करीना कपूर को वापसी करने में वक्त नहीं लगता. एक लंबे अरसे से अपने हुनर को लेकर बेतकल्लुफ रहने वाली इस अति की प्रतिभावान अभिनेत्री को कायदे के अभिनय से सजी सिर्फ एक-दो फिल्में ही करनी होती हैं, और उनको लेकर नाराजगी की शक्लें अख्तियार कर चुकी जायज शिकायतें काफूर हो जाती हैं. ‘उड़ता पंजाब’ के बाद यही शिकायतें मुस्कुराई थीं, जो चाहकर भी काफूर नहीं हो पाईं क्योंकि करीना द्वारा पिछले कई सालों से की गईं इधर-उधर की ढेरों बेमतलब फिल्मों की याद उन्हें वापस नाराज करने के लिए काफी थी!

करीना कपूर खान के फिल्मी करियर में यही एक मसला है. वो अपने हुनर को लेकर गंभीर नहीं रहतीं और औनी-पौनी फिल्में भी बड़ी शान से करती हैं. उन्हें इस मसले का कोई मलाल भी नहीं, और इसी वजह से हमारे समय की सर्वश्रेष्ठ यह अभिनेत्री पिछले कुछ समय से उम्दा अभिनय को किनारे कर खुद को फिल्मों में करीने से सजाकर रखने वाला सामान बना चुकी है.

विडम्बना ही है कि करीना कपूर ने उस दौर में अभिनय की शुरुआत की थी, जब अपने अहम में डूबा हुआ बॉलीवुड नायिकाओं को फिल्मों में करीने से सजाकर रखने वाला एक खूबसूरत सामान ही समझता था. लेकिन करिश्मा और अपनी समकालीन अभिनेत्रियों की ही तरह अपने करियर की शुरुआत में ताबड़तोड़ ऐसी फिल्में करने वाली करीना ने जल्द ही ‘चमेली’, ‘देव’ और ‘युवा’ से यह जाहिर कर दिया कि वे एक बनावटी सामान बनने के लिए इस इंडस्ट्री में नहीं आईं हैं. गौर करके देखिए कि अपने करियर की शुरुआत में करीना के पास आज वाला बेहतर समय भी नहीं था, जिसके होने की वजह से ही आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण, परिणीति चोपड़ा और कंगना रनोट जैसी अभिनेत्रियों ने हिंदी फिल्मों में नायिकाओं की भूमिकाओं की परिभाषा को बदलकर रख दिया है. वे करिश्मा कपूर के दौर में अपना करियर शुरू करने वाली अभिनेत्री थीं और उस दौर की कचरा-पेटी में कैसी-कैसी फिल्में पड़ी हैं, हम सबने देखी हुईं हैं.

विडम्बना ही है कि करीना कपूर ने उस दौर में अभिनय की शुरुआत की थी, जब अपने अहम में डूबा हुआ बॉलीवुड नायिकाओं को फिल्मों में करीने से सजाकर रखने वाला एक खूबसूरत सामान ही समझता था

‘चमेली’ और ‘देव’ से एक ठस्स चलन को स्वीकार नहीं करने के इरादे जाहिर करने के बाद करीना ने ‘ओमकारा’ की और फिर करियर-डिफाइनिंग ‘जब वी मेट’. इनके बाद यह अभिनेत्री न सिर्फ अपनी समकालीन अभिनेत्रियों से बहुत आगे निकल गई बल्कि उस रास्ते की भी मुसाफिर बन गई जहां लगातार और बिना थके चलने पर प्राय: दुनिया आपको ग्रेट एक्टर या महान अभिनेत्री कहकर बुलाने लगती है. क्योंकि सिर्फ अलहदा अभिनय प्रतिभा से लबरेज होना किसी एक्टर को इतिहास का हिस्सा नहीं बनाता, बल्कि उसकी चुनी हुई फिल्में बताती हैं कि सिनेमा के इतिहास में उसका नाम कितनी दफा और कितनी सुंदरता से लिखा जाने वाला है.

‘जब वी मेट’ के बाद ‘3 इडियट्स’, ‘कुर्बान’, ‘एक मैं और एक तू’ और ‘तलाश’ जैसी कुछ फिल्मों में उसी रास्ते का सफर करने वालीं बेमिसाल करीना नजर आईं लेकिन साथ ही वे बेवजह की सोती-रोती-गाती फिल्में भी करती रहीं और ऐसी फिल्मों के ढेर लगाने की वजह से ही वक्त से पहले थकने लगीं. या फिर ग्लैमर की दुनिया के भंवरजाल में फंसने लगीं और फिर से उन्हीं फिल्मों में रमने लगीं जिनसे दूरी बनाने की वजह से ही दुनिया उन्हें अपने वक्त की सबसे संभावनाशील अभिनेत्री कहने लगी थी. ‘बजरंगी भाईजान’ तक आते-आते उनका वक्त इस कदर बदला कि ‘अभिनय’ से जानबूझकर कोसों दूर चलने वाले ‘अभिनेता’ सलमान के अभिनय की लोग तारीफ करने लगे, और करीना की प्रशंसा में किसी ने आधे-अधूरे मन से आधी-अधूरी पंक्ति तक नहीं लिखी. एक अभिनेत्री जो अभिनय में दक्षता की वजह से ही महानता के करीब पहुंचने लायक थी, आलोचकों के लिए अभिनय में सलमान खान से भी कमतर सिद्ध हो गई.

‘बजरंगी भाईजान’ में एक खूबसूरत मैनिक्विन बनना उन्होंने खुद चुना और खबरों के मुताबिक खुद सलमान के घर जाकर इस भूमिका को निभाने के लिए दबाव बनाया. इससे पहले ‘सिंघम रिटर्न्स’, ‘गोरी तेरे प्यार में’ और ‘सत्याग्रह’ में भी बुतनुमा खूबसूरत किरदार चुनने में गुरेज नहीं किया और इन सभी किरदारों में अभिनय की संभावनाओं को तलाशने से सिरे से इंकार कर दिया. यह भी दिलचस्प विडंबना है कि जिस अभिनेत्री को लगातार हमारी फिल्मों की क्वीन होना था वह मैनिक्विन हो गई, और जिस ‘क्वीन’ से एक अभिनेत्री (कंगना रनोट) की जिंदगी बदली, वह फिल्म पहले करीना कपूर को ऑफर हुई थी!

करीना कपूर अपने करियर को लेकर अब लापरवाह-बेपरवाह हो गई हैं, या उदासीन, या फिर पुरानी वाली आग ठंडी पड़ गई है, इसको समझने के लिए आप उनके करियर की तुलना प्रियंका चोपड़ा के करियर से भी कर सकते हैं

करीना कपूर की कही यह उक्ति अपने वक्त में काफी मशहूर हुई थी, ‘किसी भी हीरोइन ने मुझसे ज्यादा फिल्में रिजेक्ट नहीं की हैं.’ इस उक्ति में यह पुष्टि भी है कि इन खारिज फिल्मों में कई अच्छी फिल्में शामिल थीं जिन्हें नहीं चुनकर उन्होंने मसाला और खाली-खोखली फिल्मों का हिस्सा बनना स्वीकारा. ‘कहो न प्यार है’, ‘कल हो न हो’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘शुद्धि’, ‘राम-लीला’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के अलावा सुजॉय घोष की ‘दुर्गा रानी सिंह’, ‘दिल धड़कने दो’ और ‘क्वीन’ वे चंद फिल्में हैं जिन्हें करीना ने ठुकराया. ‘राम-लीला’ छोड़कर ‘गोरी तेरे प्यार में’ और ‘दिल धड़कने दो’ छोड़कर ‘बजरंगी भाईजान’ करने वाली यही करीना जब ‘गोरी तेरे प्यार में’ जैसी सतही और हास्यास्पद फिल्म भी मन लगाकर करतीं हैं तो अचरज होता है कि आखिर किस प्रक्रिया को अपनाकर वे फिल्मों का चयन किया करती हैं. अक्कड़ बक्कड बम्बे बो खेलकर?

वे अपने करियर को लेकर अब लापरवाह-बेपरवाह हो गई हैं, या उदासीन, या फिर पुरानी वाली आग ठंडी पड़ गई है, इसको समझने के लिए आप उनके करियर की तुलना प्रियंका चोपड़ा के करियर से भी कर सकते हैं. करीना की पहली फिल्म के सिर्फ तीन साल बाद अपना फिल्म करियर शुरू करने वाली प्रियंका चोपड़ा (द हीरो, 2003) ने भी ढेरों खाली-खोखली फिल्में की हैं, कुछ बेहद शानदार रोल निभाए हैं, और जब हिंदी फिल्मों में अच्छे काम की कमी होने लगी और दर्शक उनके काम को नापसंद करने लगे, तब विदेश जाकर अपने करियर को रीडिफाइन करने का साहस भी दिखाया है. आज वो अमेरिका में किए अपने काम की वजह से ही हिंदुस्तान में दीपिका और कंगना के समकक्ष खड़ी एक अभिनेत्री हैं और यह सिर्फ खराब फिल्मों के चुनाव और अपने काम के प्रति कम गंभीर होने की वजह से ही है, कि करीना कपूर उस स्तर की सफल अभिनेत्री आज नहीं हैं जिस स्तर की उन्हें होना चाहिए था, और जिस स्तर की सफलता को उनसे अभिनय प्रतिभा में कमतर प्रियंका चोपड़ा ने सिर्फ अपनी लगन के बलबूते हासिल कर लिया है.

यह कहना भी अतिशयोक्ति की दीवार लांघना नहीं है कि दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा और कंगना रनोट (कुछ हद तक आलिया भट्ट और तापसी पन्नू) जैसी अभिनेत्रियों से परिभाषित इस दौर में भी अभिनय प्रतिभा के आधार पर करीना कपूर ही सर्वश्रेष्ठ हैं. पिछले कुछ सालों से हम कमर्शियल स्पेस में जिन हीरोइनों की तारीफ का तालाब भरते रहे हैं - दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा व कंगना रनोट - इन तीनों ने ही अपनी-अपनी क्षमताओं की परिधि के आस-पास की फिल्मों में ही कमाल किया है. अपना कम्फर्ट जोन किसी ने नहीं छोड़ा. कंगना जब ‘कट्टी बट्टी’ जैसी फिल्में करती हैं तो नाकाबिले बरदाश्त होती हैं, किसी ‘जय गंगाजल’ में प्रियंका का भागते-भागते किया गया किरदार आज भी अखरता है और ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी सुपरहिट फिल्म में भी दीपिका असाधारण तो नहीं ही हो पातीं. और क्या इन तीनों में से कोई भी करियर के इस मुकाम पर करीना की ‘चमेली’ कर सकती हैं? ‘देव’? ‘ओमकारा’? एक खराब सी फिल्म ‘कुर्बान’ में भी याद रहने वाला किरदार, जैसा करीना ने किया था? और क्या ‘जब वी मेट’ जैसा मुख्तलिफ शिखर तीनों में से कोई एक भी, एक बार भी छू सकती हैं?

करीना कपूर वह दुर्लभ अभिनेत्री भी हैं जो किसी ‘उड़ता पंजाब’ में चौथे नम्बर का महत्वपूर्ण किरदार करने के बावजूद (शाहिद, आलिया और दिलजीत के बाद) अपने स्वाभाविक अभिनय से दिल जीत लेती हैं

कंगना कुछ साल पहले ही अभिनय में परिपक्व हुई हैं, प्रियंका अपने विदेशी एसाइनमेंट्स की वजह से ही देश में सम्मान पा रही हैं, और दीपिका तो अब इतना सधा अभिनय करने लगी हैं कि फिल्मों में उनकी हंसी भी इंचीटेप से नापी हुई लगती है. उनका हर मूवमेंट नपातुला और परफेक्ट है, और इसीलिए ‘पीकू’ या ‘तमाशा’ में उनको देखकर हैरत हुई थी क्योंकि इन फिल्मों में सीखे हुए अभिनय को भूलकर उन्होंने नेचुरल रहने की कोशिश की थी. करीना कपूर हमेशा से ही ऐसा करती रही हैं, और वे इतनी नेचुरल और स्पांटेनियस हैं कि उनके जैसे अभिनय की झलक किसी और अभिनेत्री में नजर नहीं आती है. उनके एक्सप्रेशन, सिनेमा या अभिनय की किसी किताब के नहीं लगते और आप पुराने जमाने की किसी भी अभिनेत्री से उनकी तुलना नहीं कर सकते. अगर अनुराग कश्यप ने कभी कहा था कि उन्होंने अनुष्का शर्मा को ‘बाम्बे वेलवेट’ में इसलिए कास्ट किया क्योंकि वो उन्हें अभी तक की किसी भी अभिनेत्री की याद नहीं दिलातीं तो इसका पहला उदाहरण हमारे समय में करीना कपूर को ही होना चाहिए. वे हमें सिर्फ और सिर्फ करीना कपूर की याद दिलाती हैं, और आलिया भट्ट भी तो उन्हीं की याद दिलाती हैं.

करीना कपूर वह दुर्लभ अभिनेत्री भी हैं जो किसी ‘उड़ता पंजाब’ में चौथे नम्बर का महत्वपूर्ण किरदार करने के बावजूद (शाहिद, आलिया और दिलजीत के बाद) अपने स्वाभाविक अभिनय से दिल जीत लेती हैं. किसी साधारण ‘की एंड का’ में एकमात्र उम्मीद भरा किरदार होती हैं और प्रेग्नेंसी के दौरान ‘मैं काम करती रहूंगी, जैसे कि दुनिया भर की बाकी औरतें बच्चे की पैदाइश के बाद करती हैं!’ कहकर अपनी बेबाक समझ का मुरीद बना लेती हैं. और अपने बढ़े हुए वजन और आत्मविश्वास के साथ ‘वीरे दी वेडिंग’ में नज़र आती हैं. आगे भी, अपनी इस बात को साबित करने के लिए वे कॉमेडी-ड्रामा ‘गुड न्यूज’ और ‘अंग्रेजी मीडियम’ के सीक्वल में नज़र आने वाली हैं.

आज भी करीना कपूर तीस पार की उन पांच दुर्लभ अभिनेत्रियों में मुख्यता से शामिल रहती हैं जिन्होंने 50 के खानों वाली इंडस्ट्री का दस्तूर बदलने की शुरूआत की है. और 16-18 साल की उम्र में करियर शुरू करने की सलाह देकर जो फिल्म इंडस्ट्री 30 का पड़ाव आते-आते अपनी अभिनेत्रियों को भूलना शुरू कर देती है, उस अहंकारी इंडस्ट्री में 39 साल की उम्र में शादी, घर-बार और मातृत्व का सुख लेने के साथ-साथ फिल्मों से भी ज्यादा लंबा ब्रेक न लेकर हम जैसे प्रशंसकों को उदास नहीं होने देतीं हैं.

यह भी तो है कि नेचुरल व स्पांटेनियस अभिनय में सिद्धहस्त यह ऊर्जावान अभिनेत्री आज भी संभावनाओं के इतने सारे अनदेखे सिरे अपने पास रखती है कि ‘जब वी मेट’ जैसा एक और यादगार किरदार देने की हैसियत भविष्य में रखती है, हम जानते हैं.