यों तो साधारण जीवन में भी कुछ अकस्‍मात् या अप्रत्‍याशित आकर हमें चकित, जब-तब भौचक्‍का तक, कर देता है, साहित्‍य और कला में यह होता ही रहता है. यह कहा जा सकता है कि कई महान या मूल्‍यवान साहित्यिक या कलात्‍मक क्षण ऐसे ही रचे जाते हैं, सचेत या सोच-विचार कर नहीं.

ऐसे ही कुछ आकस्मिक या अप्रतीक्षित के आने, उसके हस्‍तक्षेप के बारे में वरिष्‍ठ चित्रकार कृष्‍ण खन्‍ना ने गीति सेन के साथ हाल ही में हुई एक बातचीत में बताया. उनका कहना है कि कई बार आपको लगता है कि लगभग 75 प्रतिशत काम एक कलाकृति पर हो चुका है और वह ठीक ही बन रही है. तभी कहीं से अचानक कोई ऐसी सूझ उभरती है जिससे उस कृति का स्‍वभाव ही बदल जाता है. हो सकता है यह आकस्मिक आपको उस कृति के बड़े हिस्‍से को मिटाने या धूमिल करने पर विवश कर दे. इसे ही सृजन का जादू कहा जाता है.

कृष्‍ण खन्‍ना के अनुसार सैयद हैदर रज़ा अकसर इसका जि़क्र करते थे और कई बार इसे दिव्‍य शक्तियों का हस्‍तक्षेप बताते थे. रचना-प्रक्रिया का अपना लगभग स्‍वायत्‍त जीवन और प्रवाह होते हैं. कुछ तो आप रचते हैं, कुछ कला या कोई भी कृति अपने को रचने लगती है. कृष्‍णा खन्‍ना ने यह भी माना कि कई बार यह हस्‍तक्षेप विफल भी जा सकता है, क्‍योंकि सृजन में कुछ भी पूरी तरह से निश्चित नहीं हो सकता या पाया जा सकता. अज्ञेय ने दशकों पहले अपनी एक कविता में कहा था : ‘कहीं बहुत गहरे / सभी स्‍वैर हैं नियम / सभी सर्जन केवल आंचल पसारकर लेना.’

इस प्रसंग में यह याद कर लेना ज़रूरी है कि अकसर आलोचना रचनाओं में इस अकस्‍मात की उपस्थिति का नोटिस नहीं लेती है. लेती भी है तो अकसर उसे किसी वैचारिक या बौद्धिक आधार पर समझने की कोशिश करती है. यही वह मुकाम है जहां आलोचना सृजन के जादू को, एक तरह से, नजरअंदाज करती है. कम से कम हमारे यहां आलोचना में यही होता आया है. कहीं न कहीं यह पूर्वग्रह बद्धमूल है कि सृजन मे भी सब कुछ ज्ञेय है. उसमें अज्ञेयता के लिए जगह या अवकाश न रख पाना सृजन को पूरी तरह से नहीं समझना-समझाना है. यह सच्‍चा मानवीय सौभाग्‍य है कि दर्शन या विज्ञान या विचारधाराओं से बिलकुल अलग साहित्‍य और कलाओं में सब कुछ सोचा-समझा नहीं होता, न पहले से, न बाद में ही.

सागर में बरसों पहले एक विद्वान्-आलोचक थे गंगाधर झा. वे आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के पट्ट और प्रिय शिष्‍य थे और उन्‍हीं के विभाग में एक अध्‍यापक भी. उनकी शायद पहली आलोचना-पुस्‍तक का शीर्षक था - ‘अविचारित का रमणीय’. ज़ाहिर है कि हमारी परंपरा और आधुनिकता में अविचारित पर विचार हुआ है. मुश्किल सिर्फ़ यह है कि उसका एहतराम और अन्‍तर्ध्‍वनि हमारी आज की ज्‍़यादातर आलोचना में नहीं है. शायद इसलिए कि आलोचना अंतिम उत्‍पाद या कृति पर इस क़दर एकाग्र रहती है कि प्रक्रिया पर अधिक ध्‍यान नहीं दे पाती. यह तब जब एक ज़माने में रचना प्रक्रिया को लेकर बहुत बात होती थी. आज भी बहुत से लेखक तो प्रक्रिया पर लिखते रहे हैं पर ज्यादातर आलोचक उसकी कोई ख़ास चिंता नहीं करते.

असहमति और आलोचना देशद्रोह नहीं लोकतंत्र की आत्मा हैं

यह थोड़ा आश्चर्यजनक है कि पिछले दो वर्षों में हमारे देश की बड़ी, आक्रामक और मुखर समस्या देशद्रोह हो गया है. तरह-तरह के रूपों में देश के विभिन्न भागों में देशद्रोह के आरोप कई शक्तियां उन पर लगाने के लिए उत्साहित-सक्रिय हुई हैं जो उनसे असहमत हैं. बहुत तरह की आलोचना, जिसमें राज्य और सत्ता की आलोचना शामिल है, देशद्रोह क़रार दी जाने लगी है. एक तरह का डर कई हलकों में फैलाया जा रहा और व्याप गया है कि संभल कर बोलो या रहो नहीं तो तुम पर देशद्रोह का मामला चल सकता है.

अपनी सांप्रदायिक-राजनैतिक-जातीय-धार्मिक घृणा और असहिष्णुता को अब कई लोग और संस्थाएं बहुत आक्रामकता के साथ व्यक्त कर रहे हैं और उनके रहते नागरिक जीवन में सर्वथा अवांछित तनाव और डर फैला हुआ है. इन शक्तियों के उबराने, स्वयं सत्ता द्वारा ऐसे कार्य करने या किये जाने पर चुप्पी साधकर उसे समर्थन देने का सीधा संबंध भाजपा के केन्द्र में बहुमत से सत्तारूढ़ होने से है. यह विचित्र है कि अपने देशप्रेम का बहुत दम भरनेवाला दल सत्तारूढ़ हुआ और देश में द्रोहियों की संख्या तेज़ी से बढ़ गयी. प्रेम द्वारा द्रोह उकसाने का यह उदाहरण काफ़ी अनोखा है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले से यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार की कड़ी से कड़ी आलोचना, असहमति आदि देशद्रोह के दायरे में क़ानूनन नहीं आते. इस फ़ैसले का क्या प्रभाव पड़ेगा और इससे ज़रा-ज़रा सी आलोचना से उग्र होकर देशद्रोह के आरोप लगाने के उत्साह में कितनी कमी आयेगी यह कहना मुश्किल है. इसका फिलवक़्त कोई प्रमाण नहीं है कि फ़ैसला पढ़कर केन्द्र सरकार किसी तरह के निर्देश पुलिस और राज्यों को सलाह के तौर पर जारी करने जा रही है. अगर हमारे लोकतंत्र का एक अनिवार्य पक्ष उसमें क़ानून का राज्य होना भी है तो उसे यह रूटीन के तौर पर करना चाहिये. पर वह करेगी इसमें शक है. क्योंकि स्वयं उसका ऐसा ग़ैरक़ानूनी उत्साह कम नहीं रहा है.

इस फ़ैसले ने स्मरणीय रूप से लोकतांत्रिक असहमति और आलोचना को देशद्रोह के दायरे से अलग कर लोकतंत्र की आत्मा याने प्रश्नवाचकता का पुनर्वास किया है. अगर इसकी आगे अवहेलना होती रहती है तो फिर क़ानून का रास्ता खुला रहेगा. इस संदर्भ में पुलिस की मनमानी और ज़्यादती की आगे कुछ रोकथाम होगी यह उम्मीद करना चाहिये.

एक और पक्ष है. भले वह लोकतंत्र का ही एक अधिकरण है, लगता यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट ही वह एकमात्र अधिकरण बचा है जिसे लोकतंत्र और उसकी बुनियादी प्रतिज्ञाओं की याद है. और वही है जो गाहे-बगाहे सत्ता को उसकी लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारियों और जवाबदेही की याद दिलाता रहता है. अगर वर्तमान सत्ता सुप्रीम कोर्ट को पसंद नहीं करती और उसे घेरने का लगातार प्रयत्न कर रही है तो यह सकारण है. उसी के कारण हम ऐसे लोकतंत्र में ढकेले जाने से बच रहे हैं जिसमें लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी सत्ता लोकतांत्रिक असहमति के विरूद्ध सक्रिय हो.

अच्छी आलोचना वह होती है जो ‘कला के स्तर पर उन्नीत’ हो जाये

नलिन विलोचन शर्मा का नाम पहले पहल जब सागर रहते एक तरूण लेखक के रूप में सुना था तो आचार्य के रूप में और ‘नकेनवाद’ के एक संस्थापक-कवि के रूप में ही सुना-जाना था. अब जब उनकी जन्मशती हो चुकी है तब पता चला है कि उनकी मृत्यु साढ़े पैंतालीस वर्ष की आयु में ही हो गयी थी.

नलिन जी आलोचना को ऐसा सृजन मानते थे जिससे किसी कृति का निर्माण होता है. उनके लिए आलोचना ‘कला का शेषांश’ थी और अच्छी आलोचना वह थी जो ‘कला के स्तर पर उन्नीत’ हो जाये. हम लोग जब सत्तर के दशक में ‘पूर्वग्रह’ पत्रिका के माध्यम से सर्जनात्मक आलोचना की बात कर रहे थे तो हमें उनके इस मत का पता न था.

नकेनवाद स्वयं उसके संस्थापक कवियों द्वारा अपने आंदोलन को दिया नाम था जबकि छायावाद और प्रयोगवाद नाम उनके संस्थापक-कवियों ने नहीं आलोचकों ने उन पर थोपे थे. ठीक से याद नहीं पर शायद बनारस से निकलनेवाली पत्रिका ‘कवि’ में पहले पहल नलिन जी की यह कविता हमने पढ़ी थी:

अली अकबर खां

सरोद पर तुमने था बजाया,

मैं समझा नहीं. मैंने देखा,

पीतल और लोहे से

तुमने मधु निचोड़ा:

सारा कड़वापन दूर हो गया,

मधु विंदुत होकर बंट गया.

नलिन जी ने आलोचक के रूप में प्रेमचंद पर विस्तार से लिखा. रेणु के ‘मैला आंचल’ के वे पहले समीक्षकों में से थे और उन्होंने कहा था कि ‘हिंदी के उपन्यास-साहित्य में, यदि गत्यवरोध था, तो इस कृति से वह हट गया है.’ प्रगतिवाद का विश्लेषण करते हुए नलिन जी ने कहा था... ‘ये तीन-चार तथ्य स्पष्ट हैं- 1. वह वीरपूजा करता है. 2. वह जनपूजा में अंधविश्वास रखता है. 3. वह कुछ सुनिश्चित सिद्धांतों में बंधा हुआ है. 4. वह घृणा करता है.

1947 में लिखे एक निबंध में नलिन जी ने लिखा: ‘प्रेमचंद की कहानियां, प्रारंभिक कहानियों को छोड़कर और जैनेंद्र की कहानियां, बाद की कहानियों को छोड़कर किसी नीति का निर्देश नहीं करतीं, न किसी आदर्श की अवतारणा. वे तो अपनी संपूर्णता में नीति, उपदेश, आदर्श हैं ही. जैसा कि चेस्टर्टन एक निबंध में टालस्टाय की रचनाओं के बारे में कहता है और जो कि सभी उत्कृष्ट कलाकृतियों के बारे में सच है भी - ‘दि बैड फ़ेबल हैज मॉरल, व्हाइल दि गुड फ़ेबल इज़ अ मॉरल.’

आलोचना-विद्वान् गोपेश्वर सिंह ने साहित्य अकादेमी से ‘नलिन विलोचन शर्मा: रचना संचयन’ संपादित और प्रकाशित किया है जो नलिन जी का श्रेष्ठ और प्रातिनिधिक एकत्र करता है. उसके बहाने नलिन जी के अवदान पर पुनर्विचार की शुरूआत हो सकती है, होना चाहिये.