कुछ समय पहले राहुल गांधी के एक बयान को लेकर उन पर चल रहा मानहानि का मुकदमा चर्चा में आया था. जनवरी 2014 में दिए गए इस बयान में कांग्रेस उपाध्यक्ष ने दावा किया था कि महात्मा गांधी की हत्या के पीछे आरएसएस का हाथ था. इसके बाद आरएसएस कार्यकर्ता राजेश कुंते ने महाराष्ट्र के भिवंडी में उन पर मानहानि का मुकदमा ठोक दिया था.

यह मसला कई बार सर्वोच्च न्यायालय, महाराष्ट्र उच्च न्यायालय और भिवंडी की अदालत के बीच घूमता रहा. इनसे कभी राहुल को राहत मिली और कभी फटकार. राहुल गांधी इस मसले पर बार-बार अदालत के अंदर और बाहर अपने बयान बदलते रहे. आख़िरकार कुछ समय पहले राहुल ने कहा कि वे मानहानि का मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपने बयान पर कायम हैं.

महात्मा गांधी की हत्या एक राजनैतिक हत्या थी और वह भी उस शख्स की जिसे दुनिया अपनी सदी का सबसे महान नायक मानती है. किसी ऐसे शख्स की हत्या का प्रयास और अंततः ऐसा कर पाना किसी अकेले नाथूराम गोडसे या उसके कुछ साथियों के बूते की बात हो सकती है, सोचना जरा मुश्किल है. तो पहले यही समझा जाए कि कौन उनकी हत्या कर सकता था या करवा सकता था.

1- आज़ादी के वक़्त ऐसा कोई राजनेता नहीं था जिसे गांधी से कोई राजनैतिक प्रतिद्वंदता होती और उन्हें मरवाता. जोसफ लेलीवेल्ड ने अपनी किताब ‘ग्रेट सोल’ में लिखा है कि ‘1940 आते-आते इंडियन नेशनल कांग्रेस के लिए गांधी सिर्फ एक नेता बन कर रह गए थे. उनकी बातों को मानने की ज़िम्मेदारी से लगभग अन्य नेता मुक्त हो चुके थे. मीटिंगों में उन्हें अब कम सुना जाने लगा था और उनके आदर्श और विचार सिर्फ उन तक या उनके कुछ नज़दीकी लोगों तक ही सिमट कर रह गए थे.’

2- आज़ादी के बाद अंग्रेजों को भी गांधी को मारने से कुछ मिलने वाला नहीं था.

3- भारत के मुसलमान तो उनको मारने से रहे.

4- हां, विभाजन का मारा हुआ कोई हिंदू या मुसलमान शायद नासमझी में या बदले की भावना से इस हत्या को अंज़ाम दे सकता था. लेकिन नाथूराम तो शरणार्थी भी नहीं था.

5- इसके पीछे एक दृढ विचारधारा और बहुत मज़बूत संगठन हो सकता था जो उनकी विचारधारा से सहमत न हो. यह तर्क कुछ सही लगता है.

जनवरी, 1948 में गांधी जी की हत्या की दो कोशिशें हुई थीं. पहली बार एक पंजाबी शरणार्थी मदनलाल पाहवा ने 20 जनवरी को उन्हें मारने की साजिश की. दूसरी कोशिश 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे ने की थी जो सफल रही थी.

गांधी जी की हत्या के मामले में आठ आरोपित थे – नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किष्टैया, विनायक दामोदर सावरकर और दत्तात्रेय परचुरे. इस गुट का नौवां सदस्य दिगंबर रामचंद्र बडगे था जो सरकारी गवाह बन गया था. ये सब आरएसएस या हिंदू महासभा या हिंदू राष्ट्र दल से जुडे हुए थे. अदालत में दी गई बडगे की गवाही के आधार पर ही सावरकर का नाम इस मामले से जुड़ा था और गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा और आरएसएस पर प्रतिबंध लग गया था.

मुझे एक बात यहां बड़ी आश्चर्यजनक लगती है कि गांधी की हत्या के लगभग 28 दिन के अंदर सरदार वल्लभ भाई पटेल इस निष्कर्ष पर पहुच गए थे कि आरएसएस इस हत्या के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.

उन्होंने 27 फ़रवरी 1948 में नेहरू को पत्र लिखा था जिसका सार था कि आरएसएस नहीं, बल्कि विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व वाली हिंदू महासभा गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र की ज़िम्मेदार है. उन्होंने यह भी लिखा था कि ‘यह सत्य है कि आरएसएस और हिंदू महासभा ने गांधी की हत्या पर मिठाई बांटी थी क्योंकि ये दोनों संगठन उनके विचारों से असहमत थे. पर आरएसएस या हिंदू महासभा के किसी अन्य सदस्य का हाथ इसमें नहीं है.’ मतलब सावरकर और अन्य सात लोग जिनके नाम ऊपर लिखे गये हैं, उनके अलावा अन्य कोई महात्मा गांधी की हत्या का दोषी नहीं है.

सरदार पटेल तब उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री थे. हो सकता है उनके पास आंतरिक जानकारी हो इसलिए उनकी बात पर यकीन कर ही सकते हैं. उन्होंने आरएसएस पर ज़बर्दस्त प्रहार किया था, उसे प्रतिबंधित भी किया था. लेकिन बाद में हत्या के मुकदमे में फैसला आने से पहले ही प्रतिबंध को हटवा भी दिया था. 19 जुलाई 1949 को उन्होंने यह भी कहा कि ‘मैं खुद भी चाहता था कि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हट जाए और जिस दिन मुझे श्री गोलवलकर का पत्र मिला जिसमें उन्होंने आरएसएस के देशहित में काम करने का आश्वासन दिया था, मैंने उसी दिन यह फ़ैसला ले लिया.’

पटेल के दिल में संघ के लिए एक अलग स्थान था. एक बार उन्होंने यह भी कहा था कि वे ये मानते हैं कि आरएसएस ने हिंदू समाज की सेवा की है. पर आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने मुसलमानों पर हमले किये थे और आरएसएस के नेताओं के ज़हरीले भाषणों की वजह से देश का माहौल बिगड़ गया था. और कुछ हो न हो लेकिन बिगड़ा हुआ यह माहौल तो गांधी जी की हत्या के लिए जिम्मेदार था ही.

आरएसएस को सीधे तौर पर गांधी जी की हत्या से जोड़ने के लिए कुछ सवालों के जवाब मिलने जरूरी हैं: क्या नाथूराम गोडसे संघ का सदस्य था, जब उसने गांधी जी को मारा था? अगर था तो क्या उसका सक्रिय सदस्य था? और अगर सक्रिय सदस्य था तो क्या इतना महत्वपूर्ण था कि उसके द्वारा किये गये हर काम को संघ का किया मान लिया जाए? और अगर इतना महत्वपूर्ण नहीं था तो क्या उसे संघ के किसी इतने ही महत्वपूर्ण अंश ने ऐसा करने के लिए कहा था? यहां पर इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि संघ कोई सरकारी नौकरी देने वाली संस्था नहीं था जो खुद से जुड़ने से पहले किसी को कोई नियु्क्ति पत्र देता हो और अलग होने पर कोई उसे त्याग पत्र देता हो.

गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे और अन्य पर एकीकृत पंजाब और हरियाणा के न्यायालय में मुकदमा चला था. कोर्ट ने गोडसे और अन्य लोगों को आरएसएस का कार्यकर्ता भी माना था पर आरएसएस को इस हत्याकांड के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना. हालांकि इस पर गोपाल गोडसे का बयान काफी महत्वपूर्ण लगता है. गोपाल ने कहा था ‘मैं, नाथूराम और मेरे अन्य भाई सब आरएसएस से जुड़े हुए थे. हमारे लिए संघ परिवार के जैसा ही था. नाथूराम संघ का बौद्धिक कार्यवाह था.’ गोपाल ने आगे कहा है, ‘नाथूराम ने अपने वक्तव्य में कहा था कि उसने संघ छोड़ दिया था. उसने ऐसा इसलिए कहा था कि संघ और गोलवलकर गांधी की हत्या के बाद काफी मुश्किल में आ गए थे पर वास्तव में उसने संघ नहीं छोड़ा था.’ गोडसे को 15 नवंबर, 1949 में अंबाला जेल में फांसी दे दी गयी. हालांकि, गांधी के बेटों ने गोडसे को माफ़ करने की अपील की थी जिसे नकार दिया गया.

हत्या के अन्य आरोपी जब सज़ा काट कर छूटे तो उनके कुछ बयानों से देश में फिर हलचल मच गयी. लिहाज़ा नेहरू सरकार में गृह मंत्री गुलज़ारी लाल नंदा ने 1964 में ‘पाठक कमीशन’ बिठाया जो बाद में ‘कपूर कमीशन’ कहलाया. कमीशन ने हत्या के कारण पर लिखा है:

‘13 जनवरी 1948 को गांधी जी ने भारत सरकार द्वारा पकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने में देरी न करने के लिए और दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का माहौल बनाने के लिए उपवास की घोषणा कर दी. तीन दिन के बाद सरकार पाकिस्तान को पैसा देने के लिए राज़ी हो गयी और इस बात ने कुछ कट्टरवादी हिंदू संगठन, ख़ासकर हिंदू महासभा, के अंदर भयंकर आक्रोश भर दिया.’ आयोग ने आगे लिखा है कि जब गांधी ने पाकिस्तान से आये हिंदू शर्णार्थियों को मुसलमानों द्वारा खाली किये गए घरों में जाने से मना किया तो लोगों ने उनके खिलाफ बिरला हाउस के सामने प्रदर्शन किया. नारे भी लगे ‘मरता है तो मरने दो.’ गोपाल गोडसे ने भी बयान दिया था कि नाथूराम पकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने वाली बात से काफी नाराज़ हुआ था और इसके बाद ही उसने गांधी की हत्या का मन बना लिया था.

‘कपूर कमीशन’ ने लगभग 100 से ज्यादा लोगों के बयान लिए और तकरीबन 400 दस्तावेजों का हवाला दिया. भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को इंटरनेट पर डाल दिया है. कपूर आयोग के सामने बयान देने वालों में पूर्व गृह सचिव बनर्जी, प्यारे लाल, मोरारजी देसाई, सरदार पटेल की बेटी, मुंबई के तब के पुलिस कमिश्नर, दिल्ली पुलिस के आईजी आदि प्रमुख थे.

कपूर कमीशन ने यह भी कहा है कि दिल्ली के बाद पूना में हिंदू महासभा सबसे ज़्यादा सक्रिय था और हत्या में शामिल आठ लोगों में से तीन पूना से थे - गोडसे, आप्टे और बडगे. अन्य अलग जगहों से थे पर सबके एक ही नेता थे - विनायक दामोदर सावरकर.

‘कपूर कमीशन’ की रिपोर्ट ने दो तरफ इशारे किये थे. एक यह कि गांधी की सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर और ढीली थी और दूसरा, हिंदू महासभा, हिंदू राष्ट्र दाल( हिंदू महासभा की इकाई) और सावरकर इस हत्या में मुख्य रूप से ज़िम्मेदार थे. सावरकर के दो साथियों - उनके सुरक्षाकर्मी अप्पा रामचंद्र कसर और उनके सचिव विष्णु डामले - के बयानों ने उनकी गांधी हत्याकांड में भूमिका को काफी कुछ खोल के रख दिया था. और एक बात, आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 20 जनवरी को गांधी जी पर हुए हमले की जांच प्रकिया को भी त्रुटिपुर्ण माना है.

28 मई ,2016 को सत्याग्रह में एजाज़ अशरफ़ का लेख़, ‘सावरकर के आगे वीर लगाना कितना सही है?’ पब्लिश हुआ था, उनका लेख काफी मौलिक है और उसे इस संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए.

1948 में गांधी की सुरक्षा में कोताही के लिए कुछ लोगों ने सरदार पटेल पर भी उंगली उठाई थी. कहा गया कि उनकी हत्या के मामले में पटेल को पहले से बहुत कुछ मालूम था. तब गृह सचिव, बनर्जी ने बयान दिया कि गांधी के खिलाफ एक मूवमेंट तो था, पर उनकी हत्या का प्रयास किया जाएगा, यह मालूम नहीं था. पर यहां एक चूक हो गयी थी. मदनलाल पाहवा ने अपनी इंटेरोगेशन में एक बार कहा था ‘वह फिर आएगा’ पर उसकी इस बात को दिल्ली पुलिस ने गहराई से नहीं लिया.

इस तरह ख़ुद पर उठी उंगलियों से पटेल इतने आहत हुए थे कि उन्होंने नेहरू को अपने इस्तीफे की पेशकश भी की थी. हक़ीक़त यह है जब पटेल ने गांधीजी से कहा कि वे उनकी सुरक्षा बढ़ाने जा रहे हैं तो उन्होंने मना कर दिया और यह भी कह दिया कि प्रार्थना सभा में आने वालों की तलाशी न ली जाए. अगर पटेल ने गांधी की बात को दरकिनार कर दिया होता तो शायद इतिहास का रुख कुछ और ही होता. पटेल की गांधी में आस्था को आप चुनौती नहीं दे सकते. वे गांधी के अनन्य भक्त थे.

हाल ही में नाथूराम गोडसे और सावरकर के रिश्तेदार, सात्यकि सावरकर का बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नाथूराम को गांधीजी की हत्या का दोषी मानते हुए उसका बहिष्कार तो किया था पर उसे निष्कासित नहीं किया था.

चूंकि आरएसएस को गांधी जी की हत्या से जोड़ने के लिए जरूरी सवालों के जवाब हमें साफ-साफ नहीं मिलते इसलिए आरएसएस की गांधी हत्याकांड में भूमिका को सत्यापित कर पाना शायद संभव नहीं है. कम से कम अदालत में तो बिलकुल भी नहीं. लेकिन इसमें शक नहीं कि जिस विचारधारा को संघ बढ़ावा दे रहा था वह तो जिम्मेदार थी ही गांधी जी की हत्या के लिए और यह संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए गुरु गोलवलकर द्वारा पटेल को लिखे पत्र से भी जाहिर होता है. इसके अलावा जिस तरह से आज संघ परिवार कई छोटे-बड़े संगठनों का पितृसंगठन है उसी तरह से गांधी जी की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों और संगठनों को पूरी तरह से उससे अलग करना शायद तब भी संभव नहीं था.

चलते- चलते

नाथूराम गोडसे का नामकरण काफी दिलचस्प है. उसके जन्म पर किसी पंडित ने उसके मां-बाप को सलाह दी थी कि उसे लड़कियों की तरह पाला जाए वरना वह बचेगा नहीं. इस वजह से नाथूराम की परवरिश लड़कियों की तरह की गई. ऐसा करते समय उसे नाक में नथ भी पहनाई गई जिसकी वजह से उसका नाम नाथूराम हो गया.

इसे संयोग कहें या विडंबना, महाभारत में भीष्म को ‘पितामह’ कहा गया है और भारत ने गांधी को अपना ‘राष्ट्रपिता’ माना है. दोनों ही अपने-अपने काल में अंततः असहाय हो गए थे. जिस तरह भीष्म को मारने के लिए शिखंडी का इस्तेमाल किया गया था, क्या उसी तरह गांधी को मारने वाली सोच ने लडकियों की तरह पले हुए नाथूराम का इस्तेमाल किया था?