक्षा के लिए जो सार्वभौमिक लक्ष्य तय किए हैं उन तक पहुंचने में इसे 50 साल की देर हो जाएगी. वैश्विक शिक्षा निगरानी (जीईएम) नाम की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा से जुड़े लक्ष्यों को 2085 तक हासिल किया जा सकेगा.

देखा जाए तो भारत में शिक्षा कई मायनों में विशेषाधिकार है. यही नहीं, दुनिया भर में नवजात बच्चों की मौत का एक चौथाई हिस्सा हमारे देश से आता है. भारत के मुकाबले बांग्लादेश में पैदा हुए किसी बच्चे के पांच साल से ज्यादा जीने की संभावना ज्यादा है. कुपोषण और खाने की तंगी के मामले में हम अफ्रीका के कई देशों को भी मात दे रहे हैं. यह खबर शायद बहुतों ने नहीं सुनी होगी कि अपनी आबादी को खाना मुहैया कराने के मामले में नेपाल भी भारत से आगे है. यह हैरानी की बात है कि हमारे गांवों में रह रहे लोगों को आज उससे भी कम खाना नसीब हो रहा है जितना 40 साल पहले होता था.

भारत के देहात पर छाए इस संकट की झलक हम टुकड़ों-टुकड़ों में देख सकते हैं- तब जब समृद्ध समझी जाने वाली पटेल जैसी जातियां कोटे के लिए हिंसा पर उतारू हो जाती हैं और तब भी जब देवरिया में मुफ्त की खाटों के लिए लोग टूट पड़ते हैं.