भारत ने बीती 29 अगस्त को अमेरिका के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए हैं. नाम है, ‘लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट’ (लेमोआ). इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं, रसद और एक निश्चित सीमा में सैन्य ठिकानों का भी इस्तेमाल कर सकेंगे. इस समझौते के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की काफी आलोचना की जा रही है. कहा जा रहा है कि यह समझौता कर के मोदी सरकार ने अमेरिकी सेना को देश में पैर रखने और जमाने की सुविधा दे दी है. कांग्रेस का विरोध खासतौर पर, इस समझौते को लेकर काफी मुखर है. उसका आरोप है कि मोदी ने इस समझौते के जरिए ‘भारत की उस मूलभूत और देखी-परखी नीति को तिलांजलि दे दी है, जिसके तहत किसी भी सैन्य गुट या शक्ति से दूर और निरपेक्ष रहने की परम्परा थी.’

जबकि ये दोनों ही चीजें सही नहीं हैं. भारत-अमेरिका के बीच लेमोआ समझौता कोई पहली बार नहीं हुआ है. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1942 से 1946 के बीच, अमेरिकी सेना के लिए भारत रसद आपूर्ति का मुख्य अड्डा रह चुका है. खासतौर पर सुदूर पूर्व की तरफ के अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए. उस युद्ध के दौरान करीब दो लाख अमेरिकी सैनिक भारत में तैनात रहे. केंद्र सरकार पर आरोप लगाने वाली कांग्रेस को शायद जानकारी न हो, कि अमेरिकी सेना को दी गई यह विशेष सुविधा युद्ध खत्म होने और देश की आजादी के बाद भी जारी रही.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1942 से 1946 के बीच, अमेरिकी सेना के लिए भारत रसद आपूर्ति का मुख्य अड्डा रह चुका है

आजादी के बाद बनी जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार ने भी अमेरिका से एक जुलाई 1947 को ऐसा ही समझौता किया. इसके जरिए अमेरिकी सैन्य विमानों को भारत के विभिन्न हवाई अड्डों से रसद तथा अन्य सुविधाएं दी जाती रहीं. यही नहीं, नेहरू जब अमेरिका की पहली यात्रा पर गए तो 1949 में इस समझौते का नवीनीकरण किया गया. इसके तहत अमेरिकी सैनिकों को भारत में दी जा रही सुविधाओं का दायरा बढ़ाया गया. अब अमेरिकी लड़ाकू विमान भारतीय हवाई अड्डों पर खड़े रह सकते थे. यहां उनका रख-रखाव किया जा सकता था. रख-रखाव की प्रक्रिया पूरी होने तक अमेरिकी तकनीशियन और उनकी टीम भी भारतीय सैन्य अड्डों पर रह सकती थी.

शुरू में अमेरिका के लिए सैन्य सुविधाएं मुफ्त थीं

विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर यह समझौता आज भी मौजूद है. इसमें स्पष्ट है कि शुरू में अमेरिकी सेना की वायु परिवहन सेवा (मैट्स) से भारत में उसके विमानों को उतरने और रुकने की सुविधा देने के एवज में कोई शुल्क भी नहीं लिया जाता था. शुल्क लिए जाने का सिलसिला 1952 में शुरू हुआ. लेकिन 1962 में अमेरिका ने इस शुल्क में छूट की मांग की. साथ ही, सैन्य विमानों के पायलट और अन्य चालक दल के सदस्यों के लिए वीजा की अनिवार्यता की शर्त भी हटा लेने की मांग की. भारत के खिलाफ उसी वक्त चीन ने युद्ध छेड़ दिया था. उस दौर में भारत को अमेरिका से सैन्य सहयोग, खासतौर पर हथियारों की आपूर्ति की जरूरत थी. लिहाजा, इसके एवज में भारत सरकार ने अमेरिका की दोनों ही मांगें मान लीं.

नेहरू सरकार की कृपा सिर्फ मैट्स के विमानों पर ही नहीं, अमेरिकी दूतावास पर भी बरसी. उसे विशेष अधिकार दिया गया कि वह अमेरिकी नौसेना और वायुसेना से संबद्ध दो विमान दिल्ली के पालम हवाईअड्डे पर खड़े रख सकता है. ताकि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना और वायुसेना इसका इस्तेमाल कर सकें. भारत और अमेरिका के बीच यह समझौता 1966 में उस वक्त खत्म हुआ, जब मैट्स को निष्क्रिय कर दिया गया. उसकी जगह अमेरिकी नौसेना और वायुसेना ने अलग से एक सामरिक हवाई परिवहन कमान का गठन किया.

नेहरू सरकार की कृपा सिर्फ मैट्स के विमानों पर ही नहीं, अमेरिकी दूतावास पर भी बरसी. उसे विशेष अधिकार दिया गया कि वह अमेरिकी नौसेना और वायुसेना से संबद्ध दो विमान दिल्ली के पालम हवाईअड्डे पर खड़े रख सकता है

कांग्रेस की तरह भूलने की बीमारी भाजपा को भी

भारतीय जनता पार्टी को भी कांग्रेस के जैसी ही भूलने की बीमारी हो गई दिखती है. वह इस समझौते (लेमोआ) को भारत की ‘सामरिक विजय’ बता रही है. उसका आरोप है कि सैन्य मसलों को लेकर नेहरू की नापसंदगी के कारण भारत अब तक इस उपलब्धि से दूर रहा. लेकिन अगर उसने कुछ कागजात खंगाल लिए होते, समसामयिक इतिहास की गहराई में उतरी होती, तो उसके सामने तस्वीर कुछ और होती. भाजपा को पता चल जाता कि जब 1948 में कश्मीर पर हमला हुआ तो नेहरू ने तुरंत अमेरिका में भारतीय राजदूत आसफ अली को दरकिनार कर वहां लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल को तैनात कर दिया था. दूतावास में सैन्य संबद्ध अधिकारी की हैसियत से. इस तैनाती का मकसद ये था कि पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मुख्यालय) से हथियार हासिल किए जा सकें. उस वक्त भारत की आजादी को छह महीने भी नहीं हुए थे और 27 जनवरी 1948 को कौल उन हथियारों की पूरी सूची लेकर वाशिंगटन में थे, जो अमेरिका से खरीदे जाने थे. इस सूची में 1000 जीपें और 43 बी-25 मिशेल बमवर्षक विमान प्रमुख थे.

इसके बाद अप्रैल 1948 में भारतीय विदेश मंत्रालय में सेक्रेटरी जनरल गिरिजाशंकर बाजपेयी भी सैन्य मदद मांगने के लिए अमेरिकी दौरे पर गए थे. मार्च 1949 में तो एचएम पटेल पूरा सैन्य प्रतिनिधिमंडल लेकर वाशिंगटन पहुंच गए, ताकि अमेरिका से सामरिक सहयोग स्थापित किया जा सके. मगर उस वक्त अमेरिका ने भारत की इस पहल की तरफ ज्यादा गर्मजोशी नहीं दिखाई. क्योंकि शायद तब उसके सामरिक गुणा-भाग में भारत का निरपेक्ष रहना ही मुफीद था.

तब अमेरिका ने सैन्य सहयोग का दर्जा पाकिस्तान के लिए सुरक्षित रखा, क्योंकि उसकी निगाहें खाड़ी में मौजूद तेल संपदा पर गड़ी हुई थीं. इसमें पाकिस्तान उसका मददगार हो सकता था. लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं. अमेरिका के सामरिक रडार पर अब चीन की ओर से खतरे के संकेत मिल रहे हैं. लिहाजा, इस खतरे से निपटने में भारत उसके लिए ज्यादा बड़ी और बेहतर भूमिका निभा सकता है. और इसीलिए एशिया में तमाम सैन्य अड्डे (जल्द ही फिलीपींस में पांच नए अमेरिकी सैनिक अड्डे बनने जा रहे हैं) होने के बावजूद अमेरिका लेमोआ के जरिए भारत में सैन्य लंगर डालने के लिए लालायित था. और इस बार मोदी अमेरिका को उपकृत करते हुए दिखना चाहते थे, जो उन्होंने शायद कर भी दिया.

(दिल्ली स्थित द इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज से संबद्ध अतुल भारद्वाज भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी हैं)