राष्ट्रसंघ में सुषमा स्वराज अच्छा बोलीं. वे अच्छा बोलती हैं. नरेंद्र मोदी भी अच्छा बोलते हैं. पर अहम यह जानना होता है कि बोले, पर कहा क्या? सुषमाजी ने अपनी सरकार के कार्यक्रमों का ब्योरा वहां दिया. लोगों में ख़ुशी इस बात की है कि उन्होंने पाकिस्तान को “करारा जवाब” दिया. एक अख़बार के मुताबिक़ बीस मिनट के भाषण में दस मिनट भारत की प्रतिनिधि ने पाकिस्तान और आतंकवाद को दिए. इस दौरान 42 बार उन्होंने पाकिस्तान और आतंकवाद का ज़िक्र किया और 16 दफ़ा इस्लामाबाद का नाम लिया.

विदेश मंत्री को बोलने के नंबर हमने दे दिए, लेकिन आगे क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि क्या हम पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की क़वायद में कहीं उसका क़द बढ़ा तो नहीं रहे? अपने मुंह से बलूचिस्तान का ज़िक्र (पहली दफ़ा) लाल क़िले पर कर अब हमने उसे सीधे (पहली दफ़ा) राष्ट्रसंघ पहुंचा दिया. इससे क्या हम यह संदेश नहीं दे रहे कि कश्मीर और बलूचिस्तान एक ही तराज़ू के पलड़े हैं - जो कि वे नहीं हैं.

बलूचिस्तान पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है, जैसे कश्मीर हमारा. कश्मीर के हादसों पर पाकिस्तान के बयानों को हम उचित ही अपने अंदरूनी मामले में दख़ल क़रार देते आए हैं. बलूचिस्तान के मामले में हमारा यह अतिउत्साह किस रूप में देखा जाएगा? यह कहना कि पाकिस्तान बलूचिस्तान में दमन कर रहा है, कहीं ऐसा पसमंज़र तो पेश नहीं करेगा कि हम ख़ुद पर लगने वाले दमन के आरोपों को बलूचिस्तान की ओट दे रहे हैं?

मज़े की बात यह रही कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए उन वीडियो अंशों को उछालने में मोदी-समर्थकों ने भी हिस्सा लिया. “देशभक्त” टीवी चैनलों ने आग में घी डालने का काम किया. एक टीवी चैनल की सुर्ख़ इबारत थी - “अबकी बार, सीमा पार”!

जब लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने बलूचिस्तान का ज़िक्र छेड़ा, तब भी मुझे - जैसे अन्य बहुतों को - हैरानी हुई थी. तब लगा था कि “अच्छे दिनों” के अपने ही जुमले में उलझी सरकार के लिए दूसरी बर्षगांठ पर बलूचिस्तान का शिगूफ़ा और प्रकारांतर पाकिस्तान से तनाव का नया आयाम महज़ एक आड़ है. राष्ट्रसंघ में बलूचिस्तान किस चीज़ की आड़ है? पीछे देश में अपने ही समर्थकों के युद्धोन्माद से ध्यान बंटाने के लिए?

नौ रोज़ पहले उड़ी में सो रहे भारतीय जवानों पर आतंकवादियों के कायरना हमले को पहले ख़ुद हमारी सरकार - और उसके सद्भावी लोगों - ने अनुपात से कहीं ऊपर रखकर पेश किया. सत्ताधारी पार्टी के महासचिव और कश्मीर मामलों में उसके अगुआ राम माधव ने कहा कि एक दांत तोड़ने के जवाब में (पाकिस्तान का) पूरा जबड़ा निकाल (तोड़) देने की नीति अपनाने का वक़्त आ गया है. इसके बाद नेताओं-मंत्रियों, भाजपा कार्यकर्ताओं, सोशल मीडिया के भक्त ‘योद्धाओं’ में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बयान देने की होड़ सी मच गई.

इसी के समांतर यह हुआ कि सोशल मीडिया पर मोदी विरोधी लोगों ने उन्हें वाचाल और अकर्मण्य साबित करने के लिए मोदी और अन्य भाजपा नेताओं के पुराने बयानों को ढूंढ़-ढूंढ़कर उछाला. मज़े की बात यह रही कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए उन वीडियो अंशों को उछालने में मोदी-समर्थकों ने भी हिस्सा लिया. “देशभक्त” टीवी चैनलों ने आग में घी डालने का काम किया. एक टीवी चैनल की सुर्ख़ इबारत थी - “अबकी बार, सीमा पार”!

ऐसे दबाव के बीच संयम ज़ाहिर करने और संयम रखने की अपील करने के बजाय सैनिक कार्रवाई के महानिदेशक (डीजीएमओ) ने कहा कि सेना उड़ी हमले का (पाकिस्तान को) मुंहतोड़ जवाब देगी, जवाबी कार्रवाई का स्थान और समय अब भारत तय करेगा. प्रधानमंत्री ने भी जैसे ‘कार्रवाई’ के ‘विकल्पों’ को टटोला. गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर, वित्तमंत्री अरुण जेटली, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, तीनों सेनाओं के प्रमुखों और अन्य कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक हुई. एजेंसी की एक ख़बर के मुताबिक़ “करीब दो घंटे तक उड़ी हमले के बाद कार्रवाई के विकल्पों पर विचार किया गया. मोदी ने इसके बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी भेंट की.”

इससे उनके समर्थकों में निराशा छाई है. क्या उसे कम करने के लिए राष्ट्रसंघ के मंच पर इतने विस्तार से पाकिस्तान, आतंकवाद और बलूचिस्तान का मामला उठाया गया है?

राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को क्या कहा पता नहीं, पर समझा गया है कि सैनिक कार्रवाई को संभवतः तभी सिरे से नकार दिया गया. पता नहीं क्यों इसके बाद भी सरकार ने बयान जारी करने में वक़्त लिया. मोदी अंततः केरल जाकर भाजपा अधिवेशन में बोले कि युद्ध “ग़रीबी-बेरोज़गारी-अशिक्षा” आदि से होना चाहिए.

प्रधानमंत्री के इस रुख़ की प्रशंसा हुई है. जो विवेक तुरंत ज़ाहिर होना चाहिए था, वह हफ़्ते भर बाद सही, भाजपा अधिवेशन में प्रकट हो गया. पर इससे उनके समर्थकों में निराशा छाई है. क्या उसे कम करने के लिए राष्ट्रसंघ के मंच पर इतने विस्तार से पाकिस्तान, आतंकवाद और बलूचिस्तान का मामला उठाया गया है?

वजह जो हो, दो रोज़ पहले पाकिस्तान को प्रधानमंत्री के विवेकशील भाषण से एक कूटनीतिक सुझाव गया था. सुषमा स्वराज के भाषण से - जिस पर प्रधानमंत्री ने तत्काल ट्वीट की मुहर लगाई - तकरार के उसी ढर्रे का संदेश गया है. इससे देश में पाकिस्तान को “सबक़” सिखाने का जुनून सहज न होगा, बल्कि बना रहेगा. क्या इसमें भी रहनुमाओं की कोई रणनीति है?

उड़ी हम पर पहला हमला नहीं है. जांच की मुकम्मल रिपोर्ट भी आना अभी बाक़ी है. पाकिस्तान की औक़ात हाशिए की है. भारत उभरती महाशक्ति है. ऐसे परिदृश्य में मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान इतनी तवज्जोह का हक़दार है, जितनी उसे हमसे हासिल हो रही है.