हिंदुस्तान का सामाजिक और उसकी वजह से राजनीतिक परिवेश ऐसा है कि यहां लगभग हर राजनीतिक दल की पहचान किसी न किसी जाति या धर्म विशेष से जोड़कर होती है. कोई सवर्णों की पार्टी है तो कोई पिछड़ी जातियों की. कोई यादवों की तो कोई दलितों की. भाजपा जैसे दल भी हैं जिन्हें हिंदुत्व की राजनीति करने वाला माना जाता है. यानी कि ज्यादातर मामलों में एक मोटा-मोटा अनुमान लगाना काफी आसान होता है कि किसी जाति या समुदाय विशेष का वोट किसे मिलेगा.

इन सबके बीच मुस्लिम समुदाय भी है जिसके बारे में हमेशा ही यह अनुमान लगाना मुश्किल रहा है कि वह किस दल को तवज्जो देगा. उत्तर प्रदेश में जहां यह समाज निर्णायक भूमिका में है, अगर कोई सीधा कारण मौजूद न हो तो यह पता करना और भी मुश्किल हो सकता है.

आंकड़ों पर अगर नजर डालें यह मुश्किल वाकई कितनी बड़ी है इस बात का अंदाजा लग जाता है. जनसंख्या की दृष्टि से देश के सबसे बड़े इस राज्य में मुस्लिमों की जनसंख्या 19 फीसदी के करीब है. करीब 140 विधानसभा सीटों पर 10 से 20 फीसदी तक मुस्लिम आबादी है. 70 सीटों पर 20 से 30 फीसदी और 73 सीटों पर 30 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी है. यानी साफ़ है कि मुस्लिम 140 सीटों पर प्रत्यक्ष रूप से असर डालते हैं. यही कारण है कि चुनाव के समय तकरीबन सारी पार्टियां विशेष रूप से मुस्लिम वोटरों को अपनी ओर खींचने में लग जाती हैं.

इस बार विधानसभा चुनाव से पहले कई मुस्लिम संगठनों और हैदराबाद के बड़े मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी की उपस्थिति ने स्थिति को और ज्यादा रोचक बना दिया है.

अगर इस समुदाय के वोट देने के नजरिये को देखें तो बाबरी विध्वंस के बाद से उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मुस्लिम वोट मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को मिले हैं. लेकिन, पिछले कुछ चुनावों से मुसलमानों का मुलायम से मोहभंग भी होता नजर आया है. चुनाव परिणामों का विश्लेषण करने वाली दिल्ली की संस्था सीएसडीएस के आंकड़ों के मुताबिक 2002 के विधानसभा चुनावों में सपा को 54 फीसदी मुस्लिम वोट मिला था. 2007 के विधानसभा चुनावों में ये घटकर 45 फीसदी रह गया और 2012 के चुनावों में जब पार्टी को अब तक की सबसे बड़ी जीत मिली, तब यह घटकर 39 फीसदी ही रह गया.

इसके विपरीत बसपा की ओर धीरे-धीरे ही सही लेकिन मुस्लिमों का रुझान बढ़ा है. 2002 में बसपा को 9 फीसदी मुस्लिम वोट मिला था जो 2007 में 17 फीसदी और 2012 के चुनाव में 20 फीसदी हो गया. हालांकि, इन दो पार्टियों के अलावा विधानसभा चुनावों में मुस्लिमों ने कांग्रेस को भी तरजीह दी है. 2002 के चुनाव में कांग्रेस को 10 फीसदी मुस्लिम वोट मिला था जो 2012 में 18 फीसदी हो गया.

इस समुदाय का वोट कभी बंट जाता है तो कभी एक मुश्त एक दल को ही चला जाता है. विधानसभा चुनावों से लोकसभा का चुनाव आते-आते तस्वीर उलट जाती है और इसी कारण मुस्लिमों के रुख का सही अंदाजा नहीं लग पाता है. लेकिन, इस बार इसका अंदाजा लगाना और भी कठिन हो गया है. दरअसल, विधानसभा चुनाव से पहले कई मुस्लिम संगठनों के दावा ठोंकने और हैदराबाद के बड़े मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी की उपस्थिति की वजह से स्थिति काफी रोचक हो गई है.

यूपी में छोटे-छोटे मुस्लिम संगठनों ने इत्तेहाद फ्रंट नामक एक संगठन बनाया है. इस संगठन में मोहम्मद अयूब की पीस पार्टी समेत कई नामी मुस्लिम संगठन शामिल हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में 4 सीटें जीत चुके मोहम्मद अयूब कहते हैं कि अभी इस फ्रंट में कई और पार्टियां भी जुड़ेंगी. उनके मुताबिक वे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, असदुद्दीन ओवैसी और कौमी एकता दल से भी इस बारे में बात कर रहे हैं और जल्द ही अच्छी खबर मिल सकती है.

कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़ी जातियों के गठजोड़ की कोशिश में हैं. और जल्द ही वे कुछ मुस्लिम पार्टियों और नीतीश कुमार को साथ लेकर एक गठबंधन बना सकते हैं.

उधर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कदम रखने वाले असदुद्दीन ओवैसी की स्थिति भी ठीक-ठाक नजर आ रही है. मुलायम के गढ़ कहे जाने वाले आजमगढ़ में उनके प्रत्याशी ने पंचायत चुनाव में जीत हासिल कर सभी को चौंका दिया था. इसके अलावा यूपी में उनकी स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते दिनों हुए तीन उप-चुनावों में ओवैसी ने फैजाबाद के निकट बीकापुर से अपना उम्मीदवार उतारा था उनके इस दलित प्रत्याशी को भाजपा के प्रत्याशी से केवल 77 वोट ही कम मिले थे.

ओवैसी की रणनीति की ख़ास बात यह है कि यह पूरी तरह से दलित और मुस्लिम गठजोड़ पर केंद्रित है. ओवैसी अपनी सभी सभाओं में मुस्लिमों से दलितों को जोड़ने की अपील करते हैं. पंचायत चुनाव में उनके अधिकतर प्रत्याशी भी दलित ही थे. ओवैसी के बारे में एक विशेष बात यह भी है कि अपनी प्रचार सभा के दौरान वे सभी राजनीतिक दलों पर तो हमला बोलते हैं, लेकिन बहुजन समाज पार्टी के बारे में कुछ न कहकर यह संकेत भी देते हैं कि भविष्य में उनके बसपा के साथ जुड़ने की संभावनाएं हैं.

ओवैसी की ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगाता है कि पिछले साल उनकी कुछ सभाओं में उमड़ी भीड़ देखकर सपा सरकार ने उनके प्रदेश में सभा करने पर रोक लगा दी थी. यूपी में मिल रहे समर्थन से खुश ओवैसी ने इसी महीने घोषणा की है कि वे चुनाव से पहले गठबंधन जरूर करेंगे और उनकी मुख्य लड़ाई सपा और भाजपा से है.

उधर, कौमी एकता दल के अफजाल अंसारी भी पिछड़ी जातियों और मुस्लिमों की छोटी पार्टियों से गठबंधन की घोषणा कर चुके हैं. अंसारी ने कांग्रेस को भी इस गठबंधन में शामिल होने का न्योता दिया है. जानकारों की माने तो अभी ब्राह्मण वोटों पर नजर रख रही कांग्रेस भी चुनाव करीब आते-आते कुछ मुस्लिम पार्टियों से गठबंधन कर सकती है. इसका कारण है कि यूपी में कांग्रेस के पास कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा नहीं है और साथ ही राज्य में पिछले लोकसभा चुनावों में उसका मुस्लिम वोट बैंक घटकर केवल 10 प्रतिशत ही रह गया. खबरें ये भी हैं कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति बनाने के लिए जिम्मेदार प्रशांत किशोर ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़ी जातियों का गठजोड़ बनाना चाहते हैं. इसीलिए वे कुछ छोटी मुस्लिम पार्टियों के साथ-साथ नीतीश कुमार को साथ लेकर एक गठबंधन बना सकते हैं.

मुस्लिमों के मामले में सपा के खिलाफ जा रही चीजों का मायावती पूरी तरह से फायदा उठाने की कोशिश में हैं. और इसीलिए इस बार उनके सोशल इंजीनिरिंग फार्मूले में केवल मुसलमान और दलित ही रह गये हैं.

अगर प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों की बात करें तो मुस्लिम वोटों को लेकर इस बार सपा की स्थिति सबसे ज्यादा खराब मानी जा रही हैं. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मुजफ्फरनगर दंगों में सपा सरकार के रुख और दादरी में अख़लाक़ की हत्या के बाद से अधिकतर मुस्लिमों का सपा पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा. इसके अलावा बिहार चुनाव के दौरान मुलायम के एकाएक नीतीश और लालू के महागठबंधन को छोड़ने के फैसले को भी मुस्लिम समुदाय उसकी भाजपा से मिलीभगत की तरह देख रहा है.

सपा के खिलाफ जा रही इन चीजों का मायावती पूरी तरह से फायदा उठाने की कोशिश में हैं. बताया जाता है कि इसी कोशिश के चलते बहन जी के सोशल इंजीनिरिंग के फार्मूले में अब मुसलमान और दलित ही रह गये हैं. पार्टी ने इस बार सबसे ज्यादा 100 मुस्लिम प्रत्याशी उतारने का फैसला भी किया है. जानकारों के मुताबिक बसपा सुप्रीमो जानती हैं कि मुस्लिम सपा से नाराज है और कांग्रेस की स्थिति भी ऐसी नहीं है जिससे मुस्लिम उस ओर नजर घुमाएं. ऐसे में उन्हें केवल बसपा ही नजर आएगी और इसलिए मायावती अपना फोकस केवल दलित और मुस्लिम पर ही केंद्रित करना चाहती हैं.

उत्तर प्रदेश में 30 फीसदी तक वोट पाने वाली पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आ जाती है. जबकि यहां दलित और मुस्लिम समुदाय का मत प्रतिशत मिलकर 39 फीसदी होता है. ऐसे में मायावती को उम्मीद है कि वे इन दो तबकों का वोट हासिल कर यूपी की सत्ता तक पहुंच सकती हैं. लेकिन, इस बात में कोई संशय नहीं है कि छोटी मुस्लिम पार्टियों का गठजोड़ और ओवैसी की मुस्लिम दलित राजनीति माया का खेल बिगाड़ सकती है. इन सभी समीकरणों को देखते हुए ही जानकार कहते हैं कि 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों को लेकर ऐसी स्थिति बनी है कि बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के साथ-साथ खुद मुस्लिम भी इस पसोपेश में हैं कि आखिर वे जाएं तो किसके साथ?

हालांकि, इन सब कयासों के बीच यह भी है कि मुजफ्फरनगर दंगों, अख़लाक़ की मौत, गौमांस का मुद्दा, कैराना मुद्दे को सांप्रदायिक बनाने की कोशिशों से इन चुनावों में मुस्लिमों को लेकर भाजपा के आक्रामक रुख का अंदाजा हो जाता है. कुछ लोगों को यह भी लगता है कि भाजपा के इस रुख की वजह से सूबे का मुस्लिम समाज भाजपा को हराने के लिए गोलबंद भी हो सकता है.

जानकार कहते हैं कि ऐसी स्थिति बनने पर मुस्लिम समुदाय बिना बंटे अपना वोट केवल उसी दल को देगा जो उसे भाजपा को हराते हुए नजर आएगा. फिर चाहे भाजपा के सामने सबसे मजबूत दिख रही पार्टी सपा हो या बसपा.