एम्स, यानी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान. दिल्ली के जैसा ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी है. बीते शनिवार (17 सितंबर को) यहां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगतप्रकाश नड्‌डा आए थे. एमआरअाई, सीटी स्कैन मशीन और ब्लड बैंक के उद्घाटन के लिए. वे जब आए तो प्रदेश भाजपा कार्यालय में उन पर फूल बरसाए गए. मगर जब एम्स से लौटने लगे तो किसी ने उन पर स्याही फेंक दी. उनके कपड़ाें में दाग लग गए और एम्स भोपाल की छवि पर भी.

इस संस्थान की आधारशिला 12 साल आठ महीने पहले, 20 जनवरी 2004 को रखी गई थी. तब उम्मीद यही थी कि इसका मजबूत आधार यकीनन अायुर्विज्ञान यानी कि मेडिकल साइंस ही बनेगा. जबकि ऊपरी शिलाओं के तौर पर वह साफ-सुथरी छवि चमकेगी जो पढ़ने-पढ़ाने और इलाज करने-कराने वालाें को अपनी तरफ खींचेगी. और संस्थान के प्रति उनकी सोच को बेहतर करेगी. लेकिन यकीन मानिए महज चार साल (सितंबर 2012 से कामकाज शुरू हुआ था) में ही इस संस्थान का आधार और शिलाएं सब हिलती नजर आ रही हैं. इसकी वजह है वह राजनीति विज्ञान या सीधे शब्दों में कहें तो यहां चल रही राजनीति, जिसने संस्थान के आयुर्विज्ञान और उसके प्रति सोच, दोनों की दशा-दिशा बिगाड़ रखी है.

छात्र और प्रोफेसर यहां रहना नहीं चाहते, डॉक्टर खुद इलाज कराने से हिचकते हैं

मेडिकल शिक्षा जगत में एम्स भोपाल के प्रति अब सोच किस तरह की हो चली है, इसका दो-चार घटनाओं से अंदाजा लग सकता है. अभी जुलाई-अगस्त का वाकया है. यहां 2016 बैच के लिए पहले दौर की काउंसलिंग हुई थी. सीटें 100 हैं, इनमें से 96 तुरंत भर गईं. लेकिन बताते हैं कि कुछ ही दिन में इनमें से 40 बच्चों ने दूसरे कॉलेजों में प्रवेश ले लिया क्योंकि वे यहां की व्यवस्थाओं और सुविधाओं से संतुष्ट नहीं थे. दूसरे दौर की काउंसलिंग के बाद भी कुछ सीटें अब तक खाली हैं, जिन्हें तीसरे दौर में भरा जाएगा. कोई कह सकता है कि यह कॉलेजों में प्रवेश की आम प्रक्रिया है लेकिन नहीं, एम्स जैसे संस्थान में मैरिट लिस्ट के ऊपरी क्रम वाले बच्चों का आना सामान्य है. जाना कतई नहीं. दिल्ली के एम्स में प्रवेश ले चुका कोई भी बच्चा शायद ही उसे छोड़कर जाता हो. यहां तक कि भोपाल के साथ शुरू होने वाले जोधपुर (राजस्थान) और ऋषिकेश (उत्तराखंड) एम्स में भी बच्चों के रुके रहने की दर 70-80 फीसदी तक बताई जाती है.

एम्स में अभी तक छात्रावास भी पूरी तरह बनकर तैयार नहीं हो पाए हैं
एम्स में अभी तक छात्रावास भी पूरी तरह बनकर तैयार नहीं हो पाए हैं

इसी तरह भोपाल के एम्स में पढ़ाने वाले भी रुक नहीं पा रहे हैं. जानकारी के मुताबिक, 2014 तक यहां करीब 65-70 वरिष्ठ प्रोफेसर और उनके एसोसिएट, असिस्टेंट आदि थे. अब सिर्फ 45-50 बचे हैं. डॉक्टर डीके सिंह ट्रॉमा के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं. वे 2012 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से यहां आए थे. डॉक्टर सिंह इतने अनुभवी हैं कि इस एम्स के डायरेक्टर बनने के दावेदार भी कहे जाने लगे थे. लेकिन एक साल की मशक्कत के बाद भी वे यहां ट्रॉमा सेंटर शुरू नहीं करा पाए और आखिर थक-हारकर 2013 में वापस बीएचयू चले गए. इसी तरह, 2012 में लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल (केजीएमसीएच) से एक विशेषज्ञ आए, डॉक्टर रविकांत. यहां सर्जरी डिपार्टमेंट के विभाग अध्यक्ष (एचओडी) बनाए गए. इनकी ख्याति इतनी है कि पद्म श्री सम्मान तक मिल चुका है. लेकिन भोपाल एम्स से दो साल में ही इन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. वे 2014 में वापस केजीएमसीएच चले गए.

यही हाल इलाज कराने वालों का है. तीन-चार महीने पहले की ही बात है. एम्स के स्त्री रोग विभाग की एचओडी डॉक्टर रागिनी महरोत्रा के पति को दिल का दौरा पड़ा. उन्होंने पति के इलाज के लिए शहर के नामी निजी अस्पताल में जाना बेहतर समझा. खबर सुर्खी बनी तो दलील दी गई कि एम्स में कार्डियोलॉजी (ह्रदय रोग विज्ञान) विभाग ही नहीं है. मगर अस्थि रोग (ऑर्थोपेडिक) विभाग तो है. इसमें एक प्रोफेसर और दो-तीन सीनियर रेजीडेंट भी हैं. बावजूद इसके, बैडमिंटन खेलते वक्त माइक्रोबायोलॉजी विभाग के डॉक्टर शशांक पूर्वार के पैर की जब हड्‌डी टूटी, तो वे भी इलाज के लिए शहर के निजी अस्पताल में ही गए. यह वाकया 2015 के आखिरी महीने का है. सोचिए, एम्स के डॉक्टरों का ये हाल है तो मरीजों का क्या होगा. अव्वल तो गंभीर बीमारी या इमरजेंसी वाले मरीज यहां आते नहीं. भूले-भटके आ जाएं, तो ऐसे करीब 70-80 मरीज रोज राज्य स्तरीय गांधी मेडिकल कॉलेज या अन्य अस्पतालों में भेज दिए जाते हैं.

अब तक सिर्फ 11 विभाग शुरू हुए, वे भी ठीक से नहीं चलते

भोपाल के एम्स में 45 के करीब विभाग शुरू होने थे. चार साल में अब तक सिर्फ 11 ही शुरू हो पाए हैं. बाकियों का ताला ही नहीं खुल पाया. जो खुले हैं, वे भी ठीक तरह से चल नहीं पा रहे हैं. जैसे सर्जरी विभाग. यह चालू है लेकिन बड़े ऑपरेशन नहीं होते क्योंकि ऑपरेशन थिएटर सात के बजाय चार ही हैं और ब्लड बैंक है ही नहीं. अभी केंद्रीय मंत्री नड्‌डा ब्लड बैंक शुरू करने की औपचारिकता जरूर पूरी कर गए लेकिन अस्पताल के पास इसका लाइसेंस ही नहीं है. ऐसे में इसका शुरू होना, न होना एक ही जैसा है. स्त्री रोग विभाग 2013 में शुरू हुआ. लेकिन यहां अब तक एक भी डिलिवरी नहीं हुई. लेबर रूम बीते शनिवार तक था ही नहीं. मंत्री आए तो रातों-रात हॉलनुमा कमरे को लेबर रूम बना दिया गया. मनोचिकित्सा विभाग भी है, मगर नहीं के जैसा. क्योंकि उसमें सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक पदस्थ हैं. कोई सर्जन नहीं है. सिर्फ मेडिसिन और ईएनटी (कान, नाक, गला) विभाग ही ऐसे हैं, जहां बेहतर ढंग से काम हो रहा है.

यह अस्पताल 150 बिस्तरों का है. जबकि होना चाहिए था 900 का. पढ़ने वाले बच्चे 450 के करीब हैं और नर्सिंग स्टूडेंट्स को मिला लें तो यह आंकड़ा करीब 690 तक पहुंच जाता है. लेकिन इन्हें पढ़ाने के लिए लैक्चर थिएटर (एलटी) तीन ही हैं. ये भी कम से कम पांच होने चाहिए थे. इन दो एलटी की कमी यूं पूरी होती है कि जरूरत पड़ने या तो कक्षाओं का टाइम-टेबल अदल-बदल दिया जाता है या फिर किसी और हॉल को कक्षा बना दिया जाता है. लाइब्रेरी और रीडिंग रूम की व्यवस्था अस्थायी तौर पर एक हॉल में है, जहां 20-30 लोग ही बैठकर पढ़ सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि लाइब्रेरी भवन अभी बन ही नहीं पाया है. बच्चे मिल-बैठककर कोई कार्यक्रम करना चाहें तो उसके लिए सभागार जैसा कोई इंतजाम भी नहीं है. बन जरूर रहा है लेकिन ऐसे कि एक बार जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आए तो उस भवन की छत डाल दी गई. जब नड्‌डा आए तो भीतर की तरफ फर्श पर टाइल्स लगा दिए गए. नेताओं की पीठ फिरी तो काम फिर बंद.

मुख्य भवन के पीछे बन रही एम्स की एक और इमारत
मुख्य भवन के पीछे बन रही एम्स की एक और इमारत

इस संस्थान के ये हाल तब हैं, जब 2012 का पहला बैच अगले साल जनवरी-फरवरी तक इंटर्नशिप के लिए तैयार होने वाला है. इन बच्चों की इंटर्नशिप कहां-कैसे-कब होगी, कोई नहीं जानता. दबी जुबान में कुछ लोग बताते हैं कि संस्थान के प्रशासन ने दिल्ली एम्स का मॉडल लागू करने का मन बनाया है. यानी बच्चों की इंटर्नशिप इसी संस्थान में होगी. मगर शिक्षक और सुविधाओं के बिना यह होगा कैसे, इस पर बात करने को कोई तैयार नहीं. यही चिंताएं हैं, जो लगभग हर बैच के बच्चे को तख्तियां लेकर यहां आने वाले नेताओं के सामने प्रदर्शन करने पर मजबूर करती हैं. मीडिया के सामने यह कहने (जैसा कि अखबारों में छपा है) को विवश करती हैं कि ‘हमसे ज्यादा तो कंपाउंडर जानते हैं. हमें तो अभी इंजेक्शन लगाना तक नहीं आता. हमने इंटरनेट की मदद ले-लेकर किताबी ज्ञान तो हासिल कर लिया. लेकिन क्या सिर्फ इतने से ही कोई डॉक्टर बन सकता है. हम किसी छोटे मेडिकल कॉलेज में चले जाते तो ज्यादा सीखने मिल जाता.‘

ऐसी ही चलती रही तो राजनीति इस संस्थान का राजरोग बन जाएगी

इस एम्स को लेकर राजनीति भरपूर फलफूल रही है. कैसे और कहां-कहां, इसकी मिसालें देखिए. मीडिया ने नड्‌डा से जब एम्स की दुर्दशा पर सवाल किए और उसकी हालत ठीक करने के लिए समय-सीमा जाननी चाही तो उनका तुक ही बिगड़ गया. कहने लगे, ‘दिल्ली के एम्स को शुरू होने में 20 साल लगे थे. भोपाल को इतनी जल्दी क्यों है. यहां तो अभी 12 साल ही हुए हैं.’ एम्स भोपाल में अभी कोई स्थायी निदेशक नहीं है. उनकी नियुक्ति के बारे में नड्‌डा से पूछा गया तो उनका कहना था, ‘मेरे दस्तखत से अगर नियुक्ति होती तो मैं अभी कर देता. लेकिन ये मेरे हाथ में नहीं है.’ एम्स भोपाल के प्रभारी निदेशक डॉक्टर नितिन एम नागरकर (रायपुर एम्स के निदेशक) भी बेबस नजर आते हैं. अखबारों के मुताबिक, इन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को एक पत्र लिखा है. इसमें कहा है, ‘जब से यहां आया हूं, तब से देख रहा हूं कि कुछ प्रोफेसर निदेशक बनना चाहते हैं. ये लोग इसीलिए जानबूझकर गलत खबरें छपवाकर संस्थान की छवि खराब कर रहे हैं.’

डॉक्टर नागरकर से जब सत्याग्रह ने संपर्क करने की कोशिश की तो उनके कार्यालय से कहा गया कि ई-मेल पर प्रश्न भिजवा दें. जब प्रश्नावली भेजी गई, तो उन्होंने उसका जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा. संस्थान के उपनिदेशक सुभाष सोहगौरा से संपर्क करने की कोशिश की तो वे पहले बमुश्किल ही मिलने को राजी हुए. फिर मुलाकात से पहले निर्देश दिया कि मोबाइल फोन बाहर निजी सचिव के पास जमा कराकर आएं. और जब मिले तो बोले, ‘हम मीडिया के लिए नहीं, मरीजों के लिए उत्तरदायी हैं.’ इस पर जब उनसे पूछा गया कि मरीज भी तो अस्पताल की सुविधाओं/सेवाओं से खुश नहीं हैं तो कहने लगे, ‘निदेशक के अलावा हम में से किसी को भी अाधिकारिक बयान देने की मनाही है.’ किसने मनाही की है? तो जवाब मिला, ‘ऊपर (शायद उनका इशारा केन्द्रीय मंत्री की तरफ था) से आदेश आए हैं.’

सत्याग्रह ने फिर कुछ और पड़ताल की ताकि पता चले कि प्रभारी निदेशक आखिर किन लोगों से परेशान हैं. तब मालूम हुआ कि पैथोलॉजी विभाग की डॉक्टर नीलकमल कपूर, स्त्री रोग विभाग की डॉक्टर रागिनी महरोत्रा, रेडियोलॉजी विभाग के डॉक्टर राजेश मलिक और फिजियोलॉजी विभाग के डॉक्टर सुधांशु ने संस्थान के निदेशक पद के लिए आवेदन किया है. ये सभी अपने विभागों के प्रमुख हैं. इनमें से डॉक्टर मलिक ने संपर्क किए जाने पर इतना ही कहा, ‘मैं शहर से बाहर हूं. बाद में बात करूंगा.’ जबकि डॉक्टर कपूर का कहना था, ‘संस्थान के शिक्षक या छात्र किसी राजनीति में शामिल नहीं हैं. प्रभारी निदेशक ने ऐसा पत्र क्यों लिखा, मैं नहीं बता सकती.’ बाकी दो डॉक्टरों से संपर्क नहीं हो सका.

कुछ और खंगाला तो पता चला कि इससे पहले के निदेशक डॉक्टर संदीप कुमार (ये 2012 ये 2015 तक रहे), उनके डिप्टी ऋतुराज सिंह और वित्तीय सलाहकार राजेश निगम के बीच आपस खुलकर विवाद हुआ करते थे. ऋतुराज सिंह और उनके वक्त के प्रशासनिक अधिकारी के बीच तो मारपीट की नौबत तक आ चुकी थी. इन लोगों से संबंधित विवाद के मामले अदालत तक पहुंच चुके हैं. अब अगर संस्थान में इस तरह की राजनीति चलती रहेगी तो जाहिर है कि उसकी बेहतरी के लिए प्रशासनिक स्तर पर शायद ही कोई एकजुट प्रयास हों और इसलिए भी एम्स अभी अपने लक्ष्य से कोसो दूर लगता है. संस्थान के निर्माण का पूरा कामकाज 2012 तक पूरा होना था. लागत आनी थी करीब 254 करोड़. लेकिन अब कहा जा रहा है कि लागत बढ़कर 310 करोड़ तक पहुंच गई है. और निर्माण कार्य 2017 में भी पूरा हो जाए तो बड़ी बात है.

नड्डा पर स्याही फेंका जाना भी राजनीति थी, मगर किसकी पता नहीं!

बीते मंगलवार को अखबारों ने पुलिस के हवाले से बताया कि नड्‌डा पर स्याही फेंकने वाले को इसके लिए मात्र 120 रुपए दिए गए थे. वह भी किसी अनजान सी जय लोक पार्टी के अध्यक्ष ब्रजेश गुप्ता ने, महज सुर्खियां बटोरने के लिए. लेकिन जरा सोचिए, जिस एम्स की राजनीति का विज्ञान इतना गूढ़ और गहरा हो, उसके परिसर में हुई ऐसी घटना के संदर्भ में जांच का यह निष्कर्ष हजम होता है क्या?