काठमांडू में कुमारी देवी की भव्य शोभायात्रा के साथ नेपाल का परंपरागत त्योहार इंद्रजात्रा खत्म हो गया है. हर साल सितंबर में पड़ने वाले इस आठ दिनी त्यौहार के जरिये नेपाल के लोग वर्षा के देवता माने जाने वाले इंद्र के प्रति कृतज्ञता जताते हैं.

नेपाल में प्रचलित हिंदू धर्म के स्वरूप में जीवित देवियों की एक अनोखी परंपरा है. इन्हें कुमारी देवी कहा जाता है. लोग इन्हें महाकाली का स्वरूप मानते हैं. नेपाल की एक बड़ी आबादी का इन देवियों में अगाध विश्वास है. वे मानते हैं कि ये जीवित देवियां आपदा के समय उनकी रक्षा करती हैं. भारत के इस पड़ोसी देश में ऐसी करीब 11 कुमारी देवियां हैं. यह परंपरा करीब तीन सदी पुरानी बताई जाती है.

कुमारी देवी के सम्मान में नृत्य
कुमारी देवी के सम्मान में नृत्य

जिस तरह बौद्ध धर्म में लामा को चुना जाता है कुछ-कुछ उसी तरह कुमारी देवी का चयन होता है. वे शाक्य या वज्रचार्य जाति से संबंध रखती हैं. नेपाल के नेवारी समुदाय द्वारा उनकी पहचान की जाती है. उनकी जन्म कुंडली में मौजूद ग्रह-नक्षत्र देखे जाते हैं. तय संयोग मिलने के बाद अगली परीक्षा होती है. उनके सामने कटे भैंसे का सिर रखा जाता है, डरावने मुखौटे लगाकर नाच किया जाता है और अगर बच्ची इस सबसे नहीं डरती तो उसे देवी मान लिया जाता है.

इंद्रजात्रा के समय प्रसाद के रूप में बांटी जाने वाली शराब पीने के लिए भक्तों में होड़
इंद्रजात्रा के समय प्रसाद के रूप में बांटी जाने वाली शराब पीने के लिए भक्तों में होड़

कुमारी देवी बनने के बाद इन बच्चियों का जीवन बदल जाता है. वे अपने परिवार और समाज से जुदा हो जाती हैं. उनका एक निश्चित स्थल होता है. इसे कुमारी घर कहा जाता है. ये देवियां अपना ज्यादातर समय धार्मिक कार्यों में बिताती हैं. त्यौहार के समय ही वे घर से बाहर निकल सकती हैं. तब वे डोली पर सवार होती हैं. लोग उनके दर्शन को शुभ मानते हैं.

मासिक धर्म शुरू हो जाने के बाद देवी को यह पदवी छोड़नी पड़ती है. इसके बाद वे अपना जीवन अपने हिसाब से बिताने के लिए आजाद होती हैं. हालांकि मान्यता है कि जो भी कुमारी देवी रह चुकी लड़की से शादी करता है उसकी असमय मौत हो जाती है. इसलिए अधिकांश पूर्व कुमारी देवियां आजीवन अविवाहित रह जाती हैं.