समाज के भीतर सरकार है, सरकार के भीतर परिवार, परिवार के भीतर सत्ता और सत्ता के लिए हर तरह के जोड़-तोड़ और संघर्ष जो कभी-कभी उत्तर प्रदेश की तरह सड़कों पर आ जाते हैं.

लोकतंत्र में जनता परिवार के झगड़े नहीं हल किया करती. बल्कि चुने हुए नुमाइंदों और दलों से अपने हिसाब मांगती है. लेकिन जब ये झगड़े उसके भविष्य से जुड़े हों तो फिर हिसाब के खाते में इन्हें भी जुड़ना ही चाहिए.

भारतीय लोकतंत्र की यह विडंबना है कि इसमें राजनीतिक पार्टियों और सत्ता का विकास कुछ ऐसा हुआ कि कुछ चेहरे और परिवार सत्ता के केंद्र में आ गए और कई मायनों में जनता की हैसियत सत्ता संचालन का सर्टिफिकेट बांटने भर की रह गई.

समाजवाद यहां पहले तो परिवार तक सीमित है. और दरवाजे से बाहर निकला भी तो सत्ता से जुड़ी जाति की देहरी भी पार न कर सका.

जिन राम मनोहर लोहिया की पूरी राजनीति कांग्रेस और उसके परिवारवाद के विरोध पर आधारित थी विडंबना देखिये उन्हीं के सबसे बड़े चेलों में से एक आज सबसे बड़ी पारिवारिक सत्ता का मालिक भी है. छोटे लोहिया यानी मुलायम सिंह जी ऐसे परिवार के मुखिया हैं जिसका हर बालिग सदस्य सत्ता की किसी न किसी डाल से जुड़ा है. आखिर यह क्या दिखाता है? इससे स्पष्ट हो जाता है कि मुलायमी समाजवाद का बराबरी और सामाजिक न्याय के दर्शन से कुछ लेना-देना नहीं है.

समाजवाद यहां पहले तो परिवार तक सीमित है. और दरवाजे से बाहर निकला भी तो सत्ता से जुड़ी जाति की देहरी भी पार न कर सका. उसका आखिरी आदमी इसके साये भर से महदूद रहा. ऐसे में यह एक नये किस्म का ब्राह्मणवाद बन गया. इसमें कहने को तो पार्टी है, उसका लोकतांत्रिक ताना-बाना भी है लेकिन गिरफ्त उस पर कुनबे की है और सारे फैसले वही करता है. यहां परिवार का छोटा सदस्य भी पार्टी के बड़े और पुराने सदस्य पर भारी है. जन्म से श्रेष्ठता के निर्धारण का यह ब्राह्मणवादी सिद्धांत अपने मूल रूप में और पूरे चरित्र के साथ यहां जिंदा है.

यह बीमारी किसी एक पार्टी और क्षेत्र तक सीमित नहीं है. कांग्रेस तो इसकी जड़ ही है. और वह अभी भी उससे उबरती नहीं दिख रही है. और अब शायद इस बूढ़ी पार्टी में वह ताकत भी नहीं बची कि उसके चंगुल से बाहर आ सके. परिवारवाद के इस बरगद को उखाड़कर सच्चा लोकतंत्र लाने का दावा करने वाले उत्तर से लेकर दक्षिण तक बाकी दल ही इसकी जड़ों में बदल गए. और फिर अपने-अपने स्थानों पर एक नये बरगद के रूप में विकसित होने शुरू हो गए.

दक्षिण में करुणानिधि का परिवार इसी विरासत की नुमाइंदगी करता है. इस कड़ी में बहुत सारे राजनेता भले ही पूरी सत्ता पर काबिज न हो पाए हों लेकिन वे सत्ता की विरासत अपने बेटों को सौंपने में कामयाब जरूर रहे. लालू यादव से लेकर ठाकरे परिवार, पंजाब के बादल से लेकर मध्य प्रदेश का सिंधिया परिवार इसी परंपरा के हिस्से हैं. इस कड़ी में लोकतंत्र कुछ परिवारों में कैद हो गया. सत्ता उसकी बंधक. और आम नागरिक हमेशा-हमेशा के लिए परिधि या उसके भी पार हाशिए पर. यह लोकतंत्र का राजशाही मॉडल है जिसे कॉरपोरेट की खाज ने और बदतर बना दिया हैं.

देखने और अपने लक्षणों में किसी को भले ऐसा न लगे लेकिन संचालन से लेकर फैसलों तक में संघ की अंदरूनी व्यवस्था भी पूरी तरह से गैरलोकतांत्रिक है. यहां किसी चुनाव की जगह चयनों का तंत्र काम करता है

ऐसा ही, बल्कि इससे भी कहीं खतरनाक मॉडल संघ परिवार का है जिसका आनुषंगिक संगठन भाजपा आज केंद्र की सत्ता में है. भाजपा के ताले की चाभी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास है. लेकिन चुनावी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर होने के चलते संघ और उसके नेतृत्व की जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है. कम से कम इस मामले में दूसरी परिवारी पार्टियां उससे बेहतर हैं. उनमें एक बार सत्ता हस्तांतरित होने के बाद देरसबेर ही सही असली सत्ता उसके हाथ में तो होती है जिसकी जनता के प्रति जवाबदेही होती है.

देखने और अपने लक्षणों में किसी को भले ऐसा न लगे लेकिन संचालन से लेकर फैसलों तक में संघ की अंदरूनी व्यवस्था भी पूरी तरह से गैरलोकतांत्रिक है. यहां किसी चुनाव की जगह चयनों का तंत्र काम करता है. और यहां तक कि संघ मुखिया अपने मनमुताबिक अपना उत्तराधिकारी तय करके जाते हैं. यानी लोगों की भागीदारी और उसके चयन की जगह एक व्यक्ति में आस्था पर निर्भर है यह पूरी प्रणाली.

जिस समाज और व्यवस्था के भीतर किसी एक व्यक्ति की मर्जी सर्वोपरि हो और उसे चुनने या फिर नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था न हो वह किसी लोकतंत्र का आदर्श और नियंत्रक होना तो दूर उसका हिस्सा भी कैसे हो सकता है! इसलिए परिवार के इन सभी रूपों को खारिज किये जाने की जरूरत है. लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं. हमें हर लोकतांत्रिक दायरे में रहकर दिखाने की जरूरत है कि हम जिंदा हैं.