निर्देशक : लीना यादव

लेखक : लीना यादव

कलाकार : राधिका आप्टे, तनिष्ठा चटर्जी, सुरवीन चावला, सुमित व्यास, लहर खान

रेटिंग : 4 / 5

कोई औरतों की बातें करने पर आये तो सौ बातें कहेगा - औरते ये होती हैं, वो होती हैं, बड़ी-बड़ी उपमाओं, अलंकारों से उन्हें भर देगा. रेगिस्तान की पृष्ठभूमि पर बनी ‘पार्च्ड’ बताती है औरतें कई बार जिंदगी की आंच में इतनी सिंक जाती हैं कि सूख कर रेत जैसी हो जाती हैं. फिर भी वे न पानी को सोखती हैं, न उसे मैला करती हैं. बस उसे अपने पास रोक कर रख लेना चाहती हैं, जिससे आस-पास की जिंदगियों में नमी बनी रहे. लेकिन जब वे ऐसा कर पाने में भी लगातार नाकामयाब होती हैं तो रेत की तरह हवा के साथ उड़ जाना भी जानती हैं, अपना नाजुक जी कड़ा करके.

फिल्म के पहले दृश्य में रेगिस्तान का एक बस स्टॉप है जहां दो औरतें बस का इंतजार कर रही हैं. बस आती है सफ़र शुरू होता है. उनमें से एक खिड़की से बाहर मुंह निकाल कर सांसों में आसमान भर लेना चाहती हैं. ऐसा लगता है जैसे दोनों पहली बार किसी सफ़र पर निकली हों. पहली, दूसरी को कहती भी है, ‘ले यही तो हैं जिंदगी के मजे.’ फिल्म पहले ही दृश्य में घूंघट डालने वाली औरत के जरिए जिंदगी पर यकीन और उम्मीद की बात कह जाती है. यहां से शुरू हुआ यह सिलसिला आपको फ्रेम दर फ्रेम लगातार रोमांचित करता रहता है.

यहां पर जीवन दर्शन पर चर्चा करतीं भरे पेट और खूबसूरत नाखूनों वाली औरतें नहीं हैं. ये वो औरते हैं जिन्हें हर दिन रोटी के उपाय ढूढने पड़ते हैं, उद्यम करना पड़ता है. इतने के बावजूद कुछ शाम को जाकर पतियों के हाथों पिटती हैं. कुछ उनकी उपेक्षा का शिकार होती हैं. कुछ पति की जरूरतों के वक्त शराब की बदबू को बर्दाश्त करती उनके साथ होती हैं. और उस वक्त भी बदबू से ज्यादा उनके मन की सडांध सबकुछ कसैला कर रही होती है. आते-जाते फिल्म में कई पात्र ऐसे हैं जो बिना कहे ही हर जरूरी चीज कहते नजर आते हैं.

लज्जो इस बात को अस्वीकार करती है कि सिर्फ पति में कमी के चलते वह मां नहीं बन सकती और इसके लिए वह किसी और पुरुष का सहारा लेने से नहीं हिचकती. यहां पर मां होने का मतलब मजबूत और निडर होने से भी है

औरत के लिए जरुरी न समझी जाने वाली सारी बातें चार नायिकाओं के जरिये पार्च्ड में दिखाई गई हैं. चाहे जाने की चाह, शरीर की अनसमझी भूख, असहमत होने का और फिर शिकायत करने का हक़, अपनी इच्छाओं को किसी भी कीमत पर पूरा करने की जिद और ये जिद पालने की हिम्मत - ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो आज भी औरत की जिंदगी का हिस्सा होते हुए भी किसी को नजर नहीं आतीं. यह सब इस फिल्म में नजर आता है. यह फिल्म नहीं मादा जिस्म के रंग और गंध से सजा एक सपना है जो आजादी-आजादी चीखता हुआ तमाम पलकों के नीचे पलता रहता है.

मीडिया में भले ही राधिका आप्टे के लीक्ड वीडियो की चर्चा रही हो, लेकिन फिल्म में उन्हें देखने की और तमाम और जरूरी वजहें हैं. लज्जो के किरदार में राधिका आप्टे अपने आप को बांझ समझने के बोझ से दबी देहातन बनी हैं. लज्जो अपने इस दुःख पर तंज करते हुए सबके सामने ठठाकर हंस सकती है. यह पात्र दिखाता है कि मां बनना कई बार महिला की सामाजिक प्रतिष्ठा से ज्यादा उसकी इच्छा का विषय हो सकता है. लज्जो इस बात को अस्वीकार करती है कि सिर्फ पति में कमी के चलते वह मां नहीं बन सकती और इसके लिए वह किसी और पुरुष का सहारा लेने से नहीं हिचकती. यहां पर मां होने का मतलब मजबूत और निडर होने से भी है.

दूसरा किरदार रानी, तनिष्ठा चटर्जी हैं. रानी जिसने हाल ही में मोबाइल फोन इस्तेमाल करना शुरू किया है. उस पर आने वाले एक रॉंग नम्बर से पहले तो वह परेशान होती है बाद में उसका आनंद लेना सीख जाती है. फोन पर उस पार बैठा शख्स जब खुद को शाहरुख खान बताता है तब रानी अपना परिचय देते हुए कहती है वह 32 साल की विधवा है और बीते दशक में उसे किसी ने छुआ तक नहीं है. यह एक दृश्य औरतों की तरफ से बहुत कुछ कह जाता है. न छुए जाने का एहसास, अनचाहे रह जाने की तकलीफ औरत की जिंदगी का सबसे बड़ा दुःख हो सकती है. उससे भी बुरी बात यह कि वह इस बात को किसी के सामने स्वीकार नहीं कर सकती. जीवनसाथी की मौत के बाद ताउम्र उसकी परछाई ओढ़ कर चलने का रिवाज मानो औरत को शापित बना देता है.

यह एक पात्र दिखाता है कि बात कहने का साहस कैसे धीरे-धीरे समझौता करने की आदत में बदल जाता है. कैसे समझौतों की छोटी सी शुरुआत जानकी जैसी जिंदगी को रानी में शेष कर सकती है

तीसरी तरफ बिजली की भूमिका में सुरवीन चावला हैं जो सिर्फ प्यार तलाश रही है. नाचने वाली और जिस्मफरोशी करने वाली औरतें परिवार बसा नहीं सकती और बच्चा पैदा करने की सोच भी नहीं सकती. जब तन के सहारे घर चलता है तो मन को कितने आसरे लेने पड़ते हैं, इन सबका आइना बन जाती है बिजली. इसके बावजूद लज्जो और रानी के लिए बिजली कहीं न कहीं आदर्श है. बिजली आत्मविश्वासी और मजबूत दिखाई देने की कोशिश लगातार करती है. बेशक वह अपनी जिंदगी में आने वाली हर रात से डरती है पर कल की उम्मीद उसके भी मन में हैं. इस उम्मीद का पीछा करने के लिए वह रोज भागने को तैयार नजर आती है.

लहर खान जानकी की छोटी सी भूमिका में हैं. जानकी का पात्र रेगिस्तान के कीकर सा है जो हरा हो सकता था लेकिन परिस्थितियों के चलते सूखा रह जाता है. किताबों का हाथ थामकर चलने वाली लड़की जो ब्याह से बचने के लिए अपने खूबसूरत बाल काट डालने का साहस भी कर लेती है. यह एक पात्र दिखाता है कि बात कहने का साहस कैसे धीरे-धीरे समझौता करने की आदत में बदल जाता है. कैसे समझौतों की छोटी सी शुरुआत जानकी जैसी जिंदगी को रानी में शेष कर सकती है.

चारों की कहानियों के सिरे एक दूसरे से जुड़े हैं. कसी स्क्रिप्ट पर बनी यह फिल्म कहीं भी तुक से तुक मिलाती हुई नजर नहीं आती है. सारी बातें बेतुकी हैं, असहज करने वाली हैं. सारे झूठों का सच दिखाने वाली हैं. बार-बार देखे जाने लायक यह फिल्म उलटबांसियों का पुलिंदा है जो कहती है औरत हमेशा औरतों की दुश्मन होती ही इसलिए हैं कि वे सखियां न हो पाई थीं. जो सखियां हो गईं उनके बीच में बातचीत होती है, गाली-गलौज होता है, इश्क और सेक्स के चर्चे होते हैं, कुछ काटे-बांटे से जख्म भी होते हैं जो लगते एक जिस्म पर हैं पर होते सबके साझा हैं. लीना यादव ने फिल्म नहीं साहस दिखाया है. उनके इस साहस को सलाम!