निर्देशक : नीरज पांडे

लेखक : नीरज पांडे, दिलीप झा

कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, कियारा अडवाणी, दिशा पाटनी, अनुपम खेर, भूमिका चावला, राजेश शर्मा, कुमुद मिश्रा

रेटिंग : 2.5 / 5

‘एम.एस. धोनी – द अनटोल्ड स्टोरी’ में काफी कुछ उच्च की गुणवत्ता का है. उसका बड़ा बजट परदे पर साफ दिखता है, अपनी कहानी कहने के लिए वह देश का हर ओर-छोर नापने को तैयार रहती है, उसका कैमरा हर शॉट सही तरीके से लेता है, क्रिकेट खेलने वाले दृश्य त्रुटिहीन रचता है, सह कलाकारों में कायदे के चेहरे चुनता है और इन सारी गुणवत्ताओं के ऊपर किसी तिलिस्मी गुण वाले सुशांत सिंह राजपूत को रखता है. अगर यह फिल्म कम बजट में भी बनती और अपनी इन तमाम खूबियों से रिक्त होती, तब भी हर किरदार को आत्मसात करने का तिलिस्मी ज्ञान रखने वाले सिर्फ और सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत की वजह से दर्शनीय होती.

लेकिन उसके लिए भी फिल्म के पास बेहतर पटकथा होनी होती. क्योंकि जिन कहानियों की रगों में रोचकता नहीं दौड़ती उनमें बच्चन से लेकर पचपन पार कर चुके देशी-विदेशी महान अभिनेताओं तक का होना व्यर्थ हो जाता है. फिर सुशांत ने तो अभी फिल्मी बसंत देखे ही कितने हैं. धोनी पर बनी इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी उनका खुद इस फिल्म का निर्माता होना है (वाया उनके मित्र अरुण पांडे), जिस वजह से फिल्म सबकुछ सही रखने के बावजूद पटकथा विकीपीडिया सी रखती है. जैसे जल्दी-जल्दी जानकारी हासिल करने के लिए ह्यूमन-रेस फटाफट किसी मशहूर शख्सियत का विकी पेज फांक जाती है वैसे ही फिल्म सपाट तरीके से अपने नायक के जीवन की हाईलाइट्स दिखाती जाती है और वो सबकुछ जो दुनिया एक ईमानदार बायोपिक से उम्मीद करती है, छिपा लेती है.

फिल्म अपनी शुरुआत बेहतरीन तरीके से करती है. धोनी के बचपन से होते हुए उनकी जवानी तक पहुंचती है और हर उस संघर्ष को कायदे से दिखाती है जिससे ज्यादातर खिलाड़ी गुजरते ही हैं

इस फिल्म का निर्माण करने के अलावा धोनी की सहमति के साथ उनके दोस्त अरुण पांडे ही इसे बनाने का आइडिया लेकर निर्देशक नीरज पांडे के पास गए थे और फिल्म देखते वक्त समझ आता है कि एक बेहद लंबे व उबाऊ प्रायोजित विज्ञापन और ईमानदार व रोचक फिल्म में क्या अंतर होता है. नीरज पांडे न सिर्फ बंधे हाथों से कहानी कहते हैं बल्कि अपनी फिल्मों में हमेशा से एडीटिंग को लेकर मुस्तैद रहने वाला एक निर्देशक एडीटिंग के लिए दया की भीख मांगती तीन घंटे लंबी वह फिल्म बनाता है जिसका प्रथम भाग सबसे दिलचस्प होने के बावजूद अपने आप में ही तीन घंटे बराबर लंबा लगता है.

फिल्म अपनी शुरुआत बेहतरीन तरीके से करती है. धोनी के बचपन से होते हुए उनकी जवानी तक पहुंचती है और हर उस संघर्ष को कायदे से दिखाती है जिससे ज्यादातर खिलाड़ी गुजरते ही हैं. धोनी की लोअर मिडिल क्लास रिहाइश, उनके सदैव चिंतित पिता (अनुपम खेर, बड़े दिनों बाद बेहतर अभिनय करते हुए), हमेशा साथ देने के लिए तैयार यार-दोस्त, और चंद गुरु व शुभचिंतक जो हमेशा धोनी का भला चाहते हैं. धोनी के बारे में कुछ नयी बातें भी पता चलती हैं लेकिन तफ्सील से मैच दर मैच धोनी के रिकॉर्ड और करियर-ग्राफ दिखाने की ‘क्रिकेट सम्राट’ नुमा कोशिश फिल्म को उसके पहले हिस्से में ही बोझिल बनाने लगती है. सिवाय संघर्षों के फिल्म में कोई नेगेटिविटी या नेगेटिव किरदार भी नहीं है. फिल्म चूंकि धोनी ही बना रहे हैं इसलिए सभी पात्र – खिलाड़ियों से लेकर क्रिकेट अधिकारियों तक - धोनी के मददगार ही दिखाए जाते हैं. कहीं भी वो फ्रिक्शन परदे पर नजर नहीं आता जो हमेशा से ही जिंदगी और खेल का हिस्सा रहता है और जिसमें तपने के बाद ही संघर्ष सोने की तरह चमकदार नजर आता है.

कोई इनकार नहीं कर सकता कि धोनी की सफलताएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन उनका संघर्ष नेशनल लेवल की क्रिकेट टीम में खेलने वाले ज्यादातर खिलाड़ियों जैसा ही है. उसमें कुछ झकझोर कर रख देने वाली सिनेमेटिक वैल्यू नहीं है, यह बात इस फिल्म को देखने के बाद आप भी कहेंगे. नेशनल छोड़िए, रणजी खेलने वाले लड़के आज भी इसी तरह का संघर्ष कर रहे हैं और उनके जीवन में भी वही उदासी, नौकरी की छटपटाहट, भ्रष्टाचार और अधिकारियों की उदासीनता व्याप्त है जो धोनी ने भोगी थी. इसीलिए, उनकी कहानी का दूसरा हिस्सा जिसमें तमाम तयशुदा संघर्षों के बाद वे आखिरकार इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने लगते हैं, इस फिल्म में बेहद उम्दा तरीके से दिखाया जाना बहुत जरूरी था. फिल्म उन्हें दिखाती भी है, ठीक उसी नीरसता के साथ जैसे किसी धमाकेदार लाइव मैच के बाद टीवी पर उस मैच की हाईलाइट्स दिखाई जाती हैं. आपको वह सबकुछ पता चलता है जो आप पहले से जानते हैं (सिवाय उन दो प्रेम कहानियों के जिनमें नजर आईं दोनों ही नायिकाएं अभिनय के मामले में साधारण हैं) लेकिन रोमांच नहीं जागता.

यह फिल्म किसी कमीशन्ड डाक्यूमेंट्री की तरह अपने नायक की सरल जीवनी पूरी की पूरी बिना सांस लिए सुना तो देती है, लेकिन मनोरंजन किस चिड़िया का नाम होता है, इस सामान्य ज्ञान के प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाती

हिंदुस्तान 2011 का वर्ल्ड कप जीते या धोनी गांगुली-द्रविड़-लक्ष्मण जैसे सीनियर प्लेयर्स को टीम से निकालने की बात करें, कोई भी बड़ा घटनाक्रम फिल्म असरदार नहीं बना पाती. क्रिकेट मैचों की रियल फुटेज लेकर उसमें सुशांत को चस्पा करने का काबिले-तारीफ काम करने वाली यह फिल्म किसी कमीशन्ड डाक्यूमेंट्री की तरह अपने नायक की सरल जीवनी पूरी की पूरी बिना सांस लिए सुना तो देती है, लेकिन मनोरंजन किस चिड़िया का नाम होता है, इस सामान्य ज्ञान के प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाती.

फिल्म अनगिनत बार दृश्यों को दोहराती भी है. धोनी एक मैच खेलते हैं, कैमरा उनके परिवार से लेकर उनके दोस्तों, शुभचिंतकों, गुरुओं, लबालब भरे स्टेडियम के कट-अवेज (झलकियां) दिखाता है और फिर प्यार या जीवन के संघर्षों वाला एक छोटा सा बेजान सीन आता है जिसके बाद एक और मैच होता है और कैमरा फिर से नाखून चबाते उन्हीं चेहरों के पास पहुंच जाता है. ये इतनी बार होता है कि एक हाथ की उंगलियां आसानी से कम पड़ जाती हैं और आप झींक जाते हैं. फिल्म से धोनी के अलावा बाकी के प्लेयर्स भी गायब रहते हैं और रह-रहकर उनके नामभर सामने आते हैं या फिर मैचों की फुटेज में वे दिखते हैं.

फिल्म न तो धोनी-युवराज की दोस्ती पर गहरे उतरती है, न ड्रेसिंग रूम में धोनी के अलावा किसी और खिलाड़ी के दर्शन करवाती है और न ही 11 सदस्यों की टीम और धोनी के बीच कोई दृश्य या कोई मीटिंग वगैरह को हमारी नजर करती है. वह फिल्म जो ग्यारह खिलाड़ियों द्वारा खेले जाने वाले क्रिकेट का उत्सव मनाने के लिए बनी थी क्या इंटरवल के बाद ‘अजहर’ वाले स्पेस में चली गई थी? या फिर सचिन तेंदुलकर की बेजान ऑटोबायोग्राफी को अपनी प्रेरणा मान बैठी थी? या फिर अपने नायक के मोह में इतनी गहरे डूब गई थी कि कोई और उसे नजर ही नहीं आया? दर्शक भी नहीं.

सुशांत धोनी जैसे नहीं दिखते लेकिन उनकी नकल करने की जगह, वे उनके मैनरिज्म, बातचीत करने के अंदाज को आत्मसात करते हैं और जब परदे पर आते हैं तो असल जिंदगी वाले महेंद्र सिंह धोनी भी उनके आगे नकली लगते हैं!

उस देश में जहां क्रिकेट सबसे ज्यादा बिकने वाली अफीम है, यह समझना जरूरी है कि धोनी जैसे नायक का सलीकेदार स्तुतिगान करना बेहतर फिल्म रचना नहीं होता. विषय और नायकों के क्षेत्र में अंतर होने के बावजूद इसीलिए माइकल फासबेंडर अभिनीत ‘स्टीव जॉब्स’ (2015) और सुशांत अभिनीत बेहद लचर टाइटल वाली ‘एमएस धोनी – द अनटोल्ड स्टोरी’ की तुलना करना जरूरी है. धोनी की तरह ही जॉब्स की कहानी सब जानते हैं लेकिन फिर भी ‘स्टीव जॉब्स’ सिर्फ अपनी पटकथा के दम पर आखिर तक बेहद उम्दा और यादगार बनी रहती है. डैनी बॉयल के हाथ नीरज पांडे की तरह बंधे भी नहीं होते और तभी फिल्म सपाट तरीके से जीवनी कहने की जगह जरूरी बातों को तीन अध्यायों में बांटकर तीन मशहूर एपल प्रोडक्ट लॉन्च के दौरान एक धाराप्रवाह कथा बेमिसाल तरीके से कह जाती है.

उस अंग्रेजी फिल्म ‘स्टीव जॉब्स’ की एक खासियत माइकल फासबेंडर भी हैं जो फिल्म में स्टीव जॉब्स की तरह बिलकुल भी नहीं दिखने के बावजूद इतने आत्मविश्वास के साथ अभिनय करते हैं कि खुद स्टीव जॉब्स हो जाते हैं. वे जॉब्स की नकल नहीं करते, उनके मैनरिज्म लेते हैं और उन्हें अपना बना लेते हैं. इसलिए जहां एक तरफ ‘जॉब्स’ नामक फिल्म में स्टीव जॉब्स की हूबहू नकल करने के बावजूद एश्टन कूचर की आलोचना होती है वहीं माइकल फासबेंडर हमेशा के लिए सिनेमा के इतिहास में अंकित हो जाते हैं. ‘एमएस धोनी…’ में सुशांत सिंह राजपूत उन्हीं फासबेंडर के स्तर का अभूतपूर्व अभिनय करते हैं. वे धोनी जैसे नहीं दिखते लेकिन उनकी नकल करने की जगह (‘अजहर’ के हाशमी को याद कीजिए!), वे धोनी के मैनरिज्म, बातचीत करने के अंदाज को आत्मसात करते हैं और जब परदे पर आते हैं तो वे ही धोनी होते हैं. असल जिंदगी वाले महेंद्र सिंह धोनी भी उनके आगे नकली लगते हैं!

इस स्तर के उच्चतम अभिनय के लिए ही ‘एमएस धोनी – द अनटोल्ड स्टोरी’ देखिए. हेलीकाप्टर शॉट से लेकर मुस्कान तक में धोनी हो जाने वाले सुशांत सिंह राजपूत जैसे दुर्लभ अभिनेता हमारे देश में कम ही हैं, तभी तो उनकी हर फिल्म देखना बेहद जरूरी है.