भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रिपरिषद से बाहर किए गए गायत्री प्रसाद प्रजापति की अखिलेश सरकार में वापसी की घोषणा के साथ ही समाजवादी पार्टी की टकरावगाथा का पहला अध्याय पूरा होता दिख रहा है. इस दौरान कई क्रियाएं हुईं और कई प्रतिक्रियाएं भी. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव से सारे विभाग वापस लेने को अपना साहसी फैसला बताया और यह भी साफ कर दिया कि अगर अगली बार सरकार बनी तो मुख्यमंत्री वे ही होंगे. यानी उन्होंने संदेश दे दिया कि चाचा शिवपाल प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री तो हो सकते हैं लेकिन, वे मुख्यमंत्री पद पाने के सपने देखना छोड़ दें.

हालांकि शिवपाल कहते हैं कि उनके सामने पहला लक्ष्य अभी पार्टी को चुनाव के लिए तैयार करना है. उनके मुताबिक दूसरा लक्ष्य चुनाव में जीतना है और उसके बाद तय होगा कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा. अखिलेश को अगला मुख्यमंत्री घोषित करने में उनका संकोच साफ दिखता है. वे यह भी कहना नहीं भूलते कि मुख्यमंत्री पद पर आने के बाद ‘अहं’ आड़े नहीं आना चाहिए.

अमर सिंह समाजवादी पार्टी में अपनी दूसरी पारी में अब ‘रिटायर्ड हर्ट’ खिलाड़ी की तरह ही रह सकेंगे. वे बाहर भी धकेले जा सकते हैं

महोत्सवों की शौकीन समाजवादी पार्टी का यह 'सत्ता महोत्सव' है. झगड़ा उस कुर्सी के लिए है जो पार्टी के लिए अभी लोमड़ी के खट्टे अंगूर जैसी है. ‘कुर्सी’ का हकदार कौन बनेगा यह उत्तर प्रदेश की जनता के वोट से तय होगा. लेकिन राजनीति में लम्बे समय तक मुलायम सिंह की छाया में दूसरे और तीसरे नंबर के नेता रहे शिवपाल यादव की महत्वाकांक्षा अब मुख्यमंत्री पद पाने के लिए करवटें लेने लगी है. चाचा की ओर से मिली इस चुनौती ने जब अखिलेश यादव को परेशान किया तो सम्भावित प्रतिद्वन्दी को मुकाबले से पहले ही चित्त करने की आकुलता में उन्होंने अपने विशेषाधिकारों का ऐसा इस्तेमाल किया कि पार्टी में भूचाल आ गया.

इसके बाद मुलायम सिंह के दखल से हुए युद्ध विराम के बाद जो फैसला सबसे पहले सार्वजनिक हुआ वह था दागी गायत्री प्रजापति की मंत्रिपरिषद में वापसी का. यह घोषणा पारिवारिक टकराव को थामने के लिए कई दौर की बैठकों के बाद खुद मुलायम सिंह यादव ने की. इसके बाद ही यह जानकारी भी सार्वजनिक हुई कि शिवपाल यादव को पार्टी प्रदेश अध्यक्ष पद के साथ उनके पुराने विभाग भी वापस लौटा (लोक निर्माण विभाग या पीडब्ल्यूडी को छोड़कर) दिए गए हैं. शिवपाल अब अध्यक्ष तो रहेंगे लेकिन विधानसभा प्रत्याशियों के टिकटों का फैसला करने का हक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास रहेगा. शिवपाल को कुछ नए विभाग तो मिले हैं मगर उनकी पहचान बन चुका लोक निर्माण विभाग उनसे छीन लिया गया है. यानी वे मंत्री तो हैं मगर पहचान छिन गई है और प्रदेश अध्यक्ष तो हैं मगर अधिकार छिन गए हैं.

इस युद्ध विराम समझौते के बाद कई बातें साफ हुईं हैं. पहली बात अमर सिंह की भूमिका को लेकर है. इस पूरे प्रकरण में अमर सिंह यादव परिवार के निशाने पर दिखे. रामगोपाल और अखिलेश यादव ने उनका नाम लिए बिना उन पर पार्टी तोड़ने का आरोप लगाया और सारे फसाद का जिम्मेदार उन्हीं को बताया गया. यह कहा गया कि अब पार्टी में ‘बाहरी’ का दखल नहीं चलने दिया जाएगा. यानी अमर सिंह समाजवादी पार्टी में अपनी दूसरी पारी में अब ‘रिटायर्ड हर्ट’ खिलाड़ी की तरह ही रह सकेंगे. वे बाहर भी धकेले जा सकते हैं.

समाजवादी पार्टी में चल रहे अंतर्कलह के खेल में खुद के नम्बर बढ़ाने के चक्कर में रामगोपाल कुछ ऐसे उलझे कि पहली बार पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें बाहर करने तक के नारे लगा डाले

दूसरी बात प्रोफेसर कहे जाने वाले रामगोपाल यादव की है. सुलह समझौते के लिए लखनऊ आकर उन्होंने जो किया उससे संकेत साफ था कि वे पूरी तरह से अखिलेश के साथ हैं. इसके लिए उन्होंने पार्टी के सबसे बड़े नेता मुलायम सिंह यादव पर भी उंगली उठाने से संकोच नहीं किया. उन्होने कहा कि अखिलेश को अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला सही ढंग से नहीं लिया गया और ‘शीर्ष नेतृत्व’ से इसमें बड़ी चूक हुई. ‘शीर्ष नेतृत्व’ कह कर मुलायम को निशाने पर लेते वक्त रामगोपाल यह भी भूल गए कि फैसले की चिट्ठी उन्हीं के दस्तखत से जारी हुई थी. लेकिन समाजवादी पार्टी में चल रहे अंतर्कलह के खेल में खुद के नम्बर बढ़ाने के चक्कर में रामगोपाल कुछ ऐसे उलझे कि पहली बार पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें बाहर करने तक के नारे लगा डाले.

बाहरी तौर पर शिवपाल यादव अब अपना सम्मान वापस पाने में सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं. इस दौरान अपने युवा पुत्र आदित्य यादव को सामने लाकर उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी के लिए प्रदेश की सत्ता का रास्ता भी खोल दिया है. लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि अखिलेश यादव और उनके बीच अब हमेशा के लिए प्रतिस्पर्धी खाई सार्वजनिक हो गई है जिसे लांघ कर अपने प्रिय भतीजे तक पुराने अधिकार के साथ अब वे कभी नहीं पहुंच पाएंगे. यानी परिवार में उनका दर्जा और अधिकार अब सीमित हो गए हैं. अखिलेश के जरिए शिवपाल को एक बार सत्ता से बाहर का रास्ता दिखवाकर मुलायम ने एक तरह से हमेशा के लिए शिवपाल की हद बांध दी है. हालांकि वे इस हद से ही अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं. ताजा खबर मिलने तक उन्होंने तीन विधान परिषद सदस्यों सहित अखिलेश और रामगोपाल यादव के करीबी सात नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया था. इनमें एक रामगोपाल यादव के भांजे अरविंद प्रताप यादव भी हैं.

मुलायम सिंह के लिए माना जा सकता है कि अब भी पार्टी में उनकी राय सर्वोपरि है. वे एक ओर अपने भाई को मनाने में सफल हुए तो दूसरी ओर अपने बड़े पुत्र के हितों को बचाने में भी. हालांकि अपने दूसरे पुत्र के आर्थिक हितों को बचाए रखने के लिए उन्हें गायत्री प्रजापति की बहाली की भी घोषणा करनी पड़ी. यानी ‘दशरथ’ की भूमिका में उन्हें अपने एक पुत्र की खातिर दूसरे पुत्र की गायत्री प्रजापति के खिलाफ की गई बड़ी कार्रवाई को रद्द करना पड़ा. मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश इससे दागदार तो हुए मगर परिवार के अन्दर यह भी तय हो गया कि मुलायम के बाद अगर कोई और महत्वपूर्ण है तो वे सिर्फ अखिलेश हैं.

अखिलेश ने चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन का अधिकार अपने हाथ में लेने का दावा करके यह साबित कर दिया है कि 2017 के चुनाव में उम्मीदवारी उनकी वफादारी पर बंटेगी

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में चाचा शिवपाल के खिलाफ प्रतिक्रिया में जो बड़ा कदम उठाया था उसे वापस लेकर स्थिति को सामान्य करने का उन्होंने प्रयास तो किया, मगर गायत्री प्रजापति जैसे दागी नेता को पिता की इच्छा पर मंत्री पद वापस देने के कारण उनकी उजली कही जाने वाली छवि को बड़ा धक्का पहुंचा. एक बेदाग चेहरे के रूप में उनको मतदाताओं के सामने पेश करने की सम्भावनाएं अब धुंधली पड़ गई हैं. वैसे अखिलेश ने चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन का अधिकार अपने हाथ में लेने का दावा करके यह साबित कर दिया है कि 2017 के चुनाव में उम्मीदवारी उनकी वफादारी पर बंटेगी, चाचा की वफादारी पर नहीं. यह बात आगे के दिनों में सत्ता के विवाद को और भड़का सकती है.

रही बात समाजवादी पार्टी की तो, पार्टी के बारे में खुद मुलायम सिंह कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि पार्टी कार्यकर्ता जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं. मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. ऐसा ही शिवपाल ने भी कहा था कि पार्टी के लोग जमीनों पर कब्जा करने में जुटे हैं. जनता के बीच भी विकास के तमाम दावों के बावजूद अखिलेश सरकार और समाजवादी पार्टी की छवि भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी की पोषक पार्टी की बन चुकी है. ऐसे में गायत्री प्रजापति की बहाली अखिलेश यादव की छवि पर एक बड़े धब्बे जैसी होने जा रही है. विपक्षी दलों के लिए यह एक बिन मांगा अवसर बन गया कि वे अखिलेश की छवि को लेकर समाजवादी पार्टी की चुनावी तैयारियों में पलीता लगा सकें. माना यह जा रहा है कि खनन घोटाले की सीबीआई जांच के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर इस दाग से बचने की कोशिश कर रही है.

कुल मिलाकर महोत्सवों की शौकीन समाजवादी पार्टी के लिए ताजा सत्ता महोत्सव 2017 के चुनावों से पहले एक आत्मघाती झटका हो सकता है. इसने शिवपाल यादव को खिसियाने पर मजबूर किया है. मुलायम सिंह यादव को कमजोर साबित किया है. रामगोपाल का मौकापरस्त होना सिद्ध किया है और अखिलेश को सर्वशक्तिमान बनने की राह में कई कदम पीछे धकेल दिया है. रही बात उत्तर प्रदेश की जनता की तो वह एक बार फिर समाजवाद के नाम पर ठगी हुई दिख रही है.