अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी बालकृष्ण बांसल नौ लाख रुपए की रिश्वत लेने के आरोपी थे. पर वे बेमौत मौत के पात्र नहीं थे. उन्हें जांचकर्ता सीबीआई पुलिसकर्मियों के कथित यातना भरे बर्ताव के दबाव में आत्महत्या करनी पड़ी. उनकी पत्नी, बेटी और उनका बेटा तो शिकायत में कहीं नहीं थे. यातना ने उन्हें भी मौत के मुंह में धकेल दिया. पत्नी गृहिणी थी, 27 साल की बेटी दिल्ली विश्वविद्यालय की गोल्ड मैडलिस्ट, 25 वर्षीय बेटा छात्र. सब मर गए.

लेकिन मरते वक़्त बीके बांसल और उनके बेटे ने जो लिखित बयान छोड़ा, वह रोंगटे खड़े कर देता है. भरोसा नहीं होता कि क्या सीबीआई में इस तरह के अधिकारी और हवलदार होते हैं? दोनों मृतकों ने “टॉर्चर” शब्द का प्रयोग करते हुए उस “यातना” का विस्तृत ब्योरा दिया है, जिसने पहले मां-बेटी और फिर पिता-पुत्र को ख़ुदकुशी के लिए मजबूर किया. बांसल ने लिखा है, उनकी पत्नी और बेटी की मौत आत्महत्या नहीं, हत्या थी.

यह सही है कि किसी के लिखने या कहने भर से अमित शाह से उनका संबंध साबित नहीं होता. लेकिन यातना और अंततः आत्महत्या की ओर धकलने के आरोपी अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई न कर क्या सरकार/उच्च अधिकारी बेवजह संदेह का घेरा बढ़ा नहीं रहे?

पिता-पुत्र का मरने से पहले लिखा बयान भारतीय एविडेंस एक्ट की धारा 32 के तहत बाक़ायदे ‘डाइंग डेक्लेरेशन’ है, जिसका संज्ञान क्यों नहीं लिया जा रहा? जिन पुलिस अधिकारियों (कैसी विडंबना है कि उनमें दो, रेखा सांगवान और अमृता कौर, महिला पुलिस अधिकारी हैं!) पर शारीरिक और अन्य यातना का बयान मृतकों ने दिया है, उन पर दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए मजबूर करने (अबेटमेंट ऑफ सुसाइड) का आपराधिक मामला क्यों दर्ज़ नहीं किया जा रहा?

बांसल के “सुसाइड नोट’’ में लिखा है कि जांचकर्ता डीआइजी संजीव गौतम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का वरदहस्त हासिल होने का दम भरते थे. यह सही है कि मृतक के लिखने या पुलिस अधिकारी के कहने भर से शाह से उनका कोई संबंध साबित नहीं होता. लेकिन यातना और अंततः आत्महत्या की ओर धकलने के आरोपी अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई न कर क्या सरकार/उच्च अधिकारी बेवजह संदेह का घेरा बढ़ा नहीं रहे? हमारे मीडिया (इस दफ़ा अख़बार भी पीछे नहीं) ने तो इस मामले में जैसे शर्म ही घोलकर पी ली है. आधी-अधूरी ख़बरें भ्रम की स्थिति ही पैदा करेंगी, बढ़ाएंगी.

देश में क़ानून-व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठने लग जाए, इससे दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है. केंद्र सरकार के इशारों पर चल रही दिल्ली पुलिस हर दूसरे दिन किसी विरोधी पार्टी के नेता पर हाथ डालती है, भले उसे अगले रोज़ ज़मानत मिल जाए, भले महीनों चार्जशीट तक दाख़िल न हो. लेकिन चार नागरिकों को “आत्महत्या” के लिए उकसाने वालों (चाहे वे पुलिस अधिकारी क्यों न हों) के ख़िलाफ़, मृतकों के लिखित बयान के बावजूद, कोई माक़ूल कार्रवाई न करना क्या व्यवस्था का चरमरा जाना ही साबित नहीं करता?