2015 के अक्टूबर-नवंबर के महीने में जो लोग पंजाब की राजनीतिक स्थिति को जमीनी स्तर पर देखने-समझने की कोशिश कर रहे थे, उन सभी में से ज्यादातर की राय थी कि अगर यही स्थिति रही तो 2017 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को जीतने से कोई रोक नहीं सकता. हालांकि, इनमें से कई ऐसे भी थे जो कह रहे थे कि अगर कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथों में अपने चुनाव की कमान दे दी या यों कहें कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया तो फिर आप की राह थोड़ी मुश्किल हो जाएगी.

इसके कुछ ही समय बाद कांग्रेस ने एक तरह से पंजाब की पूरी बागडोर पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के हाथों में सौंप दी. इसके बाद धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा कि पंजाब के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच ही सीधा मुकाबला होने वाला है. सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन को पंजाब की राजनीति को समझने वाले लोग सत्ता की दौड़ से बाहर मानने लगे थे. कहा जा रहा था कि 2007 से ही पंजाब की सत्ता संभालने वाले इस गठबंधन की सरकार के खिलाफ लोगों में काफी गुस्सा है.

आम आदमी पार्टी उस वक्त अपनी विरोधी कांग्रेस और अकाली दल-भाजपा गठबंधन पर बढ़त बनाती दिखी जब कुछ हफ्ते पहले नवजोत सिंह सिद्धू ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. उस वक्त यह उम्मीद की जा रही थी कि सिद्धू आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं और उन्हें पार्टी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर सकती है. सिद्धू और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी अरविंद केजरीवाल के बीच इस बारे में कई दौर की बातचीत भी हुई. लेकिन कहा जा रहा है कि ऐन मौके पर केजरीवाल सिद्धू को एक निश्चित भूमिका देने से मुकर गए.

उस वक्त आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं को लगा कि नवजोत सिंह सिद्धू ने ऐसा दबाव की राजनीति के तहत किया है. इसलिए आप की ओर से सिद्धू से कोई बातचीत नहीं की गई

इसके बाद भी नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब का सियासी मैदान नहीं छोड़ा. अब वे पंजाब की राजनीति में आवाज-ए-पंजाब के नाम से नई पार्टी बनाकर कूद पड़े हैं. उन्होंने अपनी पार्टी की घोषणा करते हुए गुरुवार को जो प्रेस वार्ता की उसमें न सिर्फ अपनी पुरानी पार्टी भाजपा बल्कि पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल के अलावा आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल पर भी जमकर हमला बोला. इससे यह साफ हो गया कि अब सिद्धू और आम आदमी पार्टी में किसी तरह के समझौते की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं. सिद्धू ने जो अपनी नई पार्टी बनाई है, उसमें उनके साथ पूर्व हॉकी खिलाड़ी परगट सिंह भी शामिल हैं. पहले परगट सिंह अकाली दल के साथ थे. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में अकाली दल के कुछ और लोग उनकी पार्टी में शामिल हो सकते हैं.

आवाज-ए-पंजाब पार्टी की घोषणा के कुछ ही दिनों पहले इस पार्टी से संबंधित एक पोस्टर सोशल मीडिया पर आया था. उस वक्त आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं को लगा कि नवजोत सिंह सिद्धू ने ऐसा दबाव की राजनीति के तहत किया है. इसलिए आप की ओर से सिद्धू से कोई बातचीत नहीं की गई. इसके बाद स्वाभाविक ही था कि सिद्धू अपना अगला कदम उठाते. उनके पास भाजपा में वापस लौटने का विकल्प नहीं था और न ही वे कांग्रेस के साथ जा सकते थे. हालांकि, पंजाब में कांग्रेस के कर्ताधर्ता कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से सिद्धू को अपने पाले में लाने की कुछ कोशिशें की गई थीं. इसकी जानकारी मीडिया में भी आ रही थी और सिद्धू ने भी इसके बारे में बताया था.

सिद्धू की नई पार्टी के ऐलान के कुछ ही दिनों पहले आम आदमी पार्टी ने अपने पंजाब संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. उन्होंने पार्टी की कार्यपद्धित पर सवाल उठाए थे. छोटेपुर ने न सिर्फ टिकट बेचे जाने की शिकायत की थी बल्कि यह भी कहा था कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी अरविंद केजरीवाल से बातचीत करना असंभव सरीखा हो गया है. वे जो आरोप लगा रहे थे, उसमें उन्होंने आप के पंजाब प्रभारी संजय सिंह का नाम तो नहीं लिया था लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट ही था कि उनके अधिकांश आरोप संजय सिंह पर ही केंद्रित हैं.

इसके बाद आम आदमी पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. अब खबर यह है कि वे भी अपना नया मोर्चा बनाने वाले हैं. उन्होंने एक पदयात्रा गुरदासपुर से शुरू भी कर दी है. जो लोग पंजाब में आम आदमी पार्टी के खड़ा होने की कहानी को जानते हैं, वे कहते हैं कि इस सूबे में आप को खड़ा करने में छोटेपुर का सबसे अहम योगदान रहा है. ऐसे में आप से उऩके अलग होने का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है.

नवजोत सिंह सिद्धू से लेकर योगेंद्र यादव और छोटेपुर से लेकर धर्मवीर गांधी तक सभी को यह बात मालूम है कि अगर सबने अलग-अलग चुनाव लड़ा तो इसका फायदा सत्ताधारी गठबंधन को हो सकता है

आम आदमी पार्टी से निलंबित सांसद धर्मवीर गांधी भी एक अलग राजनीतिक मोर्चे की घोषणा कर चुके हैं. उन्होंने अपने मोर्चे के साथ पंजाब की कुछ छोटी राजनीतिक पार्टियों को जोड़ने का काम भी किया है. इनके अलावा आप से ही निकाले गए योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की अगुवाई वाली स्वराज पार्टी भी पंजाब में सक्रिय है.

बताया जा रहा है कि स्वराज पार्टी के पंजाब प्रभारी मंजीत सिंह इन नई सियासी पार्टियों को एक साथ लाकर एक महागठबंधन बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. सूत्रों की मानें तो इन दलों के नेताओं से मंजीत सिंह की बातचीत भी चल रही है. नवजोत सिंह सिद्धू से लेकर योगेंद्र यादव और छोटेपुर से लेकर धर्मवीर गांधी तक सभी को यह बात मालूम है कि अगर सबने अलग-अलग चुनाव लड़ा तो इसका फायदा सत्ताधारी गठबंधन को हो सकता है. बहुजन समाज पार्टी पहले से ही पंजाब में सक्रिय है. ऐसे में इन नेताओं को यह लगता है कि अगर वे एक नहीं हुए तो सरकार विरोधी वोट बंटेगा और अंततः इसका फायदा सत्ताधारी गठबंधन को मिल सकता है.

इस महागठबंधन के पक्ष में एक और अहम बात यह कही जा रही है कि अगर सभी एक हो गए तो पंजाब के लोगों को कांग्रेस और आप के अलावा एक और मजबूत विकल्प मिल सकेगा. ऐसी स्थिति में सूबे का सियासी परिदृश्य बदल सकता है और चार खेमे स्पष्ट तौर पर लगभग बराबरी के मुकाबले में रहेंगे. ऐसे में बाजी किसी के हाथ भी लग सकती है.