किताब से एक नज्म का अंश - ‘मैं फिर आऊंगा / वो बन कर / जो तुम्हें अच्छा लगे / तुम्हारे पास रहे / मैं तुम्हारी टीस, तुम्हारा दर्द / तुम्हारा खालीपन समेट कर / जा रहा हूं जमीं के पार /...कि इस बार / न मेरी जात अलग होगी / न मेरा रंग / न तहज़ीब न जुबान / न हैसियत न शान / न रोज़गार की फिक्र / न होगा मेरी तकदीर की / नाकामियों का जिक्र / इस बार मैं तुम्हारे हालात में आऊंगा / अपनी औकात में आऊंगा / तकलीफ की तहों से / निकाल लाऊंगा पूरी जिन्दगी / लौटूंगा / तो तुम किस नाम से मिलोगी?’


किताब - एक महीना नज़्मों का

लेखक - इरशाद कामिल

प्रकाशक - वाणी प्रकाशन

मूल्य - 395 रुपये


अमूमन ऐसा होता है कि किसी की मोहब्बत का जिक्र, जिसमें मासूमियत और सच्चाई साफ झलकती हो, सुनते ही दर्शक, श्रोता या फिर पाठक, अपनी मोहब्बत के दौर में पहुंच जाते हैं. शायद इसलिए कि हर इंसान अपनी जिंदगी के उस दौर में बार-बार लौटकर जाना चाहता है. कुछ इसी भावना के साथ ‘एक महीना नज़्मों का’ की नज़्मों को भी बार-बार पढ़ते चले जाने का मन होता है.

इरशाद कामिल की इस किताब का नाम ‘एक महीना नज़्मों का’ की जगह ‘इश्क की नज़्में’ भी हो सकता था. पूरी किताब इश्क, मोहब्बत के अलग-अलग वरक खोलती जाती है 

इस नज़्म संग्रह में इरशाद कामिल की रोमानी डायरी की नज़्में दर्ज हैं. लगभग सभी नज़्में प्रेम के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं. इरशाद ऐसे अदभुत कलमनवीस हैं जिनके दिल में जकड़न के खिलाफ आग और प्रेम की ऊष्मा एक साथ रहती है. इरशाद के भीतर की यह आग उनके गानों में साफ दिखती है. खासतौर से रॉकस्टार फिल्म के उस गाने में ‘तुम लोगों की इस दुनिया में हर कदम पे इंसां गलत... मतलब कि तुम सबका मुझ पर मुझसे भी ज्यादा हक है.’ जहां तक इस किताब की बात है इन नज्मों में वे खुद को ऐसे प्रेमी के रूप में देखते हैं जिसने हमेशा प्रेम किया है और सबसे किया है - ‘जब से दुनिया बनी है मैं मोहब्बत करता आ रहा हूं और जब तक रहेगी मोहब्बत करता रहूंगा... आजकल भी तो मैं घूमता हूं हर गली-मोहल्ले में आशिक बनकर.’

किताब की शुरुआत में लेखक ने खुद को एक अजनबी की नजर से देखने की कोशिश की है. यह वो दौर था जब लेखक इरशाद कामिल का जन्म हो रहा था. ‘रोमानी डायरी से’ वाले हिस्से में इरशाद खुद से की गई बातचीत में लिखते हैं - ‘मैंने पूछा, माचिस है? वो मुस्कुराता हुआ बोला, आग है... आप न जाने इरशाद कामिल को कैसे, क्यों और कितना जानते हैं... आप उसे जो भी समझें लेकिन मैं उसे बेहद मामूली और फालतू दिमाग वाला इंसान मानता हूं. मामूली बातों से खुश भी हो जाता है और नाराज़ भी. खुशी कभी-कभार जाहिर कर भी देता है लेकिन नाराजगी ऐसे संभाल लेता है जैसे वो उसकी कमाई हो.’

लेखक कहता तो है कि इश्क से गैरजरूरी काम इस कामकाजी दुनिया में कोई नहीं, लेकिन उसका यकीं है कि वह इश्क ही है जो इस दुनिया को जीने लायक बनाए हुए है - ‘चलो मोहब्बत की बात करें अब / मैले जिस्मों से उपर उठ कर /...चलो मोहब्बत की बात करें / जिन्दगी के पैरों तले / बेरहमी से रौंदे जाने के बाद / मरहम लगाएं जख्मी वजूद पर / जो शर्म से आंखें झुका कर / बैठा है सपनों के मजार पे / इससे बुरी कोई बात नहीं कर सकते / हम अपनी ही जिद में / धोखा दे चुके हैं अपने आपको / खेल चुके हैं खुद अपनी इज्जत से / भोग चुके हैं झूठ को सच की तरह... / अब इन हालात में / कोई गैरजरूरी बात ही कर सकते हैं हम / आओ मोहब्बत की बात करें.’

इरशाद कामिल हमारे दौर में गुलजार का ही एक और संस्करण हैं. वे गुलजार की ही तरह रोजमर्रा के जीवन से जुड़े शब्दों, कामों और घटनाओं को ऐसे गूंथते हैं कि उसे पढ़ने वाले उनके मुरीद हो जाएं

इरशाद कामिल की इस किताब का नाम ‘एक महीना नज़्मों का’ की जगह ‘इश्क की नज़्में’ भी हो सकता था. पूरी किताब इश्क-मोहब्बत के अलग-अलग वरक खोलती जाती है और यह पढ़ते-पढ़ते आपको इसके इश्क में डूबे शब्दों और लेखक से मोहब्बत सी होती जाती है - ‘मैं अपने आप को रख के / ख्याल में उसके / ये भूल जाऊं कभी / खुद को रख दिया था कहीं / वो अपने आप को रख के / नसीब में मेरे / उमर भर फिकर न करे अपनी‘

इरशाद कामिल हमारे दौर में गुलजार का ही एक और संस्करण हैं. वे गुलजार की ही तरह रोजमर्रा के जीवन से जुड़े शब्दों, कामों और घटनाओं को ऐसे गूंथते हैं कि उसे पढ़ने वाले उनके मुरीद हो जाएं - ‘मुंडेरों पर पसरी मोहब्बत / सर्दी में खु़श्क गालों से / टपक-टपक पड़ती है / और शाम छलक जाती है / ये किताबें ले जाओ / जिनकी ओट से तुमने मुझे देखा था / ट्रांजिस्टर / जिसपे चलता हुआ एक गीत / अचानक ऊंचा कर दिया था तुमने / दोपहर के खाने के बर्तन / जिन्होंने मेरे लिए मुनादी की / लंच टाईम की/....पड़ोस की छत पर कल फिर धूप की राह देखेगा ख्याल पकाने के लिये.’

यूं तो इश्क बेहद निजी चीज है, लेकिन इरशाद का इश्क एक बिल्कुल अलग जमीन पर पलता-बढ़ता है. वे दुनिया से इश्क करने की बात भी करते हैं और इश्क में पूरी दुनिया के ख्याल की बात भी - ‘चल मिलके इक गीत बनायें / उसके बाद विदा हो जायें / वो गीत हो गांव की लड़की का / चुपचाप बदलती धरती का / जो संवर के रहना चाहती है / वो गीत हो आम सी खुशियों का / जो होकर भी इस दुनिया में / जाने क्यों नजर नहीं आतीं /...वो गीत हो छोटे बच्चे का / जिसे दुनियादारी चांटों से / घर में सिखलाई जाती है / वो गीत तुम्हारा अपना हो / अब जान भी ले क्या कहके ही / हर बात बताई जाती है.’

जैसे सच्चा प्रेम कोई दिखावा नहीं उसी तरह यहां प्रेम की बात बेहद सरल भाषा में कही गई है, शब्दों का जरा भी पांडित्य प्रदर्शन नहीं है

गांव से शहर तक का सफर तय करने के क्रम में किशोर और युवावस्था के प्रेम भले ही पीछे छूट जाएं लेकिन आजीवन एक टीस बनकर कलेजे में दफन हो जाते हैं. इसी भाव की खूबसूरत नज़्म है निम्मो - ‘बहुत देर तक रस्ता देखा / गांव को खुद पे हंसता देखा / उसे यकीं था लौटोगे तुम / तुम तो हो गये शहर में ही गुम / टूट गयी फिर वो बेचारी / इंतजार में हारी-हारी / निम्मो गांव की सड़क थी कच्ची / जिसको मेरे बिन रोना था / इक दिन पक्का होना था / अच्छा हुआ कि पक्की हो गयी / गांव में चलो तरक्की हो गयी / हां, पर मेरी निम्मो खो गयी’

किताब में प्रेम के जितने तीव्र रंग और खुशबुएं हैं, उस हिसाब से किताब में बनी काली-सफेद पेंटिंग कुछ खटकती हैं. रंगीन पेंटिंग किताब के मिजाज को और शोख़ बना सकती थीं. नज़्मों की गिनती के लिए देवनागरी में अंकों का चुनाव सुखद लगता है और पुराने समय की याद दिलाता है.

भौंडे गानों और उथले प्रेम के इस अंधेरे दौर में इरशाद एक उम्मीद हैं, एक राहत हैं, एक रौशनी हैं, जिनका दामन हमें कसके थामे रहना चाहिए. लेखक के लिए यह अहसास और मजबूत होना जरूरी है कि उनके शब्दों का क्या मतलब है इस समय में. हर एक शब्द इश्क के शहद में लिपटा हुआ है. पूरी किताब पढ़ने के बाद देर तक आप अपनी जबान पर वह मिठास महसूस कर सकते हैं. जैसे सच्चा प्रेम कोई दिखावा नहीं उसी तरह यहां प्रेम की बात बेहद सरल भाषा में कही गई है, शब्दों का जरा भी पांडित्य प्रदर्शन नहीं है. भाषा की सरलता और भावों की गहराई पाठकों को इरशाद का मुरीद बनाने की ताकत रखती है.

किताब किसे पढ़नी चाहिए -

1. जो खूबसूरत नज़्म पढ़ने के शौकीन हों

2. जो अच्छी नज़्म लिखना सीखना चाहते हों

3. जो भी कोई प्रेम विषय पर कुछ अच्छा और बेहद सहज पढ़ना चाहता हों.