बीकानेर में हमारे बिलकुल पास वाले घर में श्याम भाई जी का परिवार था. इस परिवार में श्याम भाई जी की पत्नी सुगना भौजाई, उनकी बड़ी बेटी रंजू, छोटी कक्कू और तीन बेटे जीतू, शंभू और शिव थे. मुझे उनके बारे में जो विशेष जानकारी थी वो यह कि भौजाई किसी ठाकुर साहब के बेटे के दहेज में एक गांव से बीकानेर आई थीं और यहां उनकी शादी श्याम भाई जी से कर दी गयी थी. भाई जी सरकारी प्रेस में काम करते थे. जीतू सिंह मुझसे कोई एक साल छोटा था और रंजू मुझसे दो-तीन साल बड़ी थी. मेरी उम्र उस समय करीब 13-14 साल थी. छुटपन से ही मैं और मेरे ताऊ जी के बच्चे रंजू और जीतू के साथ मिलकर खेला करते थे.

हमारे साथ खेलने पर आम दिनों में कोई मनाही नहीं थी. हमारे घरों में एक परिवार की ही तरह आना-जाना था. सुगना भौजी भी बहुत स्नेही थीं. वे खुद सिलाई मशीन चला कर कपड़े सीती थीं. घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे सो अक्सर मेरी मां के पास आकर कभी एक कटोरी चीनी ले जाती थीं और कभी एक कटोरी मिर्चे जिन्हें वे अक्सर लौटा भी देती थीं. उनके पीहर के लोग यानी भाई-बहन अकसर उनके यहां ही पड़े रहते थे. सुगना भौजी चाय की बड़ी शौक़ीन थीं दिन में कई बार उन्हें चाय चाहिए होती थी. उनके शौक के चलते सबकी मौज थी. घर में गाय होते हुए भी बेचने के बाद इतना दूध नहीं बचता था कि हर बार चाय में डाला जा सके इसलिए अक्सर काली चाय ही पी जाती थी. मैं उनके घर रंजू और जीतू के साथ खेलने के लिए जाता तो कभी मैं भी उनके यहां काली चाय पी लेता. कभी खाना भी खा लेता. इस पर न मेरे घर के लोग ध्यान देते न उनके घर के.

मेरा हमेशा उनके घर जाना और खाना-पीना हमेशा इतना ही आसान नहीं होता था. कभी अचानक न जाने क्या होता कि उस घर का माहौल ही बदल जाता था. ऐसे किसी दिन अगर मैं वहां जाता तो मुझे किसी न किसी बहाने से मेरे घर भेज दिया जाता था और उनका छोटा सा घर एक किले में तब्दील हो जाता था. मैं जीतू से पूछता कि क्या हुआ तो बस वह एक ही जवाब देता था 'बन्ना आ रहे हैं.' मुझे कुछ समझ नहीं आता था कि ये बन्ना आखिर कौन हैं और उनके आने पर हम सबको वहां से क्यों हटा दिया जाता है? मैं इस उलझन में होता कि अगर कोई आ भी रहा है तो हम वहां क्यों नहीं रह सकते? तभी पता लगता कि घर की साफ़-सफाई हो रही है, गर्मियों के मौसम में छत पर छिड़काव करके कुछ लोगों के बैठने का इंतज़ाम किया जाता और सर्दियों में कमरों को धो कर कोयले की कई सिगड़ियों को जला कर उन्हें गरम करने का इंतजाम किया जाता.

घर के सब लोग ही नहीं, भौजाई के रिश्तेदार भी न जाने किन-किन इंतजामों में व्यस्त हो जाते थे. मेरी कोशिश यह रहती थी कि मैं भी उनके इंतजामो में उनकी मदद करूं और इस बहाने वहां टिक सकूं. कभी इस बहाने से तो कभी छुप-छुपाकर मुझे वहां थोड़ी देर रहने को मिल भी जाता था लेकिन जैसे ही किसी का ध्यान मेरी तरफ जाता फौरन मुझे मेरे घर रवाना कर दिया जाता.

मेरा हमेशा उनके घर जाना और खाना-पीना हमेशा आसान नहीं होता था. कभी अचानक न जाने क्या होता कि उस घर का माहौल ही बदल जाता था. ऐसे किसी दिन मुझे तुरंत मेरे घर भेज दिया जाता था और उनका छोटा सा घर एक किले में तब्दील हो जाता था

मैंने एक बार भौजाई से पूछ भी लिया कि मैं यहां क्यों नहीं रह सकता? कौन हैं ये बन्ना और उनके आने का नाम आते ही मुझे घर क्यों भेज दिया जाता है? उन्होंने कामों के बोझ से झुकी अपनी गर्दन उठाई और एक लंबी सांस भर कर बोलीं, 'महेंदर जी अभी आप बच्चा हो. कुछ बरस बाद आपने समझ आवेला. अभी आप जाओ.' मैं वहां से चला तो आया लेकिन मुझे सब बड़ा रहस्यमय लग रहा था. हर तरफ साफ-सफाई, साफ बिस्तर, हलकी-हलकी रौशनी. पूरा घर एक अलग तरह के रूमानी रंग में रंगा हुआ. यह सब मुझे उस वक्त अजीब भी लगता था और आकर्षक भी. मुझे यह सब कुछ तब तक समझ नहीं आया जब तक कि थोड़ा और बड़े होने के बाद मैंने आचार्य चतुरसेन की ‘गोली’ और यादवेन्द्र शर्मा चंद्र की कृति ‘जनानी ड्योढी’ नहीं पढीं. तब मुझे पता लगा कि सुगना भौजी बन्ना के दहेज में आई थीं और श्याम भाईजी से ज्यादा बन्ना का उन पर अधिकार था. क्या पता था कि मेरे पड़ोसी, मेरे दोस्त एक दिन मुझे किताबों के पात्रों के रूप में फिर मिलेंगे!

उस दिन भाई जी बकरे का ढेर सारा मांस खरीद कर लाते. एक बड़े से देग में मांस उबालने को चढ़ा दिया जाता और भौजाई के सारे रिश्तेदार लहसुन छीलने और प्याज काटने में लग जाते. फिर मांस पकाने का सिलसिला शुरू होता. लहसुन-प्याज भुनने की गंध पूरे मोहल्ले में फैल जाती. भाई जी कई तरह की बोतलें लेकर आते जिनमे शराब होती थी. सर्दियों में जब ये सब कार्यवाहियां होती थीं तो मुझे देखने का कोई मौक़ा मुश्किल से ही मिलता था लेकिन गर्मियों में जब सारा इंतजाम छत पर होता था तो अपनी छत से छुपकर देखने का मौक़ा मिल जाता था.

एक ऐसा ही दिन था. मैं भौजाई के घर खेल रहा था. भौजाई की एक बहन सिलाई मशीन चला रही थी और भौजाई की कुशल उंगलियां भी कपड़ों पर अपनी कारीगरी को अंजाम दे रही थीं. तभी एक बड़ी बड़ी मूछों वाला आदमी घर के आगे साइकिल से उतरा. घर का दरवाजा खुला ही रहता था, भौजाई की बहन ने कहा, 'सुगना, खवास जी आया है.'

भौजाई हाथ का काम छोड़कर उठ खड़ी हुई और बोली 'पधारो खवास जी, काई हुकुम है?' खवास जी ने जेब में से कुछ नोट निकाल कर देते हुए कहा 'शाम ने सवारी पधारसी...ऐ रुपिया राखो, सारो इंतजाम कर राख्या.' मैंने देखा यह सुनते ही भौजाई के चेहरे पर कुछ चिंता की लकीरें उभरीं. उन्होंने संभलते हुए वो रुपये अपनी बहन के हाथ में देकर कहा, 'ले बहनडी, करवा सारो इंतजाम.' और बस उसी पल चारों तरफ भाग-दौड़ मच गयी.

भौजी से वजह पूछने पर उन्होंने कामों के बोझ से झुकी अपनी गर्दन उठाई और एक लंबी सांस भर कर बोलीं, 'महेंदर जी अभी आप बच्चा हो. कुछ बरस बाद आपने समझ आवेला. अभी आप जाओ

इंतजाम में वही साफ़-सफाई, छत पर छिड़काव, पीतल के जग और गिलासों की धुलाई. ऊपर छत पर गद्दे और गाव तकिये पहुंचाए जाने लगे. मैं भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबकी मदद करने की कोशिश कर रहा था कि भौजाई की आवाज़ आई, 'महेंदर जी अबे आप घरे पधारो, काल फेर आया.' मैंने कहा, 'पण भौजाई...' इस पर भौजाई बोलीं, 'आप समझदार बच्चा हो नी, जाओ... पधारो, चाओ तो जीतू नै भी ले जाओ साथै.' अब कोई रास्ता नहीं था मेरे सामने. मैं जीतू को साथ लेकर घर आ गया, लेकिन मेरे कान बराबर भौजाई के घर की तरफ ही लगे हुए थे. शाम में भी खूब गहमागहमी थी दीवार के उस पार.

धीरे-धीरे शाम रात में तब्दील होने लगी. मैंने और जीतू ने खाना खा लिया था और मेरे घर में सन्नाटा पसरने लगा था. घर के सभी लोग सो चुके थे. जीतू भी मेरे पास ही बिस्तर पर गहरी नींद में सो चुका था मगर उस दिन मेरी आंखों की नींद न जाने कहां उड़ गयी थी. थोड़ी देर में ही मुझे पड़ोस से गाने की आवाज़ सुनाई दी. संगीत में शुरू से ही मुझे रूचि थी इसलिए पहले तो मैं थोड़ी देर तक गाना सुनता रहा. फिर उत्सुकता हुई कि आखिर ये कौन गा रहा है तो मैं चुपके से उठकर दीवार के ऊपर से झांक कर देखने लगा.

मैंने देखा, सुगना भौजी की छत पर कुछ लोग अधलेटे से बैठे हुए हैं और सबकी हाथों में पीतल के गिलास हैं. एक ढोली, ढोलक बजाते हुए गा रहा था, 'भर ला ए कलाली दारू दाखां रो, पीवण आळो लाखां रो...' तभी बीच में बैठा एक आदमी बोल उठा, 'वाह वाह...' उसे देखते ही मुझे समझ आ गया, यही है बन्ना. लकदक करते कपडे और ढेर सारे गहने पहने हुए बन्ना बाकी सबसे अलग ही नज़र आ रहे थे. दो क्षण रुककर बन्ना बोल उठे, 'अरे सुगना, तू भी गा साथै.' भौजी ने झुक कर मुजरा किया और ढोली के सुर में सुर मिला दिया. गीत की मिठास अचानक दस गुना हो गई. पूरा माहौल संगीतमय हो उठा.

शाम से रात हुई और तब मुझे पड़ोस से गाने की आवाज़ सुनाई दी. पहले तो मैं थोड़ी देर तक गाना सुनता रहा. फिर उत्सुकता हुई कि आखिर ये कौन गा रहा है तो मैं चुपके से उठकर दीवार के ऊपर से झांक कर देखने लगा

बन्ना ने एक घूंट लिया और कहा, 'वाह सुगना वाह... तू अठे क्यूं रहवे ? म्हारे महलां में चाल.' भौजी मानो निहाल हो गई और बोली, 'हुकुम, पगां री जूती ने पगां में ही रहण दो बन्ना.' बन्ना ने अपने पास पड़ी थैली में से कुछ सिक्के निकालकर उछाल दिए.

बन्ना बोले, 'गिलास खाली हुगी.' सुगना भौजी ने आगे बढ़कर उनके गिलास में शराब उंडेली तो मस्त हुए बन्ना ने आगे बढ़कर सुगना भौजी की ओढ़नी नोंच कर फेंक दी .

मैंने देखा छत की सीढ़ियों में बोतल हाथ में लेकर आते हुए भाई जी वहीं रुक गए लेकिन बन्ना ने शायद उन्हें देख लिया था. आवाज ऊंची करके बोले, 'अरे आजा गोलिए, रुक क्यों गयो?'

भाई जी चुपचाप ऊपर आये और बोतल सुगना भौजी के सामने रखकर मुड़ गए. बन्ना का मुंह फिर खुला, 'अरे गोला, आ लुगाई कोनी, म्हारे दहेज में आयोडी चीज है, पूरो अधिकार है म्हारो ई रे ऊपर.'

भाई जी नीची नज़रें किये बोले, 'हुकुम बन्ना' और वहीं नज़रें नीची किये खड़े हो गए.

बन्ना को पता नहीं क्या सूझा, बोले, 'दो गिलास में दारू भर, एक तू ले अर एक सुगना ने दे.'

भाई जी ने दो गिलास उठाये दोनों में दारू भरी एक नजरें नीची किये ही सुगना भौजी को पकड़ाई और दूसरी खुद लेकर खड़े हो गए.

दो लोगों ने भाई जी को उठा कर दूसरी छत पर ले जाकर पटक दिया. अब वहां 7-8 पुरुष थे और उनके बीच नशे में धुत सुगना भौजी थी. ढोली गाये जा रहा था  मेरे लिए सुगना भौजी का यह रूप एकदम नया था. मैं एकदम दम साधे सब देख रहा था

बन्ना फिर बोले, 'गट-गट पी जाओ दोनूं.'

क्या मजाल थी कि बन्ना की बात टालें वो, एक घूंट में दोनों ने गिलास खाली कर दिए.

बन्ना फिर गरजे, 'फेर भरो'

दोनों ने फिर गिलास भरे.

'पी जाओ गट गट.'

गिलास फिर खाली हो गए.

यह दौर कई बार चला. अब दारू अपना असर दिखाने लगी थी और सुगना भौजी लड़खड़ाने लगी थी.

तभी अचानक बन्ना अपने साथियों से बोले, 'अरे एक किनारे फेंको रे गोले ने.'

दो लोगों ने भाई जी को उठा कर दूसरी छत पर ले जाकर पटक दिया. अब वहां 7-8 पुरुष थे और उनके बीच नशे में धुत सुगना भौजी थी. ढोली गाये जा रहा था, 'पियो पियो सा बन्ना...' मेरे लिए सुगना भौजी का यह रूप एकदम नया था. मैं एकदम दम साधे सब देख रहा था. मुझे डर भी लग रहा था कि अगर मेरे घर में से कोई जाग गया और मुझे यह सब देखते हुए पकड़ लिया तो क्या होगा? लेकिन बहुत चाहकर भी मैं वहां से हट नहीं पा रहा था. हर अगले पल वह हो रहा था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. इधर घूमकर देखा कि जीतू गहरी नींद में सोया हुआ था इस बात से बेखबर कि उसके घर में क्या हो रहा है.

मैं यही सब कुछ सोच रहा था कि अचानक बन्ना की आवाज़ मेरे कानों में गूंजी, 'अरे सुगनकी! थारी छोरियां कठे है? बुला तो...'

सुगना भौजी का जैसे सारा नशा उतर गया. बोली, 'हुकुम अन्नदाता, टाबर (बच्ची) हैं छोरियां तो.'

बन्ना का पारा जैसे सातवें आसमान पर चढ गया. मां-बहन की दो तीन भद्दी गालियां दीं और गुर्राए, 'गोली री औलाद अर बच्ची? जा ले र आ बीने...'

मरे-मरे कदमों से सुगना भौजी नीचे गयी और थोड़ी देर में रंजू को लेकर लौट आई.

रंजू जो मेरे साथ खेलती-कूदती बड़ी हुई थी उसके साथ ऐसा व्यवहार तिस पर उसका इस तरह धड़ाम से नीचे गिरना पहले तो मुझे चौंका गया लेकिन जो झकझोर दे वह होना अभी बाकी था.

उसे देखते ही बन्ना ठहाका मार कर हंस पड़े और भौजाई को एक ओर धक्का मारते हुए बोले, 'मर! तू परे हट! तू अठे आ छोरी... ला गिलास भर.' सुगना भौजी पीछे हट गई और रंजू को आगे कर दिया. मैं दूर से ही यह देख पा रहा था कि उस वक़्त रंजू के हाथ कांप रहे थे. उसने कांपते हाथों से गिलास भरा और बन्ना के आगे बढ़ा दिया. बन्ना ने एक बार फिर ठहाका लगाया और उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया. दुबली-पतली रंजू धम्म से नीचे आ गिरी. रंजू जो मेरे साथ खेलती-कूदती बड़ी हुई थी उसके साथ ऐसा व्यवहार तिस पर उसका इस तरह धड़ाम से नीचे गिरना पहले तो मुझे चौंका गया लेकिन जो झकझोर दे वह होना अभी बाकी था.

बन्ना ने बैठे-बैठे ही छत के फर्श पर गिरी हुई रंजू के एक लात जमाई और चिल्लाये, 'तू जाणे है नी कि तू म्हारी रियाया है?' मैंने देखा रंजू का चेहरा सफ़ेद हो गया था, वो अपनी घबराहट पर काबू करते हुए बोली, 'खम्मा अन्नदाता.' नशे में धुत हुए बन्ना बड़बड़ाए, 'अन्नदाता री बच्ची! अठीनै मर...'

लगता था जैसे दुबली-पतली रंजू के पैर मन भर के हो गए थे. बड़ी मुश्किल से वो छोटे-छोटे कदम भरती बन्ना के करीब पहुंची. अचानक बन्ना का हाथ आगे बढ़ा और... उस हाथ ने... एक झटके से रंजू की कुर्ती नोंच ली...एक तरफ जर्र से कुर्ती के फटने की जोरदार आवाज आई और दूसरी ओर पूरे वातावरण को चीरती रंजू की एक चीख गूंज गयी. वह कलेजा चीरने वाली चीख आज भी जब मेरी यादों से गुजरती है तो भीतर एक चुभन सी पैदा कर जाती है.

कभी-कभी लगता है काश मैं उस रात वह सब देख न रहा होता. शायद इसीलिए बच्चों को ताकझांक करने पर डांट लगाई जाती है. मेरी इस हिमाकत ने मुझे मेरी जिंदगी की सबसे बुरी याद दी है.


( रेडियो में 40 वर्षों से ज्यादा का अनुभव रखने वाले महेंद्र मोदी विविध भारती मुंबई के केंद्र निदेशक रह चुके हैं और मुंबई में ही रहते हैं )