नरेंद्र मोदी सरकार की ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ को शुरू हुए करीब दो साल हो चुके हैं. ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को शुरू हुए भी करीब-करीब इतना ही वक्त हो चला है. लेकिन न तो ग्रामों के ‘आदर्श’ बनने के उत्साहजनक संकेत मिल रहे हैं और न ही भारत के स्वच्छ होने के. अब तक लोकसभा और राज्यसभा के सभी सदस्यों ने कुल मिलाकर 702 गांवों को गोद लिया है. इनमें से महज 131 गांव ही खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो सके हैं. यानी महज 18.66 फीसदी. इसे दूसरी तरह से यूं भी कह सकते हैं कि करीब 80 फीसदी सांसद अब तक अपने गांवों को ‘आदर्श’ नहीं बना सके हैं.

सरकार के ही आंकड़े बता रहे हैं कि ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के तहत गोद लिए गए 571 गांवों में लोग आज भी खुले में ही शौच जा रहे हैं. मामला यहीं खत्म नहीं होता. एक रिपोर्ट के मुताबिक सांसदों द्वारा गोद लिए गांवों में सिर्फ 91 (यानी करीब 13 फीसदी) ही ऐसे हैं, जहां 100 फीसदी मकान अब तक पक्के बन पाए हैं. आधुनिक सुविधाओं का जिक्र करें तो 25 फीसदी से भी कम (171) गांवों में 100 फीसदी विद्युतीकरण हुआ है जबकि 25 फीसदी (177) के करीब गांव ऐसे हैं जहां ब्रॉडबैंड इंटरनेट की सुविधा पहुंच चुकी है.

सरकारी योजनाओं, सेवाओं आदि के मामले में तो हालत और खराब है. एक सरकारी अधिकारी नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताते हैं, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के अधिकांश गांव सरकारी योजनाओं, सेवाओं आदि की 100 फीसदी कवरेज में नहीं हैं. उदाहरण के लिए टीकाकरण को ले लीजिए. सांसदों के सिर्फ 40 गांवों में ही अब तक 100 फीसदी टीकाकरण हो पाया है. ऐसा ही या कहिए कि इससे भी बुरा हाल विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन, जनवितरण प्रणाली, आदि सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों का है.

देश ने जब अगस्त 2014 में आजादी के 67 साल पूरे किए थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ शुरू करने की घोषणा की थी. संयोग से आज (17 सितंबर 2016) प्रधानमंत्री मोदी अपने जीवन के 67वें साल में प्रवेश कर रहे हैं. यहां इस माेड़ पर वे अपनी इन पूर्व घोषित और प्रिय योजनाओं का पुनर्निरीक्षण करते तो बेहतर होता.