अब यह बताने की ज़रूरत तो नहीं है कि क्यों औरंगजेब रोड का नाम बदलकर अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया. शायद औरंगजेब हिंदुस्तान के इतिहास में वह नाम है जिसे हम भुला देना चाहते हैं. इसकी देखा-देखी भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, आज के विदेश राज्य मंत्री, अकबर रोड का भी नाम बदलकर महाराणा प्रताप रोड रखना चाहते हैं. कोई बड़ी बात नहीं, शायद हो भी जाए, अभी उनकी सरकार के 3 साल जो बाकी हैं.

पिछले कुछ समय से एक और बहस का मुद्दा गर्माया हुआ है - अकबर के नाम के साथ लगने वाला ‘महान’ शब्द भी हटा दिया जाए. इसके पीछे भी लोगों के अपने-अपने तर्क हैं. यह भी कर दो,भाई, किसने रोका है? अब न तो कोई मुग़ल बचा है और अगर बचा भी है, तो उसकी क्या हिम्मत जो किसी को ऐसा करने से रोके? उसे तो इल्म भी नहीं होगा की उसकी रगों में मुग़लिया खून है. उसके नाम न तो लाल किला है और न ही ताज महल जो उसके वंशजों ने बनवाये थे और जहां से खड़ा होकर वह इस मुहीम को रोकने की दुहाई लगाए.

वह तो शायद दिल्ली की किसी गली में ख़ाक छान रहा होगा, रिक्शा चला रहा होगा, या बैठा होगा किसी बढ़ई की दूकान पर. वह उन बचे-खुचे राजाओं के वंशजों की तरह थोडे ही है जिनके नाम आज भी बेशक़ीमती महल, किले और जागीरें हैं. जिन्होंने उन्हें होटलों में तब्दील कर दिया है और खूब पैसा काट रहे हैं. जो आज भी अपने आपको राजासाहब , राजकुमार और रानी साहिबा कहलवाना पसंद करते हैं. जो राजनीति में ऊंचे और रसूखदार पदों पर बैठे हुए आज के राजा ही हैं.

अब आप कहेंगे कि यह कोई तर्क है? इससे यह साबित कैसे हो जाता है कि अकबर महान था. तो चलो एक काम करें? आज अकबर के काल की चीरफाड़ करें और देखें कि उसे महान कहना चाहिए या नहीं? बात थोड़ा पीछे से शुरू करूंगा, अगर इजाज़त हो तो?

किसी भी शासनकाल या राजा को समझने के लिए उसका आदि जानना ज़रूरी होता है. मुग़लों का आदि बाबर से था, या इससे भी पहले तुर्को और उससे भी पहले मंगोलों से. बाबर, जो पहला मुग़ल था उसकी रगों में तैमूरलंग और चंगेज़ खान का खून था. उसकी मां मंगोलों से और उसका वालिद, उम्र शेख़, तैमूरी ख़ानदान से ताल्लुक रखता था. दुनिया की तारीख इस बात की गवाह है कि ये दोनों वंश खूंखार और बर्बर समाज के प्रतिनिधि थे.

नेहरू का मत था कि अगर चंगेज़ खान, सन 1221 में हिंदुस्तान के भीतर आ गया होता तो शायद आज हिंदुस्तान का नक्शा ही कुछ और होता. दूसरी तरफ़ तैमूरलंग हिंदुस्तान के भीतर आया तो सही पर सन 1399 में लूटपाट करके वापस चला गया और अपने पीछे एक बर्बाद और उजड़ी दिल्ली छोड़ गया. लगभग 100 साल बाद समरकंद से, वो आधा मंगोल और आधा तैमूरी, जिसको हम बाबर के नाम से जानते हैं, उसे उसकी तक़दीर हिंदुस्तान से वापस न ले जाने के लिए ला रही थी.

अकबर पहला मुग़ल था जो हिंदुस्तान में पैदा हुआ. उसका बाप एक सुन्नी, उसकी वालिदा एक शिया, उसका गुरु भी एक शिया और वह पैदा एक हिंदू के घर में हुआ. उसकी परवरिश करने वाली महामंगा भी शिया थी.

इतिहासकारों का मानना है कि ‘मुग़ल’ ‘मंगोल’ शब्द के अपभ्रंश से बना है. बाबर को अपने ‘तैमूरी’ होने पर बड़ा फ़ख्र था पर तकदीर की विडंबना देखिए उसकी सल्तनत को हिन्दुस्तान में तैमूरी सल्तनत नहीं बल्कि मुग़लिया सल्तनत के नाम से जाना गया. शायद इसलिए कि तैमूरलंग के हिन्दुस्तान की छाती पर दिए हुए ज़ख्म 100 सालों में भी भरे नहीं थे.

बाबर यही कुछ 4-5 साल राज कर पाया. बाद उसके हुमायूं ने उसकी बिख़री हुई सल्तनत को संभालने का ज़िम्मा लिया पर ज्यादा कामयाब नहीं हुआ. किस्मत और धोख़े का मारा हुआ हुमायूं शेरशाह सूरी के खौफ़ से हिंदुस्तान के सिंध प्रांत (आज का पाकिस्तान) में दर-ब-दर की ख़ाक छान रहा था और उसकी बेग़म, हामिदा, जो उस वक़्त हामला थी, उसकी कोख़ में 8 महीने का बच्चा पल रहा था. वे शायद दोनों ही न बचते पर ख़ुदा को कुछ और ही मंज़ूर था. उसने उमर कोट के राजा को हुमायूं की सहायता करने के लिए भेज दिया.

उमर कोट के राजा को ऐसा करते हुए अंदाज़ा भी नहीं था कि वह हिंदुस्तान की तक़दीर बदलने जा रहा था. उमरकोट में हामिदा ने 15 अक्टूबर, सन 1542 को जिस बच्चे को जनम दिया उसे दुनिया अकबर महान के नाम से जानती है. अकबर क्या पैदा हुआ हुमायूं की तकदीर बदल गयी. शेरशाह सूरी ज़्यादा दिनों तक राज न कर पाया और 22 मई, 1545 को चल बसा. हुमायूं ने मेहनत करके हिंदुस्तान की गद्दी वापस हासिल कर ली लेकिन इसका सुख ज्यादा दिनों तक भोग न सका. वह 24 जनवरी 1556 को लाइब्रेरी की सीढियों से फिसल कर गिर गया और चल बसा.

हुमायूं के आख़िरी दिनों के कुछ फैसले समझदारी वाले थे. मरने से दो महीने पहले उसने अकबर को बैरम खान की सरपरस्ती में दे दिया था. यहां यह वाक़या काबिले ग़ौर इसलिए है कि मुग़ल तो सुन्नी थे और बैरम खान था शिया. शिया-सुन्नी के झगड़े उस समय भी आज जितने ही ख़तरनाक थे. यहां मैं एक बात कहने के लिए रुकता हूं - अकबर पहला मुग़ल था जो हिंदुस्तान में पैदा हुआ. उसका बाप एक सुन्नी, उसकी वालिदा एक शिया, उसका गुरु भी एक शिया और वह पैदा एक हिंदू के घर में हुआ. उसकी परवरिश करने वाली महामंगा भी शिया थी. क्या ये लक्षण थे इस बात के कि अकबर मध्यकालीन भारत का एक धर्मनिरपेक्ष राजा बनेगा? यक़ीनी तौर पर तो नहीं कहा जा सकता, पर हां, अकबर की सोच पर इस बात ने असर ज़रूर डाला होगा.

मैं अकबर-हेमू की पानीपत की लड़ाई, उसकी आमेर के राजा की बेटी से शादी और उसके लगभग पूरे हिंदुस्तान पर कब्ज़ा करने की दास्तां नहीं बयां करता क्योंकि बात थोड़ी संक्षेप में कहनी है. लिहाज़ा थोड़ा फ़ास्ट फॉरवर्ड करता हूं. अकबर जल्दी इस बात को समझ गया था कि हिंदुस्तान में अगर मुग़लों को रहना है तो यहां के तौर-तरीके, रिवाजों, राजपूतों से दोस्ती ये सब उसे करना होगा. उसने राजा मानसिंह को अपना सेनापति बनाया. यहां मैं फिर एक बार रुकता हूं. आपको हल्दी घाटी की लड़ाई याद है? अकबर और महाराणा प्रताप जहां आमने-सामने हुए थे. उस लड़ाई में अकबर की सेना की कमान राजा मान सिंह के हाथों में थी और महाराणा प्रताप के सेनापति का नाम था हाकिम खान सूरी. हिंदुस्तान में इससे बड़ी धर्मनिरपेक्ष बात और क्या होगी?

चलिए, वापस चलते हैं. इधर अकबर हिंदुस्तान पर अपनी पकड़ बना रहा था और उधर उलेमाओं से अपना दामन भी छुड़ाना चाह रहा था. उसने हिंदुओं के रीति-रिवाज़ों को बढ़ावा दिया. राजकाज चलाने के लिए काबिल हिंदू अफसरों की भर्ती की जिनमें राजा टोडरमल, मानसिंह, बीरबल आदि प्रमुख थे और फिर जहांगीर भी तो आधा मुग़ल ही रह गया था. जब अकबर को पारसी धर्म जानने की इच्छा हुई तो वह पारसियों में उठने-बैठने लगा. इस दौरान यूरोप से कुछ पादरी भी उससे मिलने हिंदुस्तान आ गए तो उसने उन्हें भी गले लगाया. अपनी धार्मिक जिज्ञासा को शांत करने के लिए उसने फतेहपुर सीकरी में एक इबादतखाना बनवाया जिसमें हर जुम्मेरात को मज़हबों पर चर्चा होने लगी. कभी-कभी ये चर्चाएं झगड़े का रूप ले लेतीं और जब बात तर्कों से न बनती, तो हाथों का भी इस्तेमाल होता.

जो बात अकबर को बाकी मुसलमान सुल्तानों से अलग करती है वह है उसका इस्लाम और बाक़ी धर्मों के प्रति नज़रिया.

पादरियों ने अकबर को ईसाई बनाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया था और इतिहास में दर्ज है कि अकबर को भी यह मज़हब ठीक लगा था. पर वह मुसलमान ही रहा. हां, उसने अपने दो बच्चो का बपतिस्मा जरूर करवाया. वे बच्चे एक मकसद के लिए ईसाई बने और वह वजह थी ईसाई औरतों से शादी करना. कुछ दिनों बाद वे दोनों फिर मुसलमान बन गए. इस बात पर पादरियों में बड़ा छातीकूट हुआ. इधर जब उसका रुझान हिंदूवाद की तरफ़ हुआ तो उलेमाओ ने इलज़ाम लगाना शुरू कर दिया कि वह हिंदू बन गया है. जबकि उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने होली-दिवाली मनानी शुरू कर दी थीं. एक बार जब वह मथुरा गया था तब उसने देखा कि हिंदू अपने धर्मस्थलों पर जाने के लिए जज़िया देते हैं, तो उसने उसे भी हटवा दिया. इससे शाही ख़ज़ाने को काफी नुकसान हुआ और उसे उलमाओं का गुस्सा भी झेलना पड़ा.

अकबर हर साल आगरा से चलकर अजमेर में ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर भी आया करता था. मैं यहां एक बात कहने के लिए फिर रुकता हूं. अजमेर शहर दो वजहों से दुनिया भर में प्रसिद्ध है - एक तो ग़रीब नवाज़ की दरगाह और दूसरा पुष्कर जो हिंदुओं का बहुत बड़ा तीर्थ स्थल है. ख़्वाजा साहब की दरगाह पर फूल पुष्कर से आते हैं और जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पथ संचलन होता है तो दरगाह के ख़ादिम उस रास्ते में फूल बिछाते हैं! अब देखिये, यह भी एक काबिल-ए-ग़ौर किस्सा है. अच्छा लो, अब जब अजमेर आ ही गए हो, तो चिश्ती साहब की दरगाह पर चादर चढ़ा दो और फिर पुष्कर में ब्रम्हा जी के मंदिर के दर्शन भी कर लेना पर ख़्याल रहे, पुष्कर तीर्थ करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को टैक्स जमा करवाना पड़ता है. रास्ते में ही गाड़ी को रोक लेंगे सो टैक्स जमा करवा देना. जज़िया देने वाले अब हिंदू भी हैं और मुसलमान भी. ‘बोलो भारत माता की जय!’ मैं भी चाय-वाय पी लूं इतने, थक गया कहते-कहते.

अब मैं कुछ ऐसा कहने जा रहा हूं जो इस पूरी कहानी को एक अलग मोड देता है क्योंकि बात तो अकबर के महान होने न होने की थी और अब इसका निर्णय भी करना है आपको. जो बात अकबर को बाकी मुसलमान सुल्तानों से अलग करती है वह है उसका इस्लाम और बाक़ी धर्मों के प्रति नज़रिया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अकबर ने सन 1579 में मक्का-मदीना जाने वालों पर होने वाला खर्च बंद कर दिया था और सन 1580 में अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने के लिए अजमेर आना भी बंद कर दिया था. पर सन 1941 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलकाता में एक किताब छपी थी जो दीन-ए-इलाही पर मौलिक दस्तावेज़ है. इसके लेखक थे श्री माखन लाल रॉय चौधरी. उनके मुताबिक़ अकबर ने हज पर जाने वालों के लिए पैसा देना बंद नहीं किया था बल्कि उस समय वह हर हाजी को 600 रुपये सरकारी ख़ज़ाने से देता था.

पर यह बात दीगर नहीं है, जो ज़रुरी है, वह यह कि अकबर अब तक हर धर्म से उकता चुका था. इधर सूफी पंथ, सिख धर्म, दादू पंथ अपने पैर जमा रहे थे. दसवीं शताब्दी में मेहदी आंदोलन ने ज़हनी लोगों में काफी उथल-पुथल मचा दी थी, उधर यूरोप में रेनेसां (पुनर्जागरण) काल शुरू हो चुका था और उसके दरबार में यूरोप से पादरी कुछ नया लेकर आ रहे थे. सूफीवाद तो 11 -12 शताब्दी में ही प्रचलित हो गया था.

खुसरो ‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके’ गाकर अमर हो गए.

रसखान कृष्ण भक्त होकर गा रहे थे-

धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।

खेलत खात फिरैं अंगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।

वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी

काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।

अकबर इसे किसी पर थोपना नहीं चाहता था. उसका मानना था ‘मैं जब तक ख़ुद इस पर नहीं चलूंगा, मैं किसी को कैसे इस पर चलने के लिए मज़बूर कर सकता हूं?’

उधर कबीर दुनिया को समझा रहे थे-

‘कबीरा तेरी झोपड़ी गल कटियन के पास.

जैसी करनी वैसी भरनी तू क्यों भयो उदास॥’

बाबा फरीद और नानक देव सिख धर्म लेकर आ चुके थे और इससे एक नयी बयार चली थी. नानक ने अपनी ऊंची आवाज़ में जब गाया -

‘दुई जगदीश कहां ते आये कह कोने भरमाया

अल्लाह, राम, रहीम, केशव, हरी, हजरत नाम धराया

वही महादेव, वही मोहम्मद, ब्रम्हा, आदम कहिये

कोई हिंदू कोई तुर्क कहावे एक ज़मी पर रहिये

वेद किताब पढ़े वे खुतबा वे मौलाना वे पांडे

विगत विगत ते नाम धराया एक मिटटी ते हांडे.’

तो सिख धर्म हिंदू और इस्लाम की खाई के बीच में से एक पतली सी नदी के समान निकलकर धीरे-धीरे फैल रहा था.

इन सब बातों का मिलाजुला असर यह हुआ कि सन 1582 में अकबर ने दीन ए इलाही की शुरुआत का ऐलान कर दिया. इतिहासकार, डान्जेलो बार्तोली, का मानना था कि अकबर ने इसके ऐलान का ज़िम्मा शेख़ मुबारक को दिया. हांलाकि कुछ इतिहासकार ऐसा नहीं समझते. उनके मुताबिक़ अकबर इसे किसी पर थोपना नहीं चाहता था. उसका मानना था ‘मैं जब तक ख़ुद इस पर नहीं चलूंगा, मैं किसी को कैसे इस पर चलने के लिए मज़बूर कर सकता हूं?’ आगे हम देखेंगे कि शायद यही तथ्य सत्य है.

इतिहासकार स्मिथ का मानना था कि दीन-ए-इलाही के सूत्र परिभाषित नहीं थे और इसको लेकर लोगों में सन 1587 तक उहापोह की हालात बनी रही. कुछ ऐसा ही मत जर्मन इतिहासकार वों नोएर का भी है. सिर्फ मोहसिन फ़ानी ने अपनी किताब ‘दबिस्तान ए मज़ाहिब ‘ में दीन ए इलाही के सूत्रों का ज़िक्र किया है. मोहसिन फ़ानी, बदायूनी या पुर्तगाल के पादरियों की तरह अकबर का आलोचक नहीं था. उसके मुताबिक़ दीन ए इलाही के 10 सूत्र थे :

1. एक दूसरे की आज़ादी और मदद

2. ग़लत करने वालों को माफ़ करना और गुस्से को त्यागना

3. सांसारिक चीज़ों की तलब से आज़ादी

4. सांसारिक बंधनों, हिंसा और भविष्य के लिए संग्रहण करने से आज़ादी

5. अपने कर्मो का विवेकशील अध्ययन

6. अच्छे कर्मो को करने की ताक़त हासिल करना

7. सुखन दिलनवाज़ी

8. अच्छा बर्ताव अपने लोगों के साथ जिसे सभी अमल करें

9. सांसारिक जीवों से निर्मोह और ईश्वर से जुड़ाव

10. रूह की ख़ुदा के लिए मोहब्बत और उस ईश्वर के साथ एक हो जाना

दीन-ए-इलाही हक़ीक़त में सूफियाना फ़लसफ़ा ही था उसमें किसी पुजारी या पादरी का कोई स्थान नहीं था. दीन के मानने वालों के लिए उसने कोई मस्जिद नहीं बनवाई थी.

कुछ और क़ायदे बनाये गए इस दौरान, जैसे कि दीन को अपनाने वाले को ‘चेला’ कहा जाता था और नए चेलों को दीन में इतवार को ही शामिल किया जाता था. चेलों को ‘शस्त’ - एक गोल सी कोई चीज़ - दी जाती थी जिसे कपडे में लपेटकर माथे पर लगी पगड़ी में सजाया जाता था. जब अकबर के दर्शनियां मंज़िल से दीदार होते थे तो चेलों को सजदा करना होता था. जब कोई दो दीनी आपस में मिलते थे तो एक ‘अल्लाह हो अकबर’ कहता था और दूसरा ‘जल्ले जललाहु’ कहता था. ये इस्लाम के ‘सलाम वालेकुम’ से अलग हो गया था.

कुछ और बातें: जैसे मरने पर दावत न रखना; जहां तक हो सके मांसाहार से दूर रहना; ख़ुद से मारा हुआ जानवर न खाना; कसाइयों, मछुआरों, और बहेलियों के साथ बैठकर खाना न खाना; हामला ,बुज़ुर्ग और बांझ औरतों और बच्चियों - जिनका अभी यौवनारंभ न हुआ हो - के साथ सहवास न करना. मारने पर किसी दीनी को उसके मज़हब के हिसाब से जलाना या दफनाना.

दीन को मानने वालों को दो भागों में बांट सकते थे - एक वे जिन्होंने इसे पूरे तरीक़े से अपना लिया था और दूसरे वे जिहोंने सिर्फ ‘शस्त’ अपनाया था. शुरुआत में 19 लोगों को दीन में शामिल किया गया. सबके नाम लिखना कोई ज़रूरी नहीं पर हां, दो नामों का ज़िक्र करना बनाता है और वे हैं - बीरबल और सलीम उर्फ़ जहांगीर. उन 19 लोगों में सिर्फ बीरबल ही हिंदू था.

ग़ौर से देखें तो हम पाते हैं कि दीन-ए-इलाही के 10 में से नौ सूत्र तो हर मज़हब में पाए जाते हैं. सिर्फ आख़िरी सूत्र वेदांत से लिया लगता है. लेकिन समस्या तब हुई जब लोगों को यह लगा कि इन नौ सूत्रों को सीधे-सीधे कुरआन और सूफीवाद से ले लिया गया है. उन्हें इसमें इस्लाम का ज्यादा तत्व नज़र आया जोकि शायद सही भी था. इसलिए हिंदुओं को तो इसे अपनाने में दिक़्क़त हुई ही उलेमाओं को भी यह इसलिए पसंद नहीं आया कि यह दीन उनको सीधे तौर पर चुनौती दे रहा था. लेकिन हक़ीक़त यह थी कि अकबर ने इसे सभी धर्मो को मिलाकर बनाया था और वह ख़ुद इस धर्म की धुरी बनना चाहता था.

कुल मिला कर बात यह है की दीन ए इलाही का फ़लसफ़ा सहिष्णुता और इंसान की निज़ी ज़िन्दगी में ख़ुलूस (अच्छी नीयत) का होना और उसी खुलूस के साथ ज़िंदगी के मसलों को हल करना था. अकबर का मानना था कि रास्ता कोई भी हो, पहुंचना उस ख़ुदा तक है. दीन-ए-इलाही हक़ीक़त में सूफियाना फ़लसफ़ा ही था उसमें किसी पुजारी या पादरी का कोई स्थान नहीं था. दीन के मानने वालों के लिए उसने कोई मस्जिद नहीं बनवाई थी.

इतिहासकार ब्लोचमेन का मानना था कि अकबर इसे सिर्फ और सिर्फ अपने प्रभाव और उदाहरण से आगे बढ़ाना चाहता था. बदायूनी ने अपनी किताब में लिखा है कि कई लोग अकबर से पूछते थे कि वह दीन को आगे बढाने के लिए तलवार का सहारा क्यों नहीं लेता? जवाब बड़ा ही ख़ूबसूरत था - ‘रियाया का उसके मीर होने में विश्वास सिर्फ समय और अच्छी सलाह की बात है और उसे इसके लिए किसी तलवार की ज़रुरत नहीं है.’ मतलब साफ़ है कि अगर किसी का दिल करे तो इसे अपनाए. ज़बरदस्ती हिंसा के बल पर धर्मांतरण नहीं होना चहिये.

अकबर ने अपने आख़िरी दिनों में जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत पर चलते हुए मांस खाना छोड़ दिया था. वह हिंदुओं की तरह ‘मैं देखूं जिस ओर सखी री सामने मेरे सावंरिया...’ मानने लगा तो सूफियों की तरह वह ईश्वर से इश्क़ करने लगा.

क़ुरआन में लिखा है - अगर ख़ुदा चाहता तो पूरी दुनिया में सिर्फ इस्लाम ही होता और जब उसकी ऐसी रज़ा नहीं है तो फिर किसे हक़ है कि ज़ोर ज़बरदस्ती की जाए. उसने अपने अफ़सरान को सख़्त ताक़ीद की थी कि उसकी रियाया में हर एक का आध्यात्मिक विकास हो. यह उसने शायद अशोक ‘महान’ से सीखा था. यह बात इस तथ्य से ज़ाहिर होती है कि अगर वह चाहता तो तलवार के बल पर आधे हिंदुस्तान को इलाहीवाद की तरफ़ मोड देता. आख़िर कौन था उस समय उससे ज्यादा ताक़तवर यहां? वह यूरोप के राजाओं की तरह इस बात को नहीं मानता था कि जो राजा का धर्म, वही प्रजा का भी.

मुझे बड़ा गर्व महसूस होता है जब मैं सोचता हूं कि हिंदुस्तान ने दुनिया को सबसे ज्यादा मज़हब दिए - हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख जैसे मज़हब यहीं से दुनिया में फैले और इसके लिए जबरदस्ती का धर्मांतरण नहीं किया गया. दीन-ए -इलाही भी इसी सरज़मी पर पैदा हुआ और इसको भी तलवार के ज़ोर पर आगे नहीं बढ़ाया गया. अकबर ने अपने आख़िरी दिनों में जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत पर चलते हुए मांस खाना छोड़ दिया था. वह हिंदुओं की तरह ‘मैं देखूं जिस ओर सखी री सामने मेरे सावंरिया...’ मानने लगा तो सूफियों की तरह वह ईश्वर से इश्क़ करने लगा. वह खुद को एक बौद्ध भिक्षु की तरह देखने लगा था. उसकी यह बात नज़ीर के तौर पर देखी जाए कि एक राजा किसी एक धर्म का न होकर पूरे राज्य का होता है.

अकबर के मरने के बाद जहांगीर ने दीन ए इलाही पर कुछ खास ज़ोर नहीं दिया और जो सर्वधर्म समभाव अकबर के काल में था, वह धीरे-धीरे ख़त्म होता गया. बाद के मुग़लों ने फिर इस्लाम पर ज़ोर दिया जिससे दीन-ए- इलाही सिर्फ कुछ लोगो में ही सिमटकर फ़ना हो गया.

दीन-ए -इलाही का हश्र चाहे जो रहा हो पर अकबर ने एक साहसिक कदम उठाया था और वह इसके ज़रिये हिंदुस्तान की अवाम को एक धर्म में पिरोना चाहता था. क्या यह हिंदुस्तान का पहला ‘यूनिफार्म सिविल कोड’ था? क्या नए युग के राजा ऐसे किसी यूनिफार्म सिविल कोड को लागू करने की हिम्मत कर सकते हैं? क्या उनमें अकबर की तरह इतना नैतिक साहस है कि हर मज़हब के लोगों को साथ लेकर चलें?

दुनिया ने हिंदुस्तान के सिर्फ दो राजाओं को ‘महान’ की उपाधि दी है - अशोक और अक़बर. अगर नज़दीक से देखें तो दोनों में कई समानताएं नज़र आती हैं. लेकिन यह बात फिर कभी. अब मैं इस बात को विराम देता हूं और यह लोगों पर छोड़ता हूं कि वे फैसला करें कि अकबर के नाम के साथ ‘महान’ लगाना चाहिए या नहीं?