बड़ी कृतियां वे होती हैं जो देश-काल की बदली स्थितियों में अपने पुनर्पाठ को प्रोत्साहित कर नई प्रासंगिकता अर्जित करती हैं. हिंदी में आलोचना का एक बड़ा हिस्सा अकादेमिक दबाव और ज़रूरत के तहत लिखा जाता है. उसमें जब-तब पुनर्पाठ का प्रयत्न भी दिख पड़ता है. पर अकसर ऐसा पुनर्पाठ किसी बड़ी कृति या लेखक पर विभिन्न मतों का संकलन या दोहराव भर बन कर रह जाता है.

जब दिल्ली के वोकेशनल कॉलेज ने नवंबर में शुरू होने जा रही मुक्तिबोध जन्मशती के पूर्वरंग की तरह लंबी कविताओं पर विचार की एक गोष्ठी आयोजित की तो उसमें मुक्तिबोध की कालजयी और हिंदी कविता की पूर्वज-वंशजहीन कृति ‘अंधेरे में’ के पुनर्पाठ का कुछ प्रयत्न दीख पड़ा. मुख्यतः यह प्रयत्न किसी अकादेमिक विद्वान ने नहीं कवि-संपादक लीलाधर मंडलोई ने किया. उन्होंने विस्तार से मुक्तिबोध की अन्‍य लंबी कविताओं से उद्धरण, बिंबमालाएं, अन्य अभिप्राय चुनते हुए यह दिलचस्प धारणा प्रस्तुत की कि ‘अंधेरे में’ को ठीक से पढ़ने-समझने के लिए इन लंबी कविताओं से गुज़रना ज़रूरी है क्योंकि मुक्तिबोध अपनी इस क्लैसिक कविता में जहां पहुंचे वहां पहुंचने के लिए वे लगातार विभिन्न स्तरों पर अपनी दृष्टि-विचार-अनुभव-काव्यकौशल आदि को खोज-बीन और विन्यस्त कर रहे थे.

‘अंधेरे में’ एक लंबे जटिल और अनेक स्तरीय काव्य-प्रयत्न के बाद ही लिखी जा सकती थी. उसमें पहले की कविताओं के कई बिंबों और अभिप्रायों का स्वयं मुक्तिबोध एक तरह से मानो पुनर्पाठ करते हैं और उनका रूपांतर या कायांतरण कर देते हैं. हिंदी में शायद मुक्तिबोध ऐसे अकेले कवि हैं जिनकी कविताओं को एक लंबी-अधूरी काव्यगाथा के विभिन्न अध्यायों या सर्गों की तरह पढ़ा-समझा जा सकता है. औरों के यहां ऐसा बिलकुल न हो यह स्थिति तो नहीं है पर जो विन्यास और वितान मुक्तिबोध की कविताएं मिलकर रचती हैं वे अप्रत्याशित भले हों अनपहचाने नहीं जा सकते, नहीं जाने चाहिये.

इस अवसर पर सूझता यह भी है कि क्या इस लंबी कविता को उसकी वैचारिक सघनता और प्रखरता के बावजूद अभिव्यक्ति की असंख्य संभावनाओं की तरह पढ़ा जा सकता है? क्या मुक्तिबोध इस कविता में अभिव्यक्ति और सामाजिक संघर्ष के ख़तरों के तादात्म्य की तलाश कर रहे हैं? क्या कविता के ढांचे का एक स्वप्नकथा जैसा होने का एक आशय यह भी है कि उसमें दुस्स्वप्न और उससे मुक्ति की संभावना दोनों ही अन्तर्भूत है? क्या ‘तमशून्य में तैरती जगत्-समीक्षा’, ‘विवेक-विक्षोभ’, ‘सत्-चित्-वेदना’, ‘विचारों की फिरकी’, ‘जागरित-बुद्धि, प्रज्वलत्-धी’, ‘विचारों की रक्तिम अग्नि’, ‘श्याम आकाश में, संकेत-भाषा-सी तारों की आंखें’, ‘भक्ति की अग्नि का उद्रेक’, ‘भयानक अनहद नाद की भन भन’ आदि शब्द समूहों को कविता के आन्तरिक ढांचे की तरह देखा जा सकता है? क्या मार्क्सवादी मुक्तिबोध तिलक-तोल्स्तॉय-गांधी को उद्बुद्ध कर अपनी वैचारिक आस्था का अतिक्रमण कर उसके बरक़्स या उसी के अन्तर्गत एक वैकल्पिक स्वप्नकथा गढ़ रहे थे?

नज़रूल के यहां जाकर मन प्रसन्न और उदास बारी-बारी से होता है

आसनसोल कभी पहले नहीं गया था. अपने बचपन में मैंने अपने ताऊ के कुछ समय वहां रहने की बात सुनी ज़रूर थी पर उसके बाद कभी वहां किसी प्रसंग में जाने का सुयोग नहीं हुआ था. वह सौभाग्यवश पिछले सप्ताह हुआ. वहां काफ़ी बड़ा हिंदी समाज है जो अपनी भाषायी अस्मिता बनाये रखने के लिए सक्रिय है. मुझे ख़याल नहीं था कि बांग्ला में महाकवि का दर्ज़ा रखने वाले काज़ी नज़रुल इस्लाम का जन्मस्थान चुरुलिया में ही है जो आसनसोल के नज़दीक है. वहां जाने पर मन प्रसन्न और उदास दोनों ही बारी-बारी से हुआ.

जिस गांव में नज़रुल जन्मे थे उस गांव को अब कवितीर्थ कहा जाता है: भारत में शायद ही कहीं किसी गांव का ऐसे नाम से मिलता-जुलता नाम हो. उनकी हिंदू पत्नी की समाधि वहां है और बांग्लादेश में दफ़्न नज़रुल की कब्र से कुछ मिट्टी लाकर उनकी भी एक कब्र यहां बनायी गयी है. उनका जन्म जिस घासफूस से छाये मिट्टी के घर में हुआ था वहां अब उनके नाम पर एक अकादेमी है जिसमें उनका वह मकतब भी शामिल है जहां वे पढ़े थे. उनकी विभिन्न वस्तुओं, कुछ पत्रों, सम्मानपत्रों आदि को लेकर एक संग्रहालय है.

हर वर्ष वहां सप्ताह भर का मेला भी मस्जिद के पास लगता है और उनके ऊपर शोध करनेवाली एक पत्रिका ‘नज़रुल अन्वेषा’ का प्रकाशन होता है. इस संकुल की देखभाल और उसे चलाने का काम परिवार के सदस्य ही कर रहे हैं. हिंदी में किसी बड़े कवि या साहित्यकार के जन्मस्थान आदि को लेकर ऐसा संकुल कहीं नहीं बनाया गया है. नज़रुल बांग्लादेश के राष्ट्रकवि माने जाते हैं और वहां की एक प्रधानमंत्री कवितीर्थ आ चुकी हैं.

यह सब देखकर मन प्रसन्न होना स्वाभाविक था. लेकिन जब पता चला कि, दुर्भाग्य से, इस संकुल को पत्रिका और मेले के लिए एक लाख रुपये से कम का जो शासकीय अनुदान मिलता था वह लगभग अकारण बंद हो गया है तो मन उदास भी हुआ. नज़रुल के एक संबंधी ने स्पष्ट किया कि वे अब इसके लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैला रहे हैं और सामान्य जनता के सहयोग से ही मेला और प्रकाशन आयोजित हो रहे हैं. मैंने फ़ौरन ही, उनके बिना कहे या उम्मीद किये, उन्हें रज़ा फाउंडेशन की ओर से समुचित वित्तीय सहायता का प्रस्ताव किया. बंगाल की मुख्यमंत्री को एक पत्र भी मैं लिख रहा हूं ताकि वस्तुस्थिति उनके ध्यान में आये और इस संकुल के लिए शासकीय समर्थन मिल सके.

हम इस बात की कोशिश भी करेंगे कि विशेषज्ञ परामर्श से संग्रहालय को पुनरायोजित किया जाये. सौभाग्य से आसनसोल विश्वविद्यालय में, जो कि बहुत युवा संस्था है, नज़रुल इसलाम केंद्र बना है और सक्रिय है. नजरू़ल के हिंदी अनुवाद बहुत अच्छे और पठनीय नहीं रहे हैं. अगर वहां इसको बेहतर ढंग से करने का कोई प्रोजेक्ट बनता है तो उसकी भी मदद की जा सकेगी. यह प्रस्ताव भी इस केन्द्र से मैंने किया कि वे हिंदी के दस आधुनिक कवियों के बांग्ला में अनुवाद की योजना बनायें और हम इसे प्रोत्साहित करेंगे.

देश का हिंदी समाज आसनसोल से प्रेरणा ले सकता है

हिंदी पखवारे या सप्ताह या दिवस के नाम पर दिल्ली से लेकर हिंदी अंचल के अनेक शहरों और संस्थाओं में हिंदी को लेकर जो पाखंडपर्व मनाये जाते हैं उनसे ऊब और नाराज़ी होते अब हम जैसों को कई दशक हो गये. लेकिन इस बार आसनसोल में वहां के हिंदी समाज को अपनी भाषा और उससे जुड़ी संस्कृति को बढ़ाने की ईमानदार और ठोस कोशिश देखकर बहुत अच्छा लगा. वहां एक हिंदी भवन है जिसके एक कक्ष का नाम प्रभाष जोशी कक्ष है. शहर में प्रेमचंद और निराला की मूर्तियां लगी हैं. राजेंद्र यादव की भी मूर्ति लगाने की बात चल रही है.

आसनसोल नगर निगम ने यहां एक हिंदी अकादेमी स्थापित की है, उर्दू अकादेमी भी. देश में कहीं भी ऐसी अकादेमियां कोई नगर निगम स्थापित करता-चलाता हो इसका मुझे पता नहीं. ज़िले में हिंदी विद्यालयों की संख्या काफ़ी है और एक हिंदी भाषी महाविद्यालय भी स्थापित हुआ है. विश्वविद्यालय में भी हिंदी विभाग है.

हिंदी अकादेमी ने मुझे दोपहर एक सार्वजनिक व्याख्यान और शाम कवितापाठ के लिए आमंत्रित किया. ‘साहित्य क्यों’ शीर्षक व्याख्यान के पहले एक हिंदी भाषी गायक ने निराला और एक बंगभाषी नृत्‍य समूह ने प्रसाद, मुक्तिबोध आदि की कविताओं पर आधारित प्रस्तुतियां कीं जो सुमधुर/सुरीली और नृत्य में नवाचारी थीं. हिंदी में इस अवसर पर जो व्यापक बेसुरापन दिखायी-सुनायी देता है वह इस आयोजन में नहीं था जो प्रीतिकर विस्मय की बात थी. बड़ी संख्या में हिंदी श्रोता थे जिनमें आसनसोल के अलावा अन्य विश्वविद्यालयों से आये अध्यापक आदि भी थे. वहां हिंदी का एक पुस्तकालय स्थापित करने की योजना है जिसमें, फिर बना किसी ऐसी मांग के, मैंने रज़ा फ़ाउण्डेशन से वित्तीय और पुस्तकीय सहायता करने की सार्वजनिक प्रतिश्रुति की.

अच्छा यह है कि हिंदी के संरक्षण आदि के कार्य में बंगाल की वर्तमान सरकार पूरी मदद कर रही है. नगर निगम के मेयर हिंदी भाषी हैं. मुझे लगा कि हिंदी को ऐसे अंचलों में दूसरी भाषाओं के साथ मिलजुलकर ही सक्रिय होना चाहिये. भविष्य में वहां ऐसी हिंदी विकसित हो सकती है जो सर्जनात्मक रूप से बांग्ला को आत्मसात् कर अपने में उसे अन्तर्ध्वनित करे. वहां के अधिक प्रबुद्ध लोग, कालांतरर में, हिंदी से बांग्ला और बांग्ला से हिंदी में अनुवाद कर सकने की अनूठी और बेहद ज़रूरी क्षमता विकसित कर सकते हैं.

यहां यह भी पता चला कि बांग्ला मध्यवर्ग के परिवार अपने बजट में से कुछ निश्चित राशि सांस्कृतिक कार्यों, पुस्तकों आदि के लिए अलग कर रखते हैं. काश, हिंदी समाज का अंग्रेज़ी का नकलची वर्ग बांग्ला से कुछ शिक्षा ग्रहण कर ऐसा कुछ करने लगता! मैंने नहीं सोचा था कि आसनसोल की यह संक्षिप्त यात्रा मनोबलवर्द्धक होगी और लगेगा कि हिंदी और साहित्य अब भी संभावना हैं.