इतिहास में यह धारणा रही है कि युद्ध कभी अपने किले बचाने तो कभी उन्हें और मजबूत करने के लिए लड़े जाते हैं. पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में की गई भारतीय कार्रवाई को प्रथम दृष्टया भले ही राष्ट्र की सुरक्षा और उरी हमले के बदले के तौर पर देखा जा रहा हो लेकिन यह केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के कुछ किले बचाती तो कुछ को मजबूत करती भी नजर आ रही है. इस जवाबी हमले के बाद उत्तर प्रदेश और पंजाब में भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं का उत्साह देखने लायक है. इस हमले से उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद नजर आने लगी है.

दरअसल, पठानकोट हमला, कश्मीर हिंसा और उरी हमले के बाद भाजपा की काफी किरकिरी हो रही थी. सोशल मीडिया से लेकर गली-गली में लोग भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं से सवाल करने लगे थे. सर्जिकल स्ट्राइक से एक दिन पहले ही मथुरा में एक जनसभा में इन मुद्दों को लेकर खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को बड़ी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था. बताया जाता है कि इस सभा की महीनों से तैयारी चल रही थी और इसे सफल बनाने के लिए 50 हजार लोगों को एकत्रित करने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन, सभा में आधे लोग भी नहीं जुट सके. इसके बाद जब अमित शाह भाषण देने आए तो कुछ देर सुनने के बाद लोग उनसे पाकिस्तान पर कुछ बोलने की मांग करने लगे. बताया जाता है इसके बाद भी जब शाह इस पर कुछ नहीं बोले तो जनता उनका भाषण बीच में छोड़कर जाने लगी.

जानकारों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह इस बात को अच्छे से समझ चुके थे कि पार्टी के अंदर और पूरे देश में उठती इन आवाजों को केवल पाकिस्तान पर पलटवार करके ही शांत किया जा सकता है.

एक अंग्रेजी वेबसाइट को नाम न छापने की शर्त पर एक बड़े भाजपा नेता बताते हैं कि पहले पठानकोट और उसके बाद उरी हमले की वजह से पार्टी नेताओं को कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा था. इन हमलों का जवाब न दे पाने की वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा थी. संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं की तरफ से सरकार पर लगातार पाकिस्तान पर कार्रवाई करने का दवाब बनाया जा रहा था. बताया जाता है कि हाल ही में केरल के कोझिकोड में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी अचानक किसी नेता ने अमित शाह से पूछ लिया कि पाकिस्तान पर कब कार्रवाई होगी. बताते हैं कि वे नेता जी ज्यादा कुछ बोलते उससे पहले ही पार्टी महासचिव राम लाल ने उन्हें रोककर स्थिति को संभाल लिया.

इसके अलावा विपक्षी पार्टियां खासकर उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और बसपा प्रमुख मायावती, उरी हमले के बाद से नरेंद्र मोदी को निशाना बना रहे थे. इसका पार्टी के कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े नेताओं तक के पास कोई जवाब नहीं था. जानकारों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इस बात को अच्छे से समझ चुके थे कि पार्टी के अंदर और पूरे देश में उठती इन आवाजों को केवल पाकिस्तान पर पलटवार करके ही शांत किया जा सकता है. ये लोग यह भी जानते थे कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो भाजपा और संघ कार्यकर्ता आगामी पांच राज्यों के चुनावों में बेमन से काम करेंगे जिसका नतीजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा.

पार्टी नेता बताते हैं कि पाकिस्तान पर कार्रवाई के बाद सरकार से लेकर संगठन तक सभी इस बात से सहमत हैं कि आने वाले राज्य के चुनावों में इसका भाजपा को लाभ मिल सकता है.

पार्टी नेता बताते हैं कि पाकिस्तान पर कार्रवाई के बाद सरकार से लेकर संगठन तक सभी इस बात से सहमत हैं कि आने वाले राज्य के चुनावों में इसका भाजपा को लाभ मिल सकता है. हालांकि, यह भी बताया जा रहा है कि अभी पार्टी नेताओं और प्रवक्ताओं को इस मुद्दे पर छाती न ठोंकने की हिदायत दी गई है. सर्जिकल स्ट्राइक के कुछ ही घंटों बाद अमित शाह और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सभी प्रवक्ताओं की बैठक बुलाई जिसमें सभी से इस मामले में कम और सोच-समझकर बोलने के लिए कहा गया. नेताओं से यह भी कहा गया है कि वे अभी इस मामले को केवल राष्ट्र की सुरक्षा से जोडकर कर ही बयान दें. दरअसल, पार्टी हाईकमान को आशंका है कि पाकिस्तान इस स्ट्राइक का जवाब देने की कोशिश जरूर करेगा और इसलिए अभी इस मामले पर छाती ठोंकने की जरूरत नहीं है. सही समय आने पर चुनावों में इसे जोर-शोर से उठाया जाएगा.

कुछ जानकार आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के बार-बार उकसाने पर भी स्ट्राइक के वीडियो या अन्य सबूत सामने न लाने को भी मोदी सरकार की रणनीति की तरह देख रहे हैं. इनका मानना है कि विपक्षी पार्टियां हमले के सबूत को लेकर जितना शोर मचाएंगी और भाजपा को बुरा-भला कहेंगीं, सबूत सामने आने पर पार्टी को उसका उतना ही ज्यादा फायदा होगा.

यूपी चुनाव में यह मुद्दा भाजपा की कई मुश्किलों को हल कर रहा है-

उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकारों का मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनावों को लेकर इस एक स्ट्राइक ने भाजपा के कई संकट दूर कर दिए हैं. सूबे में भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर है. वरुण गांधी और आदित्यनाथ जैसे पार्टी के कुछ बड़े नेता अपने आप को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश कर रहे हैं. आलम यह है कि कई बैठकों में माथापच्ची के बाद भी भाजपा यह तय नहीं कर पा रही है कि अखिलेश यादव जैसे युवा और मायावती जैसे गंभीर छवि के नेताओं के सामने वह किसे उतारे. पार्टी को डर इस बात का भी है कि मुख्यमंत्री का उम्मीदवार चुने जाने के बाद पार्टी के अंदर जबर्दस्त बिखराव की स्थिति पैदा हो सकती है.

लेकिन, अब पार्टी नेताओं का कहना है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पार्टी हाईकमान की यह समस्या दूर होती दिख रही है. इनका कहना है कि अब इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बजाए नरेंद्र मोदी की साहसिक, सशक्त और देशभक्त प्रधानमंत्री की छवि को आगे रखकर चुनाव लड़े.

बताया जाता है कि जहां अभी तक भाजपा केवल केंद्र सरकार के सुशासन और विकास के मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश के चुनाव में उतरने वाली थी. वहीं, अब इसमें तीसरा 'राष्ट्रवाद' का मुद्दा भी शामिल हो गया है.

इसके अलावा पार्टी की दूसरी सबसे बड़ी समस्या जातीय समीकरणों की थी. जहां उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा के जातीय समीकरण काफी मजबूत माने जाते हैं वहीँ राज्य में भाजपा के पास दलित, पिछड़ा या अन्य किसी वर्ग का कोई बड़ा नेता नहीं है. लेकिन, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि राष्ट्रवाद, देशभक्ति और पाकिस्तान विरोधी भावना जातीय समीकरण पर भारी पड़ेगी. बताया जाता है कि जहां अभी तक भाजपा केवल केंद्र सरकार के सुशासन और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाली थी. वहीं, अब इसमें तीसरा 'राष्ट्रवाद' का मुद्दा भी शामिल हो गया है.

हालांकि, इन कयासों से अलग राजनीतिक जानकार कहते हैं कि भाजपा को 1999 में कारगिल युद्ध में जीत के बाद हुए चुनाव को भी नहीं भूलना चाहिए. इनके मुताबिक, कारगिल युद्ध से पहले 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को उत्तर प्रदेश में 57 सीटें मिलीं थीं. लेकिन, इस युद्ध में जीत के बाद 1999 में हुए लोकसभा चुनावों में उसे प्रदेश में मात्र 29 सीटें ही मिल पाई थीं. हालांकि, इन चुनावों में बाकी राज्यों में भाजपा और सहयोगी दलों का प्रदर्शन सुधरा था और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की वापसी हुई थी.