फरवरी 2014 की बात है. कुछ ही समय बाद देश में लोकसभा चुनाव होने वाले थे. भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा चुका था. वे देश भर में घूम-घूमकर लोगों से भाजपा को वोट देने की अपील कर रहे थे. 22 फरवरी को वे असम के सिलचर में थे. यहां बांग्लादेशी शरणार्थियों का मुद्दा काफी अहम रहा है. इसी पर बोलते हुए नरेंद्र मोदी का कहना था कि ‘बांग्लादेश से दो तरह के लोग भारत में आए हैं. एक शरणार्थी हैं जबकि दूसरे घुसपैठिये. यदि दिल्ली में हमारी सरकार बनती है तो हम बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के साथ ही घुसपैठियों को यहां से बाहर खदेड़ने का भी वादा करते हैं.’

2014 में किये गए इस वादे को अब मोदी सरकार कुछ हद तक पूरा करने जा रही है. इसके लिए देश के नागरिकता संबंधी कानूनों में संशोधन की रूपरेखा भी तैयार की जा चुकी है. लेकिन यह संशोधन लगातार विवादों से घिर रहे हैं. आरोप लग रहे हैं कि यह संशोधन सांप्रदायिक आधार पर किये जा रहे हैं और ऐसा करना संविधान के धर्मनिरपेक्ष पहलू को कुंद करने जैसा है.

नागरिकता संबंधी कानूनों में होने जा रहे इन बदलावों की शुरुआत बीती 19 जुलाई को हुई थी. इस दिन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016’ पेश किया था. यह विधेयक 1955 के उस ‘नागरिकता अधिनियम’ में बदलाव के लिए लाया गया था जिसके तहत किसी भी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय होती है. इस नए विधेयक का सबसे विवादास्पद प्रावधान ‘अवैध प्रवासियों’ की परिभाषा में बदलाव से जुड़ा है.

1955 का कानून कहता है कि किसी भी ‘अवैध प्रवासी’ को भारतीय नागरिकता नहीं दी जा सकती. इस कानून के तहत ‘अवैध प्रवासी’ की परिभाषा में दो तरह के लोग आते हैं. पहले, वे विदेशी जो बिना वैध पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेजों के भारत आए हैं. और दूसरे वे विदेशी जो वीसा एक्सपायर होने या अनुमत समय (परमिटेड टाइम) बीतने के बाद भी भारत में रुके हुए हैं. जुलाई में लाया गया संशोधन ‘अवैध प्रवासी’ की इस परिभाषा में बदलाव करते हुए कहता है कि ‘अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ नहीं माना जाएगा.’ दूसरी तरह से देखें तो यह संशोधन सिर्फ पड़ोसी देशों से आने वाले मुस्लिम लोगों को ही ‘अवैध प्रवासी’ मानता है जबकि लगभग अन्य सभी लोगों को इस परिभाषा के दायरे से बाहर कर देता है.

'अगर मानवीयता के आधार पर ये संशोधन होते तो इनमें उन अहमदिया लोगों को भी शामिल किया जाता जिन्हें पाकिस्तान में मुस्लिम नहीं समझा जाता और जो यहां आने को मजबूर हैं. और वे रोहिंग्या मुस्लिम भी जो हाल ही में म्यांमार से यहां आए हैं.’

ऊपर लिखे जिन लोगों को नया विधेयक ‘अवैध प्रवासी’ की परिभाषा से बाहर करता है, उन्हें देशीकरण (नेचुरलाइजेशन) के जरिये भारतीय नागरिकता हासिल करने में भी छूट देता है. इस प्रक्रिया के जरिये अभी नागरिकता का आवेदन तभी किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति 11 साल से देश में रह रहा हो. लेकिन नया संशोधन इन तमाम लोगों को छह साल बाद ही नागरिकता के लिए आवेदन करने की छूट देता है. यानी नया कानून बनने के बाद अगर पाकिस्तान या बांग्लादेश से कोई हिंदू अवैध तरीके से भी देश की सीमा के अंदर घुस आता है तो छह साल बाद वह यहां की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है. आरोप लग रहे हैं कि यह संशोधन दूसरे देशों से आने वाले सिर्फ मुसलमानों के साथ ही भेदभाव करता है. जबकि अन्य धर्मों को मानने वालों को शरणार्थी मानता है और उन्हें नागरिकता देने की भी बात करता है.

बीती जुलाई में जब ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016’ लोकसभा में पेश किया गया तो इसका जमकर विरोध हुआ. इस विरोध के चलते 11 अगस्त को यह विधेयक संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया. सांसद सत्यपाल सिंह की अध्यक्षता में बनी इस समिति ने हाल ही में जनता से इन संशोधनों से संबंधित सुझाव मांगें हैं. ऐसे कई सामाजिक और छात्र संगठन हैं जो इन संशोधनों के विरोध में संसदीय समिति को अपने सुझाव भेजने के साथ ही सड़कों पर भी इसका विरोध कर रहे हैं. विशेष तौर से असम के कुछ संगठन इन संशोधनों का सबसे मुखरता से विरोध कर रहे हैं. ‘दिल्ली एक्शन कमेटी फॉर असम’ ऐसा ही एक संगठन है जो इन संशोधनों के विरोध में 29 सितंबर को जंतर-मंतर में एक प्रतिरोध रैली का आयोजन कर रहा है.

इस समिति से जुड़े बोनोजीत हुसैन कहते हैं, ‘इन संशोधनों के लिए तर्क दिया जा रहा है कि यह मानवीयता के आधार पर किये जा रहे हैं. लेकिन यह साफ़ दिख रहा है कि ये संशोधन मानवीयता के नहीं बल्कि खांटी सांप्रदायिक आधार पर किये जा रहे हैं. अगर मानवीयता के आधार पर ये संशोधन होते तो इनमें उन अहमदिया लोगों को भी शामिल किया जाता जिन्हें पाकिस्तान में मुस्लिम नहीं समझा जाता और जो यहां आने को मजबूर हैं. और वे रोहिंग्या मुस्लिम भी जो हाल ही में म्यांमार से यहां आए हैं.’ बोनोजीत यह भी बताते हैं कि ये संशोधन जितने घातक पूरे भारत के लिए हैं उससे कुछ ज्यादा घातक असम के लिए हैं क्योंकि इनका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव असम को ही झेलना पड़ेगा.

असम में बांग्लादेशी शरणार्थियों का मुद्दा सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रहा है. 1971 में बांग्लादेश के अलग राष्ट्र बनने से पहले और उसके बाद भारी संख्या में लोग असम में आकर बसने लगे थे. इससे यहां की जनसांख्यिकी में भारी परिवर्तन हुए और स्थानीय लोग सशस्त्र विद्रोह तक पर उतर आए. अंततः 1985 में भारत सरकार ने विद्रोही छात्रों के साथ एक संधि की जिसके बाद 1986 में नागरिक अधिनियम तक में बदलाव किये गए. इसमें तय किया गया कि 24 मार्च 1971 से पहले असम आए लोग ही भारतीय नागरिकता के हकदार होंगे.

यह पहली बार है जब देश में स्पष्ट तौर से धार्मिक आधार पर नागरिकता दिए जाने की बात कही जा रही है. कानून के कई जानकार मानते हैं कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ हैं जो कि समानता के अधिकार की बात करता है

बोनोजीत कहते हैं, ‘हालिया संशोधन 1985 की उस संधि को तोड़ देंगे जो बड़ी मुश्किल से हासिल हुई थी. 1947 से 1971 तक जो भी लोग असम आए थे उन्हें शामिेल करने का बोझ एक बार यह राज्य झेल चुका है. अब यही बोझ दोबारा असम पर दोबारा डालने के प्रयास किये जा रहे हैं. जिन ‘अवैध प्रवासियों’ को नागरिकता देने की बात सरकार कर रही है उनकी संख्या यहीं सबसे ज्यादा है. असम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों को विशेषाधिकार दिए गए हैं, इसलिए वे इन संशोधनों से प्रभावित नहीं होंगे और सारा बोझ सिर्फ असम पर ही पड़ेगा.’

इन संशोधनों का विरोध इसलिए भी हो रहा है क्योंकि यह पहली बार है जब देश में स्पष्ट तौर से धार्मिक आधार पर नागरिकता दिए जाने की बात कही जा रही है. कानून के कई जानकार मानते हैं कि ऐसे संशोधन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ हैं जो कि समानता के अधिकार की बात करता है. साथ ही इन संशोधनों को अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी नियमों के भी विरुद्ध माना जा रहा है.

बोनोजीत हुसैन बताते हैं, ‘मानवीय आधारों पर शरणार्थियों को संरक्षण देने लिए पहले ही कई कानून देश में मौजूद हैं. अफगानिस्तान से आए सिखों को भी तो ऐसे ही संरक्षण दिया गया है. लेकिन सांप्रदायिक आधार पर नागरिकता तय करके यह सरकार सिर्फ अपना वोट बैंक सुरक्षित करना चाहती है.’

सांप्रदायिक भावनाओं से प्रभावित होने के आरोप के अलावा और भी ऐसे कारण हैं जिनके चलते हालिया विधेयक विवादों में घिर रहा है. ‘भारत के विदेशी नागरिकों’ (ओसीआई) के पंजीकरण को रद्द करने संबंधी जो बदलाव इस विधेयक में किये गए हैं, वे भी विवादों से परे नहीं हैं. 1955 के नागरिकता अधिनियम के अनुसार किसी भी ओसीआई का पंजीकरण तीन आधारों पर रद्द किया जा सकता था. पहला, अगर ओसीआई ने धोखाधड़ी से पंजीकरण कराया हो. दूसरा, अगर पंजीकरण के पांच साल के भीतर ही उसे किसी मामले में दो साल या उससे ज्यादा के कारावास की सजा हुई हो. और तीसरा, अगर देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाना जरूरी हो.

हालिया संशोधन विधेयक इनमें एक और आधार जोड़ने की बात करता है - अगर ओसीआई ने देश में लागू किसी कानून का उल्लंघन किया हो. माना जा रहा है कि यह नया प्रावधान इतना अस्पष्ट और विस्तृत है कि इसके दुरूपयोग की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं. इस प्रावधान के चलते ट्रैफिक सिग्नल तोड़ने या नो पार्किंग में गाडी खड़ी करने जैसी गलतियों के लिए भी किसी ओसीआई का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है.