बीती 28 सितंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने इलाहाबाद स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी भारत पंप एंड कम्प्रेसर में सरकारी हिस्सेदारी की ‘रणनीतिक बिक्री’ को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी. यह कम्पनी पेट्रोलियम, उर्वरक और रसायन उद्योग में काम आने वाले उपकरण बनाती है. करीब 12 साल के बाद केंद्र सरकार ने इस तरह का कोई फैसला किया है.

सरकार ने इस कम्पनी में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए ‘रणनीतिक बिक्री’ जैसी नरम शब्दावली का इस्तेमाल किया है. जबकि इस बिक्री का सीधा मतलब है कि सरकार इस कम्पनी में अपने मालिकाना हक और प्रबंधकीय नियंत्रण को निजी हाथों में सौंपने जा रही है. जिस दिन यह फैसला हुआ, उसी दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बीमार पड़ी एक और पीएसयू हिंदुस्तान केबल्स को बंद करने का निर्णय भी किया. इसके साथ ही एक आर्थिक पैकेज भी मंजूर किया गया ताकि कम्पनी बंद होने के बाद इसके कर्मचारियों को देने के लिए धन की व्यवस्था हो सके.

नरेंद्र मोदी की सरकार के इन फैसलों से किसी को ज्यादा अचरज नहीं हुआ. ऐसी संभावना तो पहले से ही थी कि वह अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार की तरह ही निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ेगी. अचरज तो इस बात का है कि सरकार ने इस प्रक्रिया को शुरू करने में इतना लंबा समय लिया. यहां यह याद रखना होगा कि अब तक मोदी सरकार अपना लगभग अाधा कार्यकाल (ढाई साल) पूरा कर चुकी है. यह देर शायद इसलिए हुई क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को बंद करने या उनके निजीकरण को लेकर सरकार के भीतर ही विरोध था. खास तौर पर उन मंत्रालयों का जिनके अधीन ये सरकारी कम्पनियां आती हैं.

निजीकरण की प्रक्रिया ने उन जगहों पर भी निजी आधिपत्य स्थापित कर दिया, जहां वह पहले नहीं था. मई 2002 में रिलायंस उद्योग समूह द्वारा किया गया भारतीय पेट्रोकेमिकल्स निगम का अधिग्रहण ऐसा ही एक उदाहरण है

भारतीय जनता पार्टी में कई लोग हैं जो मानते हैं कि निजीकरण ही वह रामबाण औषधि है जिसकी मदद से सरकार के मालिकाना हक वाले उपक्रमों की तमाम जटिल बीमारियों का इलाज हो सकता है. यह देश के भीतर ही नहीं पूरी दुनिया में तीखी वैचारिक बहस का मसला है. लेकिन निजीकरण के फायदों को लेकर ऐसा सरलीकृत नजरिया विकसित देशों के दक्षिणपंथी विचारकों तक ने खारिज कर दिया है. इनमें से कई अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से भी जुड़े हैं.

ऐसी दलील दी जाती रही है कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है. हालांकि भारत में सरकार भारत पर्यटन विकास निगम के जरिए होटल चला रही है और इससे पहले मॉडर्न बेकरी के जरिए डबलरोटियां, साइकिल निगम के मार्फत साइकिलें और हिन्दुस्तान मशीन टूल्स (एचएमटी) के माध्यम से कलाई घड़ियां तक बना और बेच चुकी है. भारत में निजीकरण से जुड़ी समस्याओं की जड़ें सरकारी कम्पनियों के किसी क्षेत्र विशेष में सक्रिय होने न होने से ज्यादा गहरी हैं. हमारे देश में निजीकरण आज एक ‘गंदा शब्द’ इसलिए बन गया, क्योंकि अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने इस दिशा में लगातार कई और बड़ी गलतियां कीं. खासकर उस दौर में जब अरुण शौरी विनिवेश मंत्री थे. इस बाबत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2004 में कहा भी था कि भाजपा ने निजीकरण को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तौर पर आगे बढ़ाया, आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए नहीं.

नीतियों और उनके क्रियान्वयन की ये खामियां आखिर थीं क्या? इनमें एक गड़बड़ तो यह थी कि निजीकरण की प्रक्रिया ने उन जगहों पर भी निजी आधिपत्य स्थापित कर दिया, जहां वह पहले नहीं था. मई 2002 में रिलायंस उद्योग समूह द्वारा किया गया भारतीय पेट्रोकेमिकल्स निगम का अधिग्रहण ऐसा ही एक उदाहरण है. फिर दूसरी गलती यह हुई कि सार्वजनिक संपत्ति का ठीक तरह से मूल्यांकन नहीं किया गया. इससे कुछ कम्पनियों को तुरंत ही मुनाफा कमाने का मौका मिल गया. इसकी एक मिसाल है मुंबई हवाई अड्‌डे के पास स्थित सेंटोर होटल की 2002 में हुई बिक्री. इस होटल को 115 करोड़ रुपए में बत्रा हॉस्पिटैलिटी ने खरीदा था. उसने चार महीने के भीतर ही इसे सहारा समूह को 147 करोड़ रुपए में बेच दिया. यानी इतने कम समय में उसने अपनी लागत का करीब-करीब एक तिहाई मुनाफा कमा लिया था.

ऐसी तमाम गड़बड़ियों के अलावा सार्वजनिक कम्पनियों की हिस्सेदारी बेचने से मिली रकम को कल्याणकारी कार्यों पर खर्च करने के काम में भी देरी हुई. बल्कि देरी क्या, इसकी अनदेखी की गई. इस रकम को शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रमिक कल्याण जैसे समाजहित के कामों पर बेहतर तरीके से खर्च किया जा सकता था. लेकिन इसके बजाय विनिवेश से मिली रकम एक ऐसे कोष - भारत का समेकित कोष या कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया - में डाल दी गई जिसका इस्तेमाल बजट घाटा कम करने और नेताओं तथा सरकारी बाबुओं की मोटी तनख्वाह का इंतजाम करने के लिए किया जाता है. उस वक्त सरकार ने जिस तरह से सार्वजनिक कम्पनियों की हिस्सेदारी बेची और उससे मिले पैसे को खपाया, उसने 1984 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थैचर पर की गई एक टिप्पणी की याद दिला दी. ऐसे ही मिलते-जुलते मसले पर ब्रिटिश विपक्षी दलों ने थैचर पर कटाक्ष किया था कि वे ‘अपने घर में काम करने वालों की तनख्वाह घर की कीमती चीजें बेचकर दे रही हैं.’

नीति आयोग ने घाटे में चल रहे 74 सार्वजनिक उपक्रमों में से 34 की पहचान की है, जिनकी हिस्सेदारी बेची जा सकती है. इनमें से भी 15 को बंद करने की सिफारिश आयोग ने की है

बहरहाल, एक लंबे समय के बाद नवंबर 2005 में सरकार ने एक ‘राष्ट्रीय निवेश कोष’ (एनआईएफ) बनाया. इसमें सार्वजनिक कम्पनियों में सरकारी हिस्सेदारी बेचने से मिली रकम रखी जानी थी. माना गया था कि इस कोष का प्रबंधन ऐसे पेशेवर तरीके से होगा कि उसमें जमा रकम पर लगातार मुनाफा मिलता रहे. इस रकम से होने वाली आय का तीन-चौथाई हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन पर खर्च होना था. बाकी से अन्य सरकारी कम्पनियों की पूंजीगत जरूरतें पूरी की जानी थीं. लेकिन इसी बीच 2008 में आर्थिक मंदी का दौर आ गया और अगले साल देश में जबर्दस्त सूखा पड़ा जिससे सरकार को एनआईएफ की रकम के इस्तेमाल की नीति में बदलाव करने की गुंजाइश मिल गई. अब वह और भी कई विकल्पों पर इस रकम का उपयोग कर सकती थी. इसके बाद फरवरी 2013 में इस कोष का पुनर्गठन किया गया. इससे सरकार अब मेट्रो रेल परियोजना और बैंकों तथा यूरेनियम कॉरपोरेशन जैसे सार्वजनिक उपक्रमों में भी इस कोष का पैसा लगा सकती है.

यह अभी स्पष्ट नहीं है कि केन्द्र की मौजूदा सरकार इस कोष को लेकर पुरानी नीति पर चलेगी या नहीं. यह भी साफ नहीं है कि कितने और कौन-कौन से सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी बेची जाएगी और कितने और कौन से बंद किए जाएंगे या उनका निजीकरण होगा. खबर है कि नीति आयोग ने घाटे में चल रहे 74 सार्वजनिक उपक्रमों में से 34 की पहचान की है, जिनकी हिस्सेदारी बेची जा सकती है. इनमें से भी 15 को आयोग ने बंद करने की सिफारिश की है क्योंकि इनकी हालत सुधारना संभव नहीं है. हालांकि जिन उपक्रमों को पटरी पर लाया जा सकता है, उनके निजीकरण की कोशिश का सरकार में ही विभिन्न स्तरों पर खासा विराेध भी हो रहा है.

पिछले कुछ साल से सरकार विनिवेश और निजीकरण के जरिए रकम जुटाने के अपने निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में सफल नहीं हो पा रही है. अभी 2015-16 में तय लक्ष्य से आधी रकम ही जुटाई जा सकी है. चालू वित्त वर्ष में सरकार ने उन उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर, जहां उसका हिस्सा 51 फीसदी से कम है, 36,000 करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा है. जबकि 20,500 करोड़ रुपए निजीकरण और सरकारी हिस्सेदारी की ‘रणनीतिक बिक्री’ से जुटाने का लक्ष्य है. यह लक्ष्य सरकार हासिल कर पाती है या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन निजीकरण के इस शोर में एक अहम और थोड़ा मुश्किल मुद्दा जरूर किनारे हो गया है. वह है सार्वजनिक क्षेत्र की कार्यशैली में सुधार का.