अगर सब कुछ योजना मुताबिक रहा तो जयपुर स्मार्ट सिटी होने के अलावा तंत्र विद्या का अध्ययन केंद्र भी होगा. राजस्थान की मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे चाहती हैं कि लोग तंत्र विद्या की शक्ति से परिचित हों. उनकी योजना जयपुर के संस्कृत विश्वविद्यालय में तंत्र विद्या की पढ़ाई शुरू करवाने और इसके लिए काशी व उज्जैन से तंत्र विद्या के जानकारों को आमंत्रित करने की भी है. जयपुर में पिछले दिनों आयोजित वैदिक सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने ये बातें कहीं और आश्वासन भी दिया कि वे कोच्चि जाकर खुद उस संस्थान की जानकारी इकट्ठा करेंगी, जो (उनके मुताबिक) तंत्र विद्या की पढ़ाई कराने वाला भारत में इकलौता संस्थान है. वसुंधरा तंत्र विद्या को जादू-टोना कहे जाने का भी विरोध करती हैं. उनकी राय है कि तंत्र विद्या को टोना-टोटका बताना इसका स्तर नीचे गिराना है.

हालांकि मुख्यमंत्री की राय चाहे जो भी हो जहां तक आज की वैज्ञानिक पीढ़ी की बात है तो ये सभी कर्मकांड अंधविश्वास की बुनियाद पर खड़े हैं. समाज के प्रचलित अर्थों में इनमें कोई अंतर नहीं समझा जाता. इसके अलावा इनका इस्तेमाल करने वालों या इनसे प्रभावित लोगों की सोच में भी कोई अंतर नहीं है. ये सभी लोग पारलौकिक शक्तियों के सहारे लाभ की इच्छा रखते हैं. इसके साथ यह भी सही है कि कि इनमें से ज्यादातर लोग अनिश्चितता, विकल्पहीनता और लालच के शिकार होते हैं. दूसरी तरफ तंत्र विद्या या ऐसे तमाम कर्मकांडों या अंधविश्वासों को अध्यामिकता का भी हिस्सा नहीं माना जा सकता. अध्यात्मिकता में सांसारिक वस्तुओं से दूर हटने पर जोर होता है इसके विपरीत तंत्र विद्या या जादू-टोना का पूरा ढांचा भौतिक लक्ष्यों को पाने की उम्मीद पर केंद्रित होता है.

राजस्थान पहले से ही अंधविश्वास की चपेट में है

राजस्थान में अंधविश्वास और टोना-टोटका की जड़ें काफी गहरी हैं. इस बात का अंदाजा यूं लग सकता है कि डायन प्रथा पर रोक लगाने वाला कानून लागू होने के बाद से यहां महिलाओं को डायन घोषित करने के सात मामले आ चुके हैं. राजस्थान में यह कानून इसी साल जनवरी में लागू हुआ है. इसके तहत महिलाओं को डायन घोषित करने, लोगों को प्रेतबाधा मुक्त करने, झाड़-फूंक और टोना-टोटके पर रोक लगाई गई है और सजा का प्रावधान किया गया है. लेकिन, इसे लागू करने की स्थिति चिंताजनक है.

बीते महीने दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में भीलवाड़ा में आस्था के नाम पर अंधविश्वास और महिलाओं के उत्पीड़न की कहानी को दर्ज किया गया था. इसमें बताया गया था कि कैसे बंक्याराणी मंदिर में महिलाओं को गंदा जूता मुंह में दबाकर चलने और उसी जूते से गंदा पानी पीने को मजबूर किया जाता है.

यह मामला मीडिया में खूब उछला था लेकिन पुलिस ने इसपर कोई कार्रवाई नहीं की. अंधविश्वास आधारिक कर्मकांडों के खिलाफ काम करने वाली भीलवाड़ा की सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलूवालिया बताती हैं कि पुलिस ने खानापूर्ति करके इस मामले को रफा-दफा कर दिया है. वे जानकारी देती हैं कि रविवार के दिन यहां आने वाली महिलाओं की संख्या 300-400 तक पहुंच जाती है. उनके मुताबिक महिलाओं को डायन घोषित करने से लेकर और अन्य अंधविश्वासों को बुनियाद बनाकर महिलाओं को प्रताड़ित करने या शोषण करने में भोपाओं (स्थानीय तांत्रिकों) की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है. डायन प्रथा निवारण कानून में इनके खिलाफ सख्त प्रावधान होने के बावजूद पुलिस ने बंक्याराणी मंदिर मामले में भोपाओं पर कोई कार्रवाई नहीं की है.

इसी कड़ी में दौसा के बालाजी मंदिर को भी रखा जा सकता है. यहां प्रेतबाधा दूर करने के नाम पर लोगों को जंजीर से बांध कर रखा जाता है लेकिन पुलिस आस्था का मामला बताकर इसमें दखल देने से बचती है.

वसुंधरा राजे द्वारा तंत्र विद्या की पढ़ाई कराने के मुद्दे पर अहलूवालिया एक सवाल उठाती हैं कि आखिर तंत्र विद्या सीखेगा कौन? वैसे उनके सवाल में ही इसका जवाब है. जाहिर है कि अगर ऐसा कुछ होता है तो इसका सबसे पहला प्रभाव यह होगा कि घोषित रूप से भोपाओं या तांत्रिकों को औपचारिक मान्यता मिल जाएगी. अहलूवालिया के अनुसार जिस दौर में समाज में अंधविश्वास के सहारे आपराधिक घटनाएं हो रही हों, सूबे के ओहदेदारों की ओर से कर्मकांड को बढ़ावा देने की बात किया जाना चिंता पैदा करता है.

वसुंधरा राजे खुद भी तंत्र-मंत्र का सहारा लेती रही हैं

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के तंत्र-मंत्र मानने की बात किसी से छिपी नहीं है. कहा जाता है कि उन्होंने पिछले कार्यकाल में चुनाव से ठीक पहले तांत्रिक चंद्रास्वामी को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर तांत्रिक अनुष्ठान कराया था. हालांकि, यह अलग बात है कि उन्हें सत्ता में दोबारा आने के लिए पांच साल का इंतजार करना पड़ गया. पिछले साल ललित मोदी विवाद में नाम आने के बाद उन्होंने दतिया के पीतांबरा मंदिर में विशेष अनुष्ठान कराए थे. मध्य प्रदेश का यह मंदिर तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए काफी प्रसिद्ध है और यहां पहुंचने वाले नेताओं की सूची भी काफी लंबी है.

राजनेताओं का अंधविश्वास और तांत्रिकों से रिश्ता कोई नया नहीं है

तंत्र-मंत्र या अंधविश्वास के शिकार नेताओं में वसुंधरा राजे अकेली या पहली नहीं हैं. इस मामले में इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेता से लेकर नरसिम्हा राव और तर्कवादी माने जाने वाले नीतीश कुमार तक का नाम लिया जा सकता है. पुराने और नए नेताओं में फर्क बस इतना है कि अब नेता इन कामों को छिपाकर करने लगे हैं. पिछले साल विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक तांत्रिक से गुप्त मुलाकात की थी लेकिन तस्वीरें सामने आने पर यह मामला कई दिनों तक सुर्खियां बटोरता रहा.

राजनेताओं के तंत्र-मंत्र में यकीन ने उन्हें कितना लाभ पहुंचाया होगा इसका आकलन करना मुश्किल है, लेकिन इस पूरे खेल ने सत्ता में दखल देने वाले कई बाबाओं को जन्म जरूर दिया. इस लिहाज से धीरेंद्र ब्रह्मचारी और तांत्रिक चंद्रास्वामी के सामने सभी नए-पुराने बाबा-तांत्रिक फीके हैं.

धीरेंद्र ब्रह्मचारी का उदय

वरिष्ठ पत्रकार भवदीप कंग की किताब ‘गुरूज : स्टोरीज ऑफ इंडिया लीडिंग बाबाज’ में राजनेताओं और उनके गुरुओं पर विस्तार से चर्चा है. इस आधार पर धीरेंद्र ब्रह्मचारी को ऐसा पहला शख्स कहा जा सकता है, जिसने योग का सहारा लेकर पहले केंद्रीय सत्ता से नजदीकी बनाई और फिर उसे अपना साम्राज्य बनाने में इस्तेमाल किया. कंग ने लिखा है कि कभी धीरेंद्र ब्रह्मचारी के अंधविश्वासों का विरोध करने वाली इंदिरा गांधी बाद में खुद इनपर भरोसा करने लगी थीं. पुपुल जयकर की किताब ‘इंदिरा गांधी : ए बायोग्राफी’ के हवाले से उन्होंने लिखा है कि कैसे इंदिरा गांधी ने अपनी और अपने छोटे बेटे संजय की रक्षा के लिए जवाबी तांत्रिक अनुष्ठान कराए थे. इंदिरा गांधी के भीतर यह भय घर कर गया था कि उनके विरोधी उन्हें और उनके बेटे को खत्म करना चाहते हैं और इसके लिए तांत्रिक शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस आशंका ने तब और विस्तार ले लिया, जब संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मौत हो गई. कहा जाता है कि इसके बाद इंदिरा गांधी कर्मकाण्डों और इनसे जुड़े कई अंधविश्वास को ज्यादा मानने लगी थीं. वे गले में रुद्राक्ष की माला पहनने लगी थीं और अब देव स्थानों पर ज्यादा जाने लगी थीं.

तांत्रिक चंद्रास्वामी के सुपर प्राइममिनिस्टर से लेकर वैश्विक तांत्रिक बनने का सफर

धीरेंद्र ब्रह्मचारी के बाद तांत्रिक चंद्रास्वामी ने सत्ता को सबसे ज्यादा प्रभावित किया. उनके शागिर्दों में सभी दलों के तमाम नेताओं के अलावा नरसिम्हा राव और चंद्रशेखर जैसे दो प्रधानमंत्री भी शामिल रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के दौर में उनकी पहुंच इतनी बढ़ गई थी कि लोग उन्हें सुपर प्राइम-मिनिस्टर कहने लगे थे.

तांत्रिक चंद्रास्वामी का प्रभाव धीरे-धीरे विदेश में भी पहुंचा था. उनके शागिर्दों में ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थेचर, ब्रूनेई के सुल्तान मुदा हसन अल बोल्कियाह, सद्दाम हुसैन, बहरीन के खलीफ शेख इशा, जायरे के शासक सेसे सेको मोबुतू और हथियारों के दलाल अदनान खाशोगी तक शामिल थे.

जब थेचर भी चंद्रास्वामी के प्रभाव में आ गईं

मार्गेट थेचर के चंद्रास्वामी से प्रभावित होने की कहानी का जिक्र पूर्व विदेश मंत्री और ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त नटवर सिंह ने अपनी किताब ‘वॉकिंग विद लॉयंस - टेल्स फ्रॉम ए डिप्लोमेटिक पास्ट’ में भी किया है. उन्होंने लिखा है कि जब चंद्रास्वामी ने कंजर्वेटिव पार्टी की अध्यक्ष मार्ग्रेट थेचर और लॉर्ड लुईस माउंटबेटन से मुलाकात की व्यवस्था करने की बात कही तो वे आश्चर्य में पड़ गए. तत्कालीन विदेश मंत्री वाईबी चव्हाण की सिफारिश पर उन्होंने मुलाकात का इंतजाम किया. तब माउंटबेटन ने समय देने से इंकार कर दिया था लेकिन थेचर उनसे मिलने के लिए राजी हो गईं.

थेचर से मुलाकात होने पर चंद्रास्वामी ने अपनी पुरानी तरकीब दोहराई. थेचर से पर्ची पर सवाल लिखने और मोड़ देने के लिए कहा. थेचर ने ऐसा ही किया. इस किताब के मुताबिक चंद्रास्वामी ने बिना देखे पर्चियों पर लिखे सवालों के बारे में बता दिया. इस घटना से थेचर इतनी प्रभावित हुईं कि अगले दिन जब वे चंद्रास्वामी से मिलने पहुंची तो उनके कहे अनुसार लाल लिबास में थीं और उन्होंने चंद्रास्वामी की दी गई ताबीज को सही जगह पर पहन रखा था. चंद्रास्वामी ने उन्हें अगले तीन-चार साल में ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने की बात बताई थी, जो सही साबित हुई. हालांकि चंद्रास्वामी के सारे तांत्रिक प्रभावों और शक्तियों का सच यही रहा कि आखिरकार वे खुद को जेल जाने से नहीं बचा पाए. तत्कालीन प्रधानमंत्री राव के नाम पर ब्रिटेन में भारतीय मूल के कारोबारी लखूभाई पाठक से पैसे ऐंठने के मामले में उन्हें तिहाड़ जेल की हवा खानी पड़ी थी.

सिद्धारमैया जैसे नेता उम्मीद बंधाते हैं

जहां एक तरफ अंधविश्वासी नेताओं की भीड़ है तो वहीं सिद्धारमैया जैसे कुछ चंद नेता भी हैं, जो तर्कवादी समाज के लिए कोशिश करते दिखाई देते हैं. कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने के बाद सिद्धारमैया ने सबसे पहले चामराजनगर का दौरा किया ताकि लोगों का यह अंधविश्वास टूट सके कि यहां जाने वाले मुख्यमंत्रियों की कुर्सी चली जाती है. ऐसे ही भय की वजह से यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नोएडा आने से कतराते रहे हैं. नोएडा को लेकर भी चामराजनगर जैसा अंधविश्वास फैल हुआ है कि यहां जाने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी चली जाती है.

सिद्धारमैया कहते हैं कि अंधविश्वास, जाति-व्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक विभाजन सामाजिक बुराइयां हैं, जिन्हें दूर करना सबसे ज्यादा जरूरी है. उन्होंने विधानसभा में अंधविश्वास विरोधी विधेयक लाने की कोशिश की है लेकिन, मुख्य विपक्षी दल भाजपा और अपनी पार्टी के कुछ नेताओं के विरोध के चलते सफल नहीं हो पा रहे हैं. वे महाराष्ट्र की तर्ज पर अंधविश्वास विरोधी कानून का तीसरा मसौदा इसी जुलाई में पेश करना चाहते थे लेकिन विरोधियों के कारण ऐसा नहीं कर पाए.

सिद्धारमैया टीवी पर राशिफल बताने से लेकर चमत्कारिक दावे करने वाले कार्यक्रमों तक पर रोक लगाने की बात कह चुके हैं. हालांकि, राजनीतिक स्तर पर समर्थन न मिलने की वजह से वे सफल नहीं हो पाए हैं. कुल मिलाकर सिद्धारमैया और वसुंधरा राजे को समाज के दो छोर कहा जा सकता है, जहां एक तरफ तार्किक समाज बनाने का लक्ष्य है तो दूसरी तरफ तंत्र विद्या की पढ़ाई कराने की आकांक्षा.