भारतीय जनता पार्टी फासिस्ट है या नहीं या केंद्र में उसकी पूर्ण बहुमत वाली सरकार का दौर फासीवादी कहा जाए या नहीं, यह बहस प्रकाश करात के हाल के एक लेख के बाद शुरू हो गई है. उनका मानना है कि भाजपा को एकाधिकारवादी दल कहना तो उचित है, लेकिन फासीवादी वह कतई नहीं. कम से कम अभी वह उस दौर में नहीं पहुंची है.

क्या यह बहस वाग्विलास मात्र है? नहीं, यह सिर्फ एक शब्द को दूसरे से बदलने का खेल या एक बौद्धिक क्रीड़ा नहीं है क्योंकि इस प्रश्न के उत्तर से हमारी राजनीति का स्वरूप तय हो सकता है. अगर हम यह मानते हैं कि यह दौर फासीवाद का है, तो सामान्य समय की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को छोड़कर बाकी सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर इस फासीवादी ताकत को सत्ताच्युत करने का संघर्ष करना होता है. वरना आम दिनों की तरह बहुकोणीय संसदीय राजनीतिक संघर्ष चलता रह सकता है.

कुछ लोगों की समझ है कि प्रकाश करात अपनी पार्टी के भीतर की लड़ाई अखबार के मंच से लड़ रहे हैं. हाल के बंगाल के विधानसभा चुनाव में उनके दल सीपीएम का कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ लड़ना उन्हें रास नहीं आया. तृणमूल पार्टी को फासीवादी कहना संभव नहीं लेकिन उसने सीपीएम के अस्तित्व को ही एक तरह से खत्म कर देने की ठान ली थी. इसलिए बंगाल में सीपीएम के सामने खुद को बचाए रखने की चुनौती थी. इस कारण उसने एक और राजनीतिक साथी खोजा. वह बंगाल में पूरी तरह अकेली नहीं और राजनीतिक हलके में उसकी स्वीकार्यता है, इससे यह भी जाहिर होता था. लेकिन करात को यह समझौता अनावश्यक लग रहा है.

खुद सीपीएम में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है. बंगाल में तीन दशक से ज्यादा के शासनकाल में पार्टी एक तरह से तानाशाह ही हो गई थी.

इससे अलग यह बहस वाम दलों में चल रही है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस पार्टी समेत अन्य ‘जनतांत्रिक दलों’ के साथ गठबंधन करें या नहीं. करात का पक्ष यह है कि वाम दलों को ऐसे किसी गठजोड़ में जाने की कोई बदहवासी नहीं दिखानी चाहिए.

यह प्रश्न बिहार चुनाव के समय भी उठा था. उस वक्त कांग्रेस पार्टी की समझ थी और इस पर नीतीश कुमार और लालू यादव उससे सहमत थे कि भाजपा को किसी भी कीमत पर सत्ता से दूर रखना पहला जनतांत्रिक कर्तव्य है. इसलिए उन तीनों ने मोर्चा बनाया. लेकिन बिहार के वाम दल इस समझ के साथ न थे और उन्होंने अपना अलग मोर्चा बना कर चुनाव लड़ा. यानी वे भाजपा के साथ-साथ नीतीश-लालू और कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ भी थे. इस वाम मोर्चे से सीपीआई (एमएल) को तो लाभ हुआ लेकिन आम तौर पर वाम हाशिए पर ही बना रहा.

करात यह कहते हैं कि भाजपा एकाधिकारवादी है, फासिस्ट नहीं. एकाधिकारवादी या तानाशाही प्रवृत्ति तो भारत के प्रायः सभी दलों और नेताओं में मिलती है. मसलन, खुद सीपीएम में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है. बंगाल में तीन दशक से ज्यादा के शासनकाल में पार्टी एक तरह से तानाशाह ही हो गई थी. किसी भी प्रकार के मतभेद और विरोध को हिंसक तरीके से कुचलना और प्रत्येक सांस्थानिक निकाय पर नियंत्रण कायम करना उसका अभ्यास बन गया था. पार्टी ‘मस्तानों’ की मदद से बंगाल के समाज को काबू में रखती रही. नतीजा एक प्रकार के जनतांत्रिक विद्रोह में हुआ और तृणमूल पार्टी उसकी प्रवक्ता बन कर उभरी.

तानाशाही प्रवृत्ति नीतीश कुमार में भी कम न थी. भाजपा के साथ जब वे सरकार चला रहे थे तब बिहार में सरकार की आलोचना करना मीडिया के लिए संभव न था. उनकी पार्टी के भीतर भी उनके अलावा कोई आवाज़ न थी. उसी तरह, जयललिता हों या मायावती, सभी अपने-अपने सूबे के तानाशाह हैं. उनकी पार्टियों में उनके अलावा कोई स्वर नहीं और बाहर भी विवादी स्वर से उनकी त्योरी चढ़ जाती है.

जनतांत्रिक पार्टियों के भीतर तानाशाही का उदय अन्य ‘नेताओं’ में आत्मविश्वास की कमी और उनके आलस्य के कारण भी होता है

यह तानाशाही प्रवृत्ति जड़ जमाती है जब दलों के भीतर किसी प्रकार का राजनीतिक संघर्ष या मतभेद नहीं रहता. चूंकि चुनाव के जरिये सत्ता में आने के बाद सत्ताधारी दल के सदस्यों को इसका आश्वासन रहता है कि सत्ता से मिलने वाले लाभ में उनका हिस्सा होगा, वे इसके लिए तैयार हो जाते हैं कि अपने राजनीतिक व्यक्तित्व का उस नेता में विलय कर देंगे जो इस लाभ का स्रोत है.

यह भी कहा जा सकता है कि जनतांत्रिक पार्टियों के भीतर तानाशाही का उदय अन्य ‘नेताओं’ में आत्मविश्वास की कमी और उनके आलस्य के कारण भी होता है. यानी, जब वे जन-संपर्क और उसके निरंतर नवीकरण के जरिए जनता के बीच अपनी स्वीकृति का कष्टपूर्ण मार्ग छोड़ देते हैं और एक करिश्माई नेता की छाया में आराम करने लगते हैं, तब पार्टी पर उनका अधिकार नहीं रह जाता. वह राजनीतिक नेता बार-बार चुनाव में पार्टी को विजय दिलाकर उन्हें इसका यकीन दिला देता है कि उसके सहारे सत्ता का लाभ बाकियों को मिलता रहेगा. वे फिर उस नेता के एजेंट के तौर पर ही देखे जाते हैं, जनता उन्हें स्वतंत्र रूप से देखती भी नहीं.

कांग्रेस पार्टी में जवाहरलाल नेहरू का दौर एक नेता की तानाशाही का न था. उनके समय तक जनता के बीच पहचाने जाने वाले अनेक नेता कांग्रेस में थे और वे अपनी शक्ति नेहरू से नहीं हासिल करते थे. इसीलिए उस दौर में नेहरू की हर मामले में नहीं चली. लेकिन इंदिरा गांधी तक कांग्रेसियों में जो राजनीतिक शिथिलता आ गई उसने पार्टी में एकाधिकारवाद को बल दिया.

एकाधिकारवादी प्रवृत्ति एक ही तरह से हर जगह नहीं उभरती. नए जनतांत्रिक राजाओं और रानियों का उदय होता है तो उसका आधार या स्रोत उनका संप्रदाय या जाति हो सकती है या फिर वफादारी का पारंपरिक अभ्यास जिसे गायत्री स्पीवाक ने फ्यूडैलिटी विदआउट फ्यूडलिज्म की संज्ञा दी है. रामविलास पासवान अपने समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर उभरते हैं और कालक्रम में यह उनके परिवार को सुपुर्द कर दिया जाता है. विजयाराजे सिंधिया हों या वसुंधरा या उनके खानदान के या उन जैसे और लोग, वे जनता के बीच अपने काम के बल पर नहीं, सिंधिया शासन की स्मृति का लाभ लेकर भी प्रमुखता प्राप्त करते हैं.

यह भी सही है कि सभी तानाशाह फासिस्ट नहीं होते. लेकिन जैसा, जैरुस बानाजी ने कहा है कि सभी फासिस्ट तानाशाह ज़रूर होते हैं. तो क्या तानाशाही फासीवाद के पहले की अवस्था है?

जनतंत्र में नेताओं के उभरने और उनके सफ़र का अध्ययन बहुत कम किया गया है. किस प्रकार जनता की स्वीकृति से एक नेता तानाशाह में बदल जाता है, यह अध्ययन की दिलचस्पी का विषय होना चाहिए. नेहरू को इसके खतरे का आभास था. नेहरू तानाशाह बन सकते हैं, यह चाणक्य नाम से लिखे एक लेख में उन्होंने चेताया. मायावती एक विचार की प्रतिनिधि बन कर उभरीं. लेकिन जनता ने उनमें जो विश्वास दिखाया, वह असुरक्षाजन्य भी था. क्रमशः वे अपने जातिगत दायरे में ही सुरक्षित महसूस करने लगीं और आज जैसी हैं वैसी हो गईं.

कोई एक नियम हर परिघटना पर लागू नहीं होता. नीतीश कुमार, जयललिता या मायावती का बिना परिवार का होना उनका गुण है लेकिन लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव या रामविलास पासवान ने अपनी लोकप्रियता को अपने परिवारों को हस्तांतरित करने में सफलता प्राप्त की. क्या ईमानदारी किसी को लोकप्रिय बनाती है? नीतीश कुमार के लिए यह बात सही है, फिर रामविलास पासवान के मामले में क्यों नहीं?

एकाधिकारवाद के उभरने का मौक़ा जनतांत्रिक प्रणाली में बना रहता है. तानाशाहों से हमेशा जनता घृणा करती हो, ऐसा नहीं. वे लोकप्रिय भी होते हैं. वे जनकल्याण के नाम पर खुद को बनाए रखते हैं.

यह भी सही है कि सभी तानाशाह फासिस्ट नहीं होते. लेकिन जैसा, जैरुस बानाजी ने कहा है कि सभी फासिस्ट तानाशाह ज़रूर होते हैं. तो क्या तानाशाही फासीवाद के पहले की अवस्था है? फिर वह कौन सा तत्व है जो एक तानाशाह को फासिस्ट बनाता है?

ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर हमें विस्तार से बात करने की ज़रूरत है.