ऐसे समय में जब तीन तलाक खत्म करने से जुड़े कानून पर संसद में बवाल चल रहा है, केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता को लागू करने के तरीके तलाश रही है, जब देशभर में गोरक्षा के नाम पर सैकड़ों संगठन उग आए हैं और गोहत्या लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है, जब कश्मीर की समस्या लगातार विकराल होती दिख रही है, बुर्के पर देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में बहस चल रही है, सांप्रदायिक हिंसा घटना और कट्टरपंथ की भावना में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, हामिद दलवई के विचारों की अहमियत कई गुना बढ़ जाती है.

हामिद दलवई के विचारों, बल्कि उनके नाम से भी, कम ही लोग परिचित हैं. लेकिन उनके विचारों के महत्व को इससे समझा जा सकता है कि प्रसिद्ध इतिहासकार और विचारक रामचंद्र गुहा ने उन्हें अपनी चर्चित किताब ‘मेकर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ (आधुनिक भारत के निर्माता) में शामिल किया है. इस किताब में 18वीं सदी से लेकर अब तक, भारत में पैदा हुए सिर्फ 19 ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जिनके विचारों ने आधुनिक भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई है. हामिद दलवई के बारे में रामचंद्र गुहा लिखते हैं, ‘उनके विचारों की प्रासंगिकता सिर्फ भारत या भारतीयों तक ही सीमित नहीं है. मेरा मानना है कि 9/11 की घटना के बाद की दुनिया में उनके लेख हर उस देश या महाद्वीप में पढ़े जाने चाहिए जहां विभिन्न धर्मों के लोग शांति से एक साथ रहना चाहते हैं.’

‘9/11 की घटना के बाद की दुनिया में उनके लेख हर उस देश या महाद्वीप में पढ़े जाने चाहिए जहां विभिन्न धर्मों के लोग शांति से एक साथ रहना चाहते हैं’

हामिद दलवई का जन्म 1932 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था. उनकी औपचारिक शिक्षा के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. रामचंद्र गुहा इस बारे में लिखते हैं कि वे शायद कभी कॉलेज नहीं गए थे. हामिद दलवई ने अपने सभी लेख और किताबें मराठी में ही लिखीं. उनके मित्र और मराठी लेखक दिलीप चित्रे ने बाद में उनके काम का अंग्रेजी में अनुवाद किया. हामिद दलवई को असल पहचान इन अनुवादों से ही मिली. लेकिन एक तरफ जहां उनके लेख प्रगतिशील लोगों के बीच लोकप्रिय हुए तो दूसरी तरफ उन्हें धार्मिक लोगों द्वारा नकार दिया गया. 1970 में हामिद दलवई के एक निबंध का अनुवाद करते हुए दिलीप चित्रे ने उनके बारे में लिखा था, ‘हिंदुओं के लिए ‘यवन’ होने के साथ ही वह (हामिद दलवई) अब मुसलमानों के ‘काफिर’ होने का भी गौरव हासिल कर चुका है.’

हामिद दलवई के विचार आज इसलिए जरूरी हैं क्योंकि जिन मुद्दों की चर्चा इस लेख के शुरुआत में की गई है, उन सभी मुद्दों पर उन्होंने बेहद स्पष्ट और बेबाकी से लिखा है. इन मुद्दों पर उनके विचारों को 1968 में प्रकशित उनकी किताब ‘भारत में मुस्लिम राजनीति’ के माध्यम से समझा जा सकता है. भारतीय मुसलमानों की वर्तमान समस्या और उसके कारणों के बारे में वे इस किताब में लिखते हैं, ‘अपनी समस्याओं के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराना भारतीय मुसलमानों की पुरानी आदत है. उन्होंने कभी अपनी समस्याओं को अपने खुद के रवैये से जोड़कर नहीं देखा. मुसलमानों के पिछड़े होने का मुख्य कारण यह है कि भारत में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान जब शिक्षा सुधार हुए तो उन्होंने इसका विरोध किया.’

हामिद दलवई का मानना था कि मुसलमान हमेशा अपनी धार्मिक जकड़न के कारण पिछड़े रहे हैं. सर सैयद अहमद खान ने उन्हें इस जकड़न से मुक्त करने के प्रयास शुरू किये थे लेकिन अंततः वे भी सफल नहीं रहे. दलवई लिखते हैं, ‘सर सैयद अहमद खान भले ही धार्मिक कट्टरता से मुक्त थे लेकिन मुगलों के वंशज होने का बेकार का घमंड उन पर भी हावी था. यही कारण था कि जिस दौर में उन्हें सामूहिक राष्ट्रीय चेतना के निर्माण का काम करना चाहिए था, वे खुद ही इस अहंकारी भावना में बह गए कि मुसलमान तो भारत के विजेता रहे हैं.’ दलवई ने माना है कि सर सैयद अहमद खान के इसी रवैये से अलगाववादी मुस्लिम राष्ट्रवाद की नींव पड़ी जिसे आगे चलकर मोहम्मद अली जिन्ना ने और भी ज्यादा विस्तार दे दिया.

‘अपनी समस्याओं के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराना भारतीय मुसलमानों की पुरानी आदत है. उन्होंने कभी अपनी समस्याओं को अपने खुद के रवैये से जोड़कर नहीं देखा’

सांप्रदायिक कट्टरपंथ पर हामिद दलवई लिखते हैं, ‘हिंदू कट्टरपंथियों से मेरे लाख मतभेद हैं लेकिन उनकी कुछ बातों से मैं सहमत भी हूं. वे सही कहते हैं कि इस देश में अल्पसंख्यकों को बराबरी का अधिकार और बराबर मौके मिलने चाहिए लेकिन उन्हें कोई विशेष दर्जा या विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए. मैं उनकी इस बात से भी सहमत हूं कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारतीय जमीन पर पाकिस्तान के हर आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया जाना जरूरी है.’

भले ही हामिद दलवई हिंदू कट्टरवादियों की कुछ बातों से सहमति रखते थे, लेकिन इनसे भी उनका विरोध उतना ही था जितना कि मुस्लिम कट्टरपंथियों से. वे मानते थे कि मुस्लिम कट्टरपंथ का जवाब यदि हिंदू कट्टरपंथ से दिया जाता है तो यह एक आत्मघाती कदम होगा. गोहत्या पर प्रतिबंध का उदाहरण देते हुए वे लिखते हैं, ‘मैं कृषि-आर्थिक आधार पर भी इस तरह के प्रतिबंध का विरोध करता हूं. लेकिन गैर-आर्थिक आधारों पर तो मेरा विरोध और भी ज्यादा मजबूत है क्योंकि अगर गाय की पवित्रता वाली हिंदुओं की मान्यता को बढ़ावा दिया जाता है तो यह हिंदुओं के आधुनिकीकरण और सामाजिक प्रगति में एक बड़ी बाधा होगी. पहले भी हिंदू अपनी धार्मिक रूढ़ियों के चलते ही पिछड़े हैं. महमूद गज़नवी ने सिर्फ गायों के झुंड को ढाल बनाकर ही हिंदू सेनाओं को हरा दिया था.’

दलवई का मानना था जिस इतिहास ने हिंदू-मुस्लिमों को दुश्मनी और दुराग्रह दिया है, उस इतिहास से बाहर आना ही आज के समाज की सबसे बड़ी जरूरत है. अपनी किताब में वे लिखते हैं, ‘आज के ब्राह्मण युवाओं का इसमें कोई दोष नहीं है कि उनके पूर्वजों ने दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया था. इसी तरह महमूद गज़नवी और औरंगजेब ने जो अत्याचार हिंदुओं पर किये थे उसके लिए आज का मुसलमान जिम्मेदार नहीं है. सौभाग्य से आज हिंदुओं में एक ऐसा वर्ग मौजूद है जो अपने पूर्वजों के अपराधों और अत्याचारों का बोझ अपने कंधों पर लेकर सामाजिक समानता की पैरवी कर रहा है. मुस्लिम समाज को भी ऐसे ही एक वर्ग की जरूरत है जो औरंगजेब के अपराधों को स्वीकार करे और एक धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना में सहायक बने. ऐसे धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक और सही मायनों में उदार वर्ग का उभरना ही हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक समस्याओं का एकमात्र कारगर समाधान है.’

1970 में हामिद दलवई ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए ‘मुस्लिम सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी. इस संस्था ने तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने के लिए सामाजिक और कानूनन, दोनों अभियान चलाए

सांप्रदायिक समस्याओं को सुलझाने के लिए हामिद दलवई कुछ सुझाव और भी देते हैं. अपने एक लेख में वे लिखते हैं, ‘हमें भारत में मुस्लिम आधुनिकीकरण का समर्थन करना चाहिए. हमें मांग करनी चाहिए कि सभी भारतीय नागरिकों के लिए एक जैसे ही नागरिक कानून हों. भारत में होने वाली सभी शादियों का पंजीकरण एक सामान नागरिक संहिता के अंतर्गत होना चाहिए. धर्म परिवर्तन पर तब तक पूरी तरह प्रतिबंध होना चाहिए जब तक कि वह किसी वयस्क द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने न हो रहा हो. अंतर धार्मिक विवाह से होने वाली संतान को यह छूट होनी चाहिए कि वो वयस्क होने पर कोई भी धर्म अपना सके. यदि सड़क के बीच कोई दरगाह या मंदिर है तो उसे हटाया जाना चाहिए. सभी धार्मिक स्थानों से होने वाली कमाई का नियंत्रण सरकार के हाथ में होना चाहिए और इस कमाई को शिक्षा और नागरिक कल्याण के कार्यों में लगाया जाना चाहिए. धर्म या जाति की पहचान दर्ज करना अनिवार्य नहीं होना चाहिए.’

1970 में हामिद दलवई ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए ‘मुस्लिम सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी. इसका नाम उन्होंने ज्योतिराव फुले के सत्यशोधक समाज की तर्ज पर ही रखा था. इस संस्था ने तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने के लिए सामाजिक और कानूनन, दोनों अभियान चलाए. हामिद दलवई ने सामान नागरिक संहिता की भी वकालत की और ऐसे भी कई प्रयास किये कि सामाजिक जीवन से किसी भी तरह की सांप्रदायिक पहचान को नगण्य बना दिया जाए.

44 साल की उम्र तक लगातार धार्मिक कट्टरता के खिलाफ लड़ने के बाद 1977 में हामिद दलवई की किडनी फेल हो जाने के चलते मौत हो गई थी. रामचंद्र गुहा के अनुसार, धार्मिक समानता के चलते कुछ लोग हामिद दलवई को नए दौर का सर सैयद अहमद खान कह सकते हैं. लेकिन, दलवई ने सिर्फ मुलसमानों को आधुनिक शिक्षा के मामले में हिंदुओं के बराबर लाने की नहीं, बल्कि उन्हें धार्मिक जकड़न से पूरी तरह रिहा करने की लड़ाई लड़ी है.