‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.’ उत्तर प्रदेश में थोड़े ही समय के दौरान प्यादे से बादशाह के खासमखास बन गए गायत्री प्रसाद प्रजापति पर इकबाल की यह मशहूर पंक्ति अब तक तो पूरी तरह खरी उतरती लग रही है. समाजवादी कुनबे में ताजा झगड़ा गायत्री प्रजापति की अखिलेश सरकार से बर्खास्तगी से शुरू हुआ था. इसके बाद जिस तरह से मुलायम सिंह यादव ने सुलह की पहल करते हुए गायत्री की वापसी की घोषणा की उससे यह साफ हो गया था कि कुछ तो मजबूरी है जो उनके लिए गायत्री प्रसाद जरूरी हैं.

गायत्री प्रजापति का नाम समाजवादी पार्टी के लिए बार बार मुकिलें खड़ी करता रहा है. उनके खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति से लेकर खनन के गोरखधन्धे तक भ्रष्टाचार के तमाम के आरोप लगते रहे हैं. तो फिर ऐसी क्या मजबूरी हो सकती है कि उन्हीं गायत्री प्रसाद के लिए मुलायम सिंह यादव अपने पुत्र अखिलेश यादव की कथित साफ सुथरी छवि पर बड़ा बट्टा लगाने से भी नहीं चूके?

गायत्री प्रजापति के कई ‘कमाई’ वाले धंधों में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी से हुए पुत्र प्रतीक की हिस्सेदारी इस ‘तरफदारी’ की बड़ी वजह है

मुलायम सिंह यादव की राजनीति को बहुत करीब से समझने वाले मानते हैं कि गायत्री प्रजापति को इतनी तरजीह देने की वजह कोई राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि कुछ और ही है. उनके मुताबिक इसका संबंध गायत्री प्रजापति के जरिये हो रही खनन की काली कमाई की हिस्सेदारी से जुड़ता है. विपक्षी दलों का आरोप है कि गायत्री प्रजापति के कई ‘कमाई’ वाले धंधों में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी से हुए पुत्र प्रतीक की हिस्सेदारी इस ‘तरफदारी’ की बड़ी वजह है. प्रतीक को गायत्री के साथ प्रॉपर्टी डीलिंग के धन्धे में साझीदार बताया जा रहा है. ताजा घटनाक्रम में जिस तरह मुलायम के समाजवाद का व्यक्तिवादी चेहरा बेनकाब हुआ है उसी तरह यह बात भी अब बेपर्दा हो चुकी है अपनी पहली संतान अखिलेश और दूसरी संतान प्रतीक के बीच शक्ति संतुलन में मुलायम प्रतीक के पाले में खड़े हैं अखिलेश के नहीं.

यही वह बात है जो गायत्री को जरूरी बनाती है. गायत्री ने सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते हुए मुलायम के नर्म मर्म का रहस्य पकड़ते हुए वहीं निशाना साधा है. खनन घोटाले की सीबीआई जांच पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े रूख के बाद लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि खनन घोटाले की आंच सिर्फ गायत्री प्रजापति ही नहीं बल्कि पंचम तल की एक शक्तिशाली अफसर समेत मुलायम के घर तक भी पहुंच सकती है क्योंकि गायत्री मिट्टी से सोना बनाने की अपनी कीमियागिरी के कमाल से इन जगहों को भी चमत्कृत कर चुके थे. गायत्री प्रजापति के बारे में यह भी कहा जाता है कि जब वे नेताजी के घर जाते हैं तो उस दिन वहां के स्टाफ की भी जेबें गर्म हो जाती हैं. अखिलेश की कीमत पर गायत्री की बहाली के पीछे यही गर्मी काम कर गई और अखिलेश मंत्रिमण्डल से बर्खास्त होने के बाद मुलायम की अंतिम घोषणा के मुताबिक वे फिर से सरकार के अन्दर हैं. पहले खबर आ रही थी कि उनका शपथ ग्रहण पितृपक्ष के बाद होगा लेकिन, अब कहा जा रहा है कि यह 26 सितंबर को होना तय हो गया है. चंद रोज पहले हटाए गए खनन सचिव गुरदीप सिंह की भी इस पद पर वापसी हो गई है.

अगर गायत्री प्रसाद प्रजापति का शपथ ग्रहण हो जाता है तो वे उत्तर प्रदेश सरकार में पहले ऐसे मंत्री होंगे जिन्हें चार बार शपथ दिलाई गई है

अगर गायत्री प्रसाद प्रजापति का शपथ ग्रहण हो जाता है तो वे उत्तर प्रदेश सरकार में पहले ऐसे मंत्री होंगे जिन्हें चार बार शपथ दिलाई गई है. 2012 में लगे आय से अधिक सम्पत्ति के आरोपों के बावजूद 2015 में उन्हे राज्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. उन्हें खनन विभाग मिला. इसके बाद 2013 में ही उन्हें खनन विभाग के राज्यमंत्री के रूप में स्वतंत्र प्रभार देकर शपथ दिलाई गई और जनवरी 2014 में कैबिनेट मंत्री के रूप में. लोकसभा चुनावों में वे अति पिछड़ी जातियों के नेता के रूप में समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक थे और तमाम बड़े समाजवादियों को दरकिनार कर उन्हें हेलीकाप्टर से प्रचार करने का विशेषाधिकार दिया गया था.

कुछ वर्ष पहले तक बीपीएल कार्ड धारक रहे गायत्री ने 1993 में बहुजन क्रान्ति दल से अमेठी से चुनाव लड़ कर 1500 वोट पाए थे. 1996 के बाद 2002 में चुनाव लड़ते वक्त उन्होने जो हलफनामा भरा था उसमें उनकी कुल सम्पत्ति 91436 रुपये बताई गई थी. 2012 के हलफनामे में उन्होंने यह सम्पत्ति 1.81 करोड़ बताई और आज यह 1000 करोड़ से अधिक बतायी जाती है. कहा जाता है कि 2012 में समाजवादी पार्टी से टिकट पाने के लिए उन्होने पार्टी को 25 लाख रुपये दिए थे. अमेठी में कांग्रेस नेता संजय सिंह की दूसरी पत्नी अमिता सिंह को पराजित कर उन्होंने अपना जो सिक्का जमाया वह अब उनका रिजर्व बैंक बन चुका है इसीलिए सरकार और समाजवादी पार्टी का हर चेहरा उनकी ओर टकटकी लगाए दिखता है.

बहुत कम वक्त में बीपीएल से बीएमडब्ल्यू तक के सफर में गायत्री के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने खनन के खेल को बहुत नियोजित तरीके से संस्थागत रूप दे दिया. वैसे तो खनन के जरिए काली कमाई का धन्धा मायावती सरकार में ही शुरू हो चुका था. तब सोनभद्र, महोबा आदि जिलों में पत्थर खनन का काला धन्धा खूब फल रहा था और नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबूसिंह कुशवाहा तथा शराब व्यवसायी पौंटी चढ्ढा इस खेल के खिलाड़ी थे.

27 फरवरी 2012 को अवैध खनन के कारण हुई एक दुर्घटना के बाद वहां के जिलाधिकारी बीबी पन्त ने 22 खानों पर खनन प्रतिबन्धित कर दिया. खनन माफिया के दबाव के बावजूद डीएम नहीं माने तो अखिलेश सरकार के गठन के बाद पहला फैसला उन्हीं के तबादले का हुआ. इसके बाद से लगातार वहां ऐसे ही अधिकारी नियुक्त होते रहे जो खनन सिंडीकेट की इच्छा पर काम करते थे. इस अवैध खनन से बहुतों की तिजोरियां भरीं लेकिन पर्यावरण और स्थानीय लोग तबाह हुए.

बहुत कम वक्त में बीपीएल से बीएमडब्ल्यू तक के सफर में गायत्री ने खनन के खेल को बहुत नियोजित तरीके से संस्थागत रूप दे दिया.

सिंडिकेट के खात्मे के नाम पर सरकार ने 31 मई 2012 को खनन के लिए ई टेंडरिंग की घोषणा की. मगर यह कभी लागू नहीं हुई और खनन माफिया बदस्तूर काम करता रहा. गायत्री के कमान संभालने के बाद यह और सलीके से होने लगा. अकेले सोनभद्र में ही हजारों हैक्टेयर वन भूमि तबाह कर दी गई. साढ़े चार साल से कुछ जिलों में चल रहे इस पत्थर खनन के साथ साथ खनन का काला कारोबार समूचे उत्तर प्रदेश में नदियों को छलनी बना रहा है. अकेले सोनभद्र जिले में पत्थर खनन के कारोबार से ही सालाना कमाई का आंकड़ा पांच हजार करोड़ रु तक बताया जाता है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिबन्धों का मजाक उड़ाते हुए यहां सैकड़ों क्रशर धुआं उगल रहे हैं और चट्टानों को खाइयों में बदल रहे हैं.

नदियों से हो रहा खनन गायत्री के काले कारोबार को मजबूत बनाने का एक और जरिया है. सिर्फ बुन्देलखण्ड के 6-7 जिलों में ही हर महीने 12 हजार से ज्यादा ट्रक और चार हजार से ज्यादा छोटे वाहन मोरंग और बालू खनन में जुटे हैं. यह कारोबार पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक पूरे सूबे में चल रहा है. गायत्री के नियोजन से हर क्षेत्र में हर ट्रक पर एक निजी रायल्टी वसूली जाती रही है. कहा जाता है कि इसी रॉयल्टी की बन्दरबांट के जरिए गायत्री सबके मुंह बन्द कर रहे थे और इसी पैसे से उनकी सत्ता वापसी की राह बनी है.

पांच बार से अधिक लोकायुक्त के पास पहुंची शिकायतों और हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बावजूद गायत्री सबके चहते और लाडले बने रहे. अब जब वे फिर से सरकार में पुर्नस्थापित हो रहे हैं तो यह जनता को सोचना होगा कि प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार का असली चेहरा अखिलेश यादव हैं या फिर गायत्री प्रजापति. वैसे यह सवाल गायत्री से लेकर अमर सिंह तक हर एक मामले में समान रूप से पूछा जा सकता है.