2016 का शांति का नोबेल पुरस्कार कोलंबिया के राष्ट्रपति जुआन मैनुअल सांतोस को दिया गया है. उन्हें यह सम्मान उन कोशिशों के लिए दिया गया है जिनके चलते कोलंबिया में 50 साल से चल रहा गृहयुद्ध खत्म हुआ. सरकार और वामपंथी फार्क विद्रोहियों के बीच के इस टकराव में ढाई लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और लगभग 60 लाख से भी ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है. नोबेल समिति ने फार्क विद्रोहियों के साथ बीते महीने किए गए शांति समझौते के लिए सांतोस के प्रयासों की काफी सराहना की है.

लेकिन एक वर्ग सांतोस को शांति का नोबेल मिलने पर सवाल भी उठा रहा है. उसका तर्क है कि कोलंबिया के राष्ट्रपति का अतीत देखते हुए उन्हें शांति दूत नहीं कहा जा सकता. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2008 में रक्षा मंत्री रहते हुए सांतोस पड़ोसी देश इक्वाडोर को बिना बताए वहां चल रहे फार्क के कैंपों पर बम बरसा चुके हैं. इक्वाडोर ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया था और इस घटना के चलते दोनों देशों के बीच काफी तनाव भी हो गया था. यही नहीं, सांतोस के रक्षामंत्री रहने के दौरान सेना पर आरोप लगा था कि आम नागरिकों को विद्रोही बताकर मारा जा रहा है ताकि ढेर किए गए बागियों की संख्या बढ़ाकर दिखाई जा सके.

वैसे यह पहली बार नहीं है जब शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाली कोई हस्ती सराहना के साथ सवालों के घेरे में भी हो. इस पुरस्कार के अतीत में जाने पर ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं.

हेनरी किसिंजर

हेनरी किसिंजर को 1973 में उत्तरी वियतनाम के नेता ली ड्यूक थो के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था. उस समय किसिंजर अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की सरकार में गृहमंत्री थे. नोबेल समिति ने दोनों नेताओं को 1970 के दशक में वियतनाम युद्ध के दौरान संघर्ष विराम कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के चलते इस सम्मान के लिए चुना था.

यहां तक तो सब कुछ ठीक ठाक था लेकिन, विवाद पुरस्कार की घोषणा होने के बाद सामने आया. ड्यूक थो ने पुरस्कार यह कहकर लेने से इनकार कर दिया कि दक्षिणी वियतनाम में स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है और अभी काफी काम किया जाना बाकी है. दूसरी ओर, किसिंजर के आलोचकों ने उन पर कंबोडिया में कारपेट बॉम्बिंग (विमान से एक साथ बड़ी संख्या में बम गिराना) का आरोप लगाया. 1973 में अमेरिका द्वारा दक्षिण अमेरिकी देशों के तानाशाह शासकों को भी वामपंथ विरोधी ऑपरेशन कॉन्डोर चलाने के लिए हथियार दिए जाने जाने की बात सामने आई थी. कहा जाता है कि इस अभियान में हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा गया. विवाद उठने के बाद किसिंजर पुरस्कार लेने ओस्लो (नार्वे) गए ही नहीं.

बराक ओबामा

बराक ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था. राष्ट्रपति बनने के एक साल के भीतर ओबामा को शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना एक बड़े वर्ग के लिए अचरज का विषय था. कइयों ने कहा भी कि यह मजाक जैसा है क्योंकि ओबामा एक ऐसे देश के राष्ट्रपति हैं जिसने अफगानिस्तान में लड़ाई छेड़ी हुई है. इससे खुद नोबेल समिति की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो गया. कई लोगों ने समिति पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और इस निर्णय को राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बताया. बाद में 1990 से 2015 तक नोबेल समिति के सचिव रहे गेर लूनेश्टा ने कहा कि ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार देने का फ़ैसला समिति की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. लूनेश्टा के मुताबिक समिति को उम्मीद थी कि इस पुरस्कार से अमेरिका में ओबामा की छवि सुधरेगी लेकिन, इसके उलट अमेरिका में ही इस फैसले की निंदा हुई. लूनेश्टा के मुताबिक खुद ओबामा ने कहा था कि वे पुरस्कार मिलने से हैरान हैं. उनके कुछ समर्थकों ने भी सोचा था कि शायद कोई गलती हुई है.

ओबामा को शांति पुरस्कार दिए जाने के कुछ ही दिनों बाद कई लोगों ने यह मांग करनी शुरु कर दी थी कि उन्हें पुरस्कार लौटा देना चाहिए. बताया जाता है कि एकबारगी ओबामा ने किसिंजर की तरह ही ओस्लो न जाने के बारे में सोचा था. लेकिन आखिर में वे गए. नोबेल पुरस्कार लेते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध कभी-कभी जरूरी हो जाता है.

अल गोर

अमेरिका के अल्बर्ट गोर को साल 2007 में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम करने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया. यह फैसला भी काफी आलोचना का सबब बना.

अल गोर का विरोध करने वालों का मानना था कि वे दुनिया को तो पर्यावरण संरक्षण का उपदेश देते हैं लेकिन, खुद उसके उलट चलते हैं. इस आरोप का आधार 2006 में उनके घर का बिजली का बिल था. दुनिया को ऊर्जा का किफायत से इस्तेमाल करने का उपदेश देने वाले अल गोर खुद 20 कमरों वाले घर में रहते थे जिसमें मौजूद सुविधाओं पर एक औसत घर से 20 गुना अधिक बिजली की खपत होती थी.

यासिर अराफात

पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण नेताओं में शुमार यासिर अराफात तीन दशक तक फिलीस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (पीएलओ) के प्रमुख थे. 1994 में इजरायली प्रधानमंत्री इत्जहाक राबिन और उनकी सरकार में विदेश मंत्री शिमोन पेरेज के साथ उन्हें संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान किया गया था. इन तीनों को इजरायल और फिलीस्तीन के बीच शांति और भाईचारा स्थापित करने के लिए हुए ओस्लो समझौते में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए यह सम्मान मिला.

अराफात को भी शांति का नोबेल दिए जाने के फैसले की खासी आलोचना हुई थी. अराफात के समर्थक उनकी तुलना दक्षिण अफ्रीकी नेता नेल्सन मंडेला से करने लगे थे तो दूसरी तरफ एक वर्ग का कहना था कि लंबे समय तक हिंसा के रास्ते पर चले अराफात किसी आतंकवादी जैसे ही हैं. इसके अलावा उनपर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे.

वांगरी मथाई

2004 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने वालीं केन्या की वांगरी मथाई पहली अफ्रीकी महिला थीं जिन्हें इस सम्मान के लिए चुना गया था. पर्यावरणविद, नारीवादी और मानवाधिकार कार्यकर्ता मथाई को यह पुरस्कार बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने और महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए दिया गया था.

लेकिन ओस्लो में जिस दिन उन्हें पुरस्कार मिलना था उसके ठीक एक दिन पहले एक अफ्रीकी अखबार में छपी खबर से विवाद पैदा हो गया. खबर के मुताबिक मथाई ने एक कार्यक्रम में एड्स को जैविक हथियार बताते हुए इस बीमारी के पीछे कुछ शैतानी दिमाग वाले वैज्ञानिकों का हाथ होने की बात कही थी. खबर के मुताबिक मथाई का मानना था कि ऐसे लोगों का उद्देश्य इस बीमारी के जरिए अफ्रीकी लोगों को अपने नियंत्रण में रखना है. बाद में मथाई ने सफाई दी कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था और न ही वे ऐसा मानती हैं.

कोर्डेल हॉल

कोर्डेल हॉल की गिनती अमेरिका के बड़े राजनेताओं में होती है. उन्हें संयुक्त राष्ट्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए साल 1945 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया था. वे भी विवादित नोबेल शांति पुरस्कार विजेताओं की सूची में शामिल हैं. 1939 में कोर्डेल हॉल फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट की सरकार में गृहमंत्री थे. विवाद का लेना-देना इसी दौरान हुई एक घटना से है.

दरअसल जर्मनी के 950 यहूदी जर्मन सरकार के उत्पीड़न से त्रस्त होकर अमेरिका में शरण लेना चाहते थे. वे सभी एक जहाज पर सवार होकर अमेरिका पहुंचे. बंदरगाह में खड़े ये यहूदी अमेरिकी सरकार के फैसले का इंतजार कर रहे थे. राष्ट्रपति रूजवेल्ट इन लोगों को शरण देने के लिए तैयार थे. लेकिन हॉल सहित कई डेमोक्रेट्स ने इसका विरोध किया. उन्होंने रूजवेल्ट को धमकी दी कि यदि उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाया तो वे उनसे समर्थन वापस ले लेंगे. इससे रूजवेल्ट दबाव में आ गए और जहाज को जर्मनी वापस लौटा दिया गया. इसके बाद इनमें से अधिकांश शरणार्थी नाजी नरसंहार का शिकार बने.

फ्रित्ज हैबर

जर्मनी के फ्रित्ज हैबर को शांति का नोबेल 1914 में अमोनिया आधारित रसायनिक उर्वरक विकसित करने के लिए दिया गया था. पूरे विश्व में खाद्यान्न उत्पादन में इसकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका है. विश्व की कुल आबादी का एक- तिहाई हिस्सा खाद्यान्न के लिए इसी उर्वरक पर निर्भर है. लेकिन हैबर का एक और काम विवाद का विषय रहा था जिसके चलते उन्हें शांति का नोबेल मिलने पर सवाल उठे.

1914 में शुरू हुए पहले विश्व युद्ध के दौरान हैबर इंस्टीट्यूट फॉर फिजिकल केमिस्ट्री के निदेशक थे. इस समय उन्होंने विषैली क्लोरीन गैस बनाई थी. हैबर ने युद्ध में इसके इस्तेमाल किए जाने को लेकर भी जोरदार लॉबीइंग की थी. हैबर की अगुवाई में ही फॉस्जीन और मस्टर्ड गैस जैसी गैसों का विकास हुआ. चार साल तक चले प्रथम विश्व युद्ध में इन गैसों के चलते करीब 13 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. खुद हैबर की जिदंगी में भी क्लोरीन गैस सबसे बड़ी त्रासदी की वजह बनी. उनकी पत्नी, जो खुद भी वैज्ञानिक थीं, ने युद्ध में क्लोरीन का इस तरह इस्तेमाल किए जाने की खबर सामने आने के 10 दिन बाद खुदकुशी कर ली. हालांकि हैबर अपने आखिरी समय तक युद्ध में रासायनिक हथियारों की वकालत करते रहे. उनका तर्क था कि शांति के समय वैज्ञानिक दुनिया का होता है लेकिन, युद्ध के समय सिर्फ अपने देश का.

एक लिहाज से देखा जाए तो नोबेल पुरस्कार के साथ विरोधाभास 1895 में इसके जन्म के साथ ही जुड़ गया था. इस पुरस्कार के जनक अल्फ्रेड नोबेल थे. नोबेल ने ही डायनामाइट का अविष्कार किया था. यह विस्फोटक उपयोगी होने के साथ-साथ दुनिया में बड़ी तबाही का भी सबब बना. कई यह भी मानते हैं कि डायनामाइट के रूप में अपनी भयंकर भूल का अनुभव होने के बाद ही उन्हें नोबेल पुरस्कार का विचार सूझा.

नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़े विवादों के चलते कई बार यह पुरस्कार देने वाली समिति की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लगे. भारतीयों के लिए नोबेल पुरस्कार से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा महात्मा गांधी को पांच बार शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किए जाने के बाद भी उनका नहीं चुना जाना रहा है. हालांकि बाद में नोबेल समिति ने माना कि महात्मा गांधी के मामले में उससे भूल हुई थी.