अच्छी फिल्म बाद में बनाएंगे, पहले रिलीज की तारीखों पर घमासान मचाएंगे!

हिंदी फिल्में आजकल तारीख पर तकरार को ही सबसे अहम मान रही हैं. कब फिल्म रिलीज होगी, उसके सामने कौन सी दूसरी बड़ी फिल्म होगी, यही सब निर्माताओं के लिए सबसे जरूरी मुद्दे हो गए हैं. ‘लगान’ और ‘गदर’ के दौर का दोस्ताना भी आउटडेटिड हो चला है, जब दो बड़ी फिल्में बेफ्रिकी के साथ रिलीज होती थीं और अपने-अपने कंटेंट के दम पर विपरीत दिशाओं की फिल्में होने के बाद भी बेमिसाल कारोबार करती थीं. अब तो करण जौहर और अजय देवगन जैसी इंडस्ट्री की पुरानी शख्सियतें भी एक तारीख पर अपनी फिल्मों के रिलीज होने पर (ऐ दिल है मुश्किल और शिवाय) अखबारों और सोशल मीडिया पर बच्चों की तरह लड़ रही हैं, और कभी छद्म रूप धारण कर तो कभी स्टिंग आपरेशन कर एक-दूसरे को नीचा दिखा रही हैं.

दूसरी तरफ, यह मामला अभी निपटा भी नहीं था कि शाहरुख खान की ‘रईस’ और रितिक रोशन की ‘काबिल’ 26 जनवरी, 2017 को एक साथ रिलीज होने की खबर आ गई. इन दो सुपर सितारों की टकराहट यहीं खत्म नहीं होने जा रही. राकेश रोशन ने ‘कृष 4’ बनाने की घोषणा करने के साथ ही उसकी रिलीज डेट की भी घोषणा करके एक नए युद्ध का बिगुल फूंक दिया है. ‘कृष 4’ 2018 की क्रिसमस पर रिलीज होगी और इस तारीख पर पहले से ही शाहरुख खान की आनंद राय निर्देशित अनाम फिल्म रिलीज होने वाली है. जहां एक तरफ ‘रईस’ और ‘काबिल’ का क्लैश (और कलेश भी!) टालने के लिए दोनों ही फिल्मों के निर्माताओं के बीच कई मुलाकातें हो चुकी हैं लेकिन नतीजा अभी तक सिफर रहा है, वहीं ‘कृष 4’ और शाहरुख की फिल्म के निर्माता यह क्लैश-कलेश टालने के लिए कितने लंबे सफर पर निकलेंगे, यह देखने वाली बात होगी.

कैटरीना मीडिया से इतनी डरने क्यूं लगी हैं!

यह घोषणा हो चुकी है कि कैटरीना कैफ ही सलमान खान की नई फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ की मुख्य नायिका होंगी. इस तरह की घोषणाएं यह भी जता जाती हैं कि कैटरीना जैसी सुपरस्टार के पास काम की कमी कई फ्लॉप फिल्मों और अभिनय को लेकर होने वाली सतत अलोचनाओं के बाद भी नहीं होने वाली. मगर बात जब मीडिया के पैने सवालों की आती है तो कैटरीना कैफ उनसे न सिर्फ घबराती हैं बल्कि शायद यह गजल भी गाती हैं, ‘निकलो न बेनकाब (घर से), जमाना खराब है’!

कैटरीना के लिए जमाना इसलिए खराब हुआ, और उन्हें मीडिया से छिप-छिपकर इसलिए रहना पड़ रहा है, क्योंकि ‘बार बार देखो’ फ्लॉप हो चुकी है. इस फिल्म की रिलीज से पहले न सिर्फ इसके निर्माता, निर्देशक और सिद्धार्थ मल्होत्रा इसकी तारीफ में ऐसे कसीदे पढ़ रहे थे जैसे किसी महान प्रेम-कहानी पर राकेश ओमप्रकाश मेहरा पढ़ते या फिर कोई गुरुदत्त. लेकिन फिल्म के वाजिब फ्लॉप होने के बाद से ही निर्देशक से लेकर मुख्य कलाकार तक गायब हो चुके हैं और कोई भी फिल्म को लेकर बात करने को तैयार नहीं है. रिलीज से पहले ढेर सारे इंटरव्यूज और पत्रकारों से हिंदी तक में बात करने वालीं कैटरीना भी छूमंतर हैं. इसी अज्ञातवास के दौरान जब वे छिपती-छिपाती लंदन की फ्लाइट पकड़ने के लिए मुंबई एयरपोर्ट पहुंचीं, तो बाहर मीडिया को देखकर कार से ही नहीं उतरीं! स्टाफ द्वारा लाख समझाने के बावजूद कि महंगी फ्लाइट छूट जाएगी, कैटरीना नहीं मानीं और घंटों बाद तभी अपनी सुरक्षित कार से बाहर आईं जब सारा मीडिया वहां से जा चुका था.

चूंकि अब किसी महान प्रियदर्शनी एकेडमी ने उन्हें ‘स्मिता पाटिल मेमोरियल अवॉर्ड’ से भी नवाज दिया है, तो कैटरीना कैफ को उड़ने वाली ऐसी कार खरीद ही लेनी चाहिए जो उन्हें सीधे मुंबई से लंदन ले जाए. वरना फ्लाइट पकड़ने की मजबूरी के चलते कभी तो वे मीडिया की पकड़ में आएंगी और तब स्मिता पाटिल से जुड़े वाजिब सवाल संभाल नहीं पाएंगी.


'मैंने दुनिया भर का सिनेमा देखा है और खूब यात्राएं की हैं, इसलिए मेरे लिए परदे पर बोल्ड या न्यूड सीन करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. ऐसे दृश्यों पर विवाद होने से मुझे कोई फर्क भी नहीं पड़ता, मैं बस अपना काम करती हूं और फिर फिल्म के रिलीज (‘पार्च्ड’) होने का इंतजार'

— राधिका आप्टे

फ्लैशबैक : हमारी पहली रंगीन फिल्म और फाल्के जितने ही जरूरी आर्देशिर ईरानी

कई मूक फिल्में निर्देशित करने वाले आर्देशिर ईरानी को न सिर्फ हिंदुस्तान की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ (1931) निर्देशित करने के लिए जाना जाता है बल्कि हिंदुस्तान की पहली रंगीन फिल्म का निर्माण भी उन्हीं ने किया था. जिस तरह दादा साहब फाल्के भारतीय सिनेमा के जनक और पितामह हैं, उसी तरह बोलती हुई फिल्मों के जनक होने का रुतबा आर्देशिर ईरानी के नाम है. ‘आलम आरा’ के अलावा उन्होंने न सिर्फ पहली दक्षिण भारतीय बोलती फिल्म ‘कालिदास’ (1931) बनाई बल्कि अंग्रेजी में बनी पहली भारतीय फिल्म ‘नूर जहां’ (1934) बनाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है.

'आलम आरा' का एक दृश्य
'आलम आरा' का एक दृश्य

आर्देशिर ईरानी की प्रोडक्शन कंपनी, इम्पीरियल पिक्चर्स, ने भारत की पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ (1937) का भी निर्माण किया, और बोलती फिल्मों के दौर से लेकर रंगीन फिल्मों तक के सफर में हर निर्णायक कदम दूसरे निर्माता-निर्देशकों से पहले मिस्टर ईरानी ने ही रखा. सिनेकलर तकनीक से रंगी गई इस फिल्म को (ईस्टमैन नहीं!) कलर करने का पूरा काम हिंदुस्तान में ही किया गया और इस महंगी तकनीक को हिंदुस्तान में ही इस्तेमाल करने के अधिकार ईरानी साहब ने एक अमेरिकी कंपनी से खरीदे. सआदत हसन मंटो की लिखी शुरुआती कहानी पर आधारित इस फिल्म का निर्देशन मोती गिडवानी ने किया था और भले ही यह वो पहली भारतीय फिल्म कहलाती है जो रंगीन थी, लेकिन इससे पहले भी हिंदुस्तानी फिल्मों में कलर का उपयोग होना शुरू हो चुका था.

वी शांताराम की 1933 में आई मराठी फिल्म ‘सैरन्ध्री’ वह पहली फिल्म थी जो रंगीन थी. इसे रंगीन बनाने के लिए एक जर्मन कंपनी की सेवाएं ली गई थी और यही फिल्म हिंदुस्तान की पहली रंगीन फिल्म भी कहलाती, अगर इसे रंगीन करने की पूरी प्रकिया जर्मनी में अंजाम न दी गई होती! चार साल बाद बनी ‘किसान कन्या’ विदेशी तकनीक का उपयोग करने के बावजूद पूरी तरह हिंदुस्तान में कलर की गई फिल्म थी और इसीलिए आर्देशिर ईरानी वह इतिहास रच पाए जिसे वी शांताराम जैसे लीजेंड चाहकर भी नहीं रच पाए थे.

कम ही लोग जानते हैं कि इन ढेर उपलब्धियों वाले आर्देशिर ईरानी ने फारसी भाषा की पहली सवाक फिल्म का भी निर्देशन किया था. एक भारतीय द्वारा बनाई गई ‘लोर गर्ल’ (1934) पहली बोलती ईरानी फिल्म भी थी, और तब तक यूरोपियन कॉमेडी और एनिमेशन फिल्में ही देख पाने वाले ईरानियों का सिनेमा इसी फिल्म के बाद हमेशा के लिए बदला था.