अगर मैं भारतीय सेना द्वारा सीमा पार की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर जश्न मनाने को तैयार नहीं हूं तो क्या कुछ कम भारतीय हूं? अगर मैं पाकिस्तान के कलाकारों के बहिष्कार को गलत मानता हूं तो क्या मैं देशद्रोही हूं? अगर मैं युद्ध की भाषा नहीं बोलता तो क्या मैं शांति का अपराधी हूं?

दुर्भाग्य से देश में यही माहौल बना दिया गया है. हर कोई जैसे जश्न में डूबा है कि भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखा दिया. सर्जिकल स्ट्राइक लोगों को ऐसा लुभावना शब्द लग रहा है कि जैसे भारत की सारी सुरक्षा, खुशहाली और तरक्की की कुंजी इसी में है. जो लोग इस सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वे पाकिस्तान समर्थक और देशद्रोही घोषित किए जा रहे हैं.

सरकार की कूटनीतिक सफलता अपनी जगह है, इससे पैदा किया जाने वाला वह युद्धोन्माद अपनी जगह, जिसमें पाकिस्तान को अब मिट्टी में मिला देने के चुटकुलानुमा एलान हो रहे हैं

लेकिन इस उन्माद के बीच भी कुछ जरूरी सवाल पूछने का जोखिम उठाना होगा. इस सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर अब तक दो आधिकारिक वक्तव्य आए हैं. एक वक्तव्य विदेश मंत्रालय के प्रेस सम्मेलन में मिलिटरी आॅपरेशन के महानिदेशक मेजर जनरल रणवीर सिंह ने दिया. उन्होंने ही पहली बार यह बात कही कि भारत ने बुधवार रात सर्जिकल स्ट्राइक की है. लेकिन मारे गए आतंकियों की तादाद पर उन्होंने कुछ नहीं कहा. सम्मेलन में सवाल जवाब से भी इनकार किया.

दूसरी बात उसी शाम हुई सर्वदलीय बैठक से निकल कर आई. वहां भी विपक्ष के नेताओं ने जब यह जानना चाहा कि इस सर्जिकल हमले में कितने आतंकी मारे गए तो उनसे कहा गया कि कुछ बताना मुश्किल है. उन्होंने वीडियो और तस्वीरों के बारे में पूछा तो कहा गया कि शाम तक शायद कुछ फोटो मिलें.

लेकिन कोई था जो इन आधिकारिक वक्तव्यों से अलग मीडिया को जानकारी मुहैया करा रहा था. जल्द ही चैनलों पर यह खबर चलने लगी कि इस हमले में 38 आतंकी मारे गए हैं और सेना तीन किलोमीटर भीतर तक जाकर आतंकियों के सात लांचिंग पैड नष्ट कर आई है.

सिर्फ इसलिए कि ये खबरें सूत्रों के हवाले से हैं, इनकी सच्चाई पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता. पत्रकारिता के अपने अनुभव से हम सब जानते हैं कि खबरें आधिकारिक बयानों से नहीं, सूत्रों से आती हैं.

मगर फिर भी पूछे जाने लायक सवाल बचते हैं. क्या सीमा पार जाकर आतंकवादियों को मार गिराने का काम सेना ने पहली बार किया है? रक्षा जानकारों का कहना है कि ऐसा पहले भी होता रहा है. इन जानकारों को छोड़ दें, पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह ने कहा है कि ऐसे आॅपरेशन पहले भी होते रहे हैं.

ये वे देशभक्त हैं जो देश की सुरक्षा को भी अपनी सांप्रदायिक दृष्टि से जोड़कर देखते हैं और एक युद्धपिपासु राष्ट्रवाद के उन्माद में हर किसी से देशभक्ति का सबूत मांगते हैं

तो नया बस यह है कि पहली बार भारत सरकार ने ऐसी कार्रवाई को सर्जिकल स्ट्राइक का नाम देकर सार्वजनिक किया है. बेशक ऐसी जानकारियों को सार्वजनिक करने का भी अपना एक कूटनीतिक महत्व होता है- आज की तारीख़ में इसी सार्वजनिक स्वीकार की वजह से पाकिस्तान सरकार दबाव में है. सारी दुनिया उससे कह रही है कि वह अपनी जमीन का आतंकवाद के लिए इस्तेमाल न होने दे.

लेकिन सेना की यह कामयाबी या सरकार की कूटनीतिक सफलता अपनी जगह है, इससे पैदा किया जाने वाला वह युद्धोन्माद अपनी जगह, जिसमें पाकिस्तान को अब मिट्टी में मिला देने के चुटकुलानुमा एलान हो रहे हैं. शायद यह भी उतना खतरनाक नहीं, हालांकि स्रोत वहीं से बनते हैं, जितना खतरनाक अपने ही देश के एक हिस्से के प्रति इस सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने दिखाई पड़ने वाला विद्वेष है. इस विद्वेष में उन टीवी चैनलों और पत्रकारों पर छींटाकशी की जा रही है जो युद्ध के विरुद्ध लिखते और बोलते रहे हैं, विपक्ष के उन नेताओं पर छींटाकशी की जा रही है जो पाकिस्तान के साथ एक संतुलित रुख अपनाने के पक्षधर हैं और सबसे ज्यादा उन मुसलमानों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं जो पिछले कुछ वर्षों से खुद को एक सामाजिक सौतेलेपन के एहसास से घिरा पा रहे हैं. इस मोड़ पर नियंत्रण रेखा के पार हुई सर्जिकल स्ट्राइक देश के भीतर ही एक बहुत बड़ी आबादी के लिए एक विराट वैचारिक और घृणास्पद हमले में बदलती नजर आ रही है.

यहां से वह वास्तविक खतरा सामने आता है जो इस आसान किस्म की देशभक्ति की वजह से देश के सामने पैदा होता है. ये वे देशभक्त हैं जो देश की सुरक्षा को भी अपनी सांप्रदायिक दृष्टि से जोड़कर देखते हैं और एक युद्धपिपासु राष्ट्रवाद के उन्माद में हर किसी से देशभक्ति का सबूत मांगते हैं. वे अपने प्रधानमंत्री का भी कहा भूल जाते हैं कि इस देश में किसी को अपनी देशभक्ति साबित करने की जरूरत नहीं है.

इस आसान देशभक्ति की वजह से देश पर दूसरा खतरा उस वैचारिकता के क्षरण का है जिससे कोई देश उदार, लोकतांत्रिक और मजबूत बनता है

भारत माता की जय बोलकर, सबसे बड़ा तिरंगा फहरा कर, भारत की जीत पर पटाखे छोड़कर, वाट्सऐप और फेसबुक पर किन्हीं काल्पनिक देशद्रोहियों को गाली देकर, पाकिस्तान के खिलाफ चुटकुले शेयर करके, धर्मनिरपेक्ष और उदार तत्वों का मजाक बनाते हुए और प्रधानमंत्री के 56 इंच के सीने का हवाला देकर साबित की जाने वाली इस आसान देशभक्ति से लेकिन दो स्तरों पर देश के ही रेशे कमजोर पड़ते हैं. एक तो यह देशभक्ति मूलतः उस हिंदूवादी राजनीति को रास आती है जो अपने बहुसंख्यकवाद का दम भरते हुए खुद को पूरे देश का इकलौता नुमाइंदा साबित करने पर आमादा रहती है और बाकी लोगों को चुनौती देती चलती है कि वे भी उस जैसे हों. इसके तेवर इतने आक्रामक होते हैं जैसे लगता है कि वह पाकिस्तान पर हमले का समर्थन न करने वालों पर हमला बोल देगी. इस आक्रामक राजनीति की वजह से वैसे बहुत सारे लोग और समुदाय खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं जो इस वैचारिकता से असहमत हैं. यह अनायास नहीं है कि सर्जिकल स्ट्राइक का यह गुब्बारा हिंदूवादी शक्तियों का नया शगल बन गया है और बाकी लोग इसे दूर खड़े देख रहे हैं.

इस आसान देशभक्ति की वजह से देश पर दूसरा खतरा उस वैचारिकता के क्षरण का है जिससे कोई देश उदार, लोकतांत्रिक और मजबूत बनता है. यह देशभक्ति असहमति की गुंजाइश का सबसे पहले गला घोंटती है और चाहती है कि सब वही कहें और करें जो सरकार कह और कर रही है.

लेकिन सरकार देश नहीं होती. देश उन करोड़ों लोगों से बनता है जो यहां रहते हैं और इसमें साझा करते हैं. सरकारों को यह रास आता है कि वे इन करोड़ों लोगों को सजग नागरिक न बनने दें बल्कि जनता नाम की रेवड़ में बदल डालें. यह अनायास नहीं है कि हमारे ज्यादातर राजनीतिक दलों के नाम में जनता शब्द अलग अलग रूपों में शामिल है.

बहरहाल, यह सच सीमा पार का भी है. पाक सरकार और सेना भी यही चाहती हैं कि भारत उनसे उलझता हुआ नजर आए. क्योंकि इससे उनको जनता नाम की अपनी बिगड़ी हुई रेवड़ को अपने पीछे चलाने का मौका मिल जाता है. हम जब पाक कलाकारों के कार्यक्रम रद्द करते हैं, जब भारत में मशहूर पाक सीरियलों पर पाबंदी की बात करते हैं, जब अपनी फिल्मों से पाक कलाकारों को निकालते हैं तो दरअसल पाक सरकार और सेना का ही काम आसान करते हैं. वे भी हमारी फिल्मों को बैन कर अपनी देशभक्ति साबित कर देते हैं.

वास्तविक देशभक्ति की चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी होती हैं. उसके लिए धीरज के साथ देश और दुनिया को समझने का माद्दा चाहिए होता है

लेकिन वास्तविक देशभक्ति की चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी होती हैं. उसके लिए धीरज के साथ देश और दुनिया को समझने का माद्दा चाहिए होता है. उसमें जनता और सरकार के बीच का फर्क करने की तमीज़ चाहिए होती है, उसमें असली और नकली मुद्दों की पहचान चाहिए होती है. जब हम इन्हें पहचानेंगे तो सीमा पार से आ रहे आतंकवाद का प्रतिकार करेंगे, वहां से आ रही कला का नहीं. फिर हम यह भी समझेंगे कि हम कला को जितना न्योता देते हैं, आतंक का रास्ता उतना ही बंद करते हैं. फिर हममें यह भी समझ पैदा होती है कि साहित्य, कला और संस्कृति समय और सरहदों के पार होते हैं- फ़ैज़ और मंटो हमारे लेखक हो जाते हैं और कृशनचंदर और इस्मत चुग़तई उनके. सिर्फ इसलिए नहीं कि साहित्य-कला को कोई विशेषाधिकार हासिल है, बल्कि इसलिए कि अपने मूल चरित्र में ये विधाएं कहीं ज्यादा उच्चतर मनुष्यता को संबोधित होती हैं.

लेखक से देशभक्त होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लेखक अपने देश से प्रेम नहीं करता. बस वह उस सरकारों द्वारा नियोजित देशभक्ति में अपनी तर्कबुद्धि के समर्पण से इनकार करता है.

एक व्यक्ति और लेखक दोनों के तौर पर मुझे अपनी भारतीयता पर गर्व है. लेकिन इस गर्व का वास्ता उस उदार और बहुलतावादी संस्कार से है जो मुझे मेरी परंपरा ने सौंपा है. इस भारतीयता की उचित आलोचना भी इसी गर्व का हिस्सा है क्योंकि इसी से यह विवेक मिलता है कि हम इस परंपरा को ज्यादा और न्यायोन्मुख कैसे बना सकते हैं. कई बार इस परंपरा पर हमले होते हैं- बाहर से भी और भीतर से भी. लेकिन इससे यह परंपरा अप्रासंगिक नहीं हो जाती, उसके गुण सूत्र बेमानी नहीं हो जाते. लेकिन जब मेरे अपने ही लोग युद्ध उन्मत्त भाषा में अट्टहास करते दिखाई पड़ते हैं तो मुझे यह परंपरा खतरे में लगती है, लगता है, इसके गुण सूत्र बदलने की कोशिश की जा रही है, इस पर भी जानबूझ कर एक सर्जिकल स्ट्राइक की जा रही है, उसकी स्मृति को नष्ट किया जा रहा है.

मुझे क्षमा करें, सेना ने जो सर्जिकल स्ट्राइक की, उसके पीछे उसका अपना रणनीतिक तर्क है, उसकी उपादेयता देखना उसका काम है, लेकिन इस हमले को युद्धवादी उन्माद के साथ जश्न में बदलने वालों के साथ मैं नहीं खड़ा हो सकता. मेरी भारतीयता या देशप्रेम आपके सर्टिफिकेट के मोहताज नहीं.