अपने बचपन के बड़े हिस्से को याद करते हुए एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ मैं कह सकती हूं कि वो वक्त मेरी जिंदगी का सबसे बेहतरीन दौर था. बेफिक्र, आज़ाद और मासूमियत से भरे वो दिन मेरी यादों का सबसे कीमती खजाना हैं. तब मेरे पास महंगे खिलौने नहीं थे लेकिन जिगरी दोस्तों की फ़ौज थी, रंगीन पन्नियों में लिपटी विदेशी चॉकलेट्स के बजाय मेरे खुद के ईजाद किये हुए खेल थे, कीमती कपड़ों के बजाय खुली हवा में सांस लेने की बेशकीमती आजादी थी. उन दिनों मैं अपने नाम को सार्थक करती, पूरी चंचलता के साथ मोहल्ले में बेरोक-टोक घूम सकती थी, खेल सकती थी, धमा-चौकड़ी कर सकती थी.

उस वक्त मेरी उम्र पांच-छह साल रही होगी. पापा रेलवे में द्वितीय श्रेणी कर्मचारी थे. उन्हें मिले उस सरकारी घर में हम तीनों बहनें और दो भाई बड़े नाज़ से, लाड़-दुलार के साथ पल रहे थे. हमारी किसी जरूरत, किसी मांग, किसी भी जिद को मां-बाप ने तब तक नहीं नकारा जब तक उनके पास उसे पूरा करने के साधन मौजूद रहे. एक मध्यमवर्गीय परिवार के हिसाब से हम खुश और संतुष्ट थे. प्यार और अपनेपन की तो हमारे यहां कोई कमी नहीं थी लेकिन पापा के पास हमारे साथ बिताने के लिए थोड़ी वक्त की कमी जरूर थी. लेकिन इस मामले में भी मैं भाग्यशाली थी. सबसे छोटी होने के कारण मेरे हिस्से में उनका सबसे ज्यादा वक्त आता था.

दो कमरों के उस सरकारी क्वार्टर में रहते हुए हमें जगह की किल्लत कभी महसूस नहीं हुई लेकिन पैसों का अभाव बना रहता था. आज से 25 साल पहले सात हजार रुपए की तनख्वाह में सात लोगों का परिवार चल तो सकता था, लेकिन तरक्की नहीं कर सकता था. इस अभाव को दूर करने के लिए एक उपाय सोचा गया - घर के एक कमरे को किराए पर उठा दिया जाए. घर में सिर्फ दो ही कमरे थे इसलिए किसी भरोसेमंद व्यक्ति को किराए पर रखा जाना तय हुआ. यह तलाश पापा के ही संग नौकरी करने वाले एक शख्स पर जाकर ख़त्म हुई.

धीरे-धीरे पॉपिंस का फेंका जाल अपना काम कर गया और मैं उस जाल में अच्छे से फंस गयी. फिर सर्दियां आयीं और रजाइयां निकलीं. उनके कमरे में टीवी नहीं था तो वो हमारे कमरे में आकर टीवी देखते

किराए पर दिए कमरे में आए इस मेहमान का व्यवहार इतना मीठा था कि उसने सारे परिवारजनों का दिल जीत लिया. सबका भरोसा उस पर जम गया. अब दो कमरों के बीच कोई ऐसी दीवार नहीं थी जो उनमें रहने वालों के बीच कोई भेद कर सके. सब खुश थे क्योंकि घर में पैसे आ रहे थे और तंगी कुछ कम हो गई थी. मैं सबसे ज्यादा खुश थी क्योंकि किराएदार अंकल मेरे लिए ‘पॉपिंस’ लाते थे, हर रोज, बिना नागा. रंग बिरंगी मीठी गोलियों से उन्होंने किस तरह मेरा भरोसा और अपनापन जीत लिया, यह देखने वाली चीज़ थी.

मैं पापा की सबसे प्यारी बेटी थी फिर भी पापा मुझे हर रोज पॉपिंस नहीं दिलाते थे. पापा जैसे ही पद पर काम करने वाले उन अंकल को भी बहुत मोटी तनख्वाह नहीं मिलती थी. ऐसे व्यक्ति का हर रोज़ मेरे लिए दो रुपए की पॉपिंस लेकर आना बड़ी बात थी. तब यह बात समझने लायक मैं तो नहीं थी लेकिन मेरे माता पिता या बड़े भाई बहनों को भी यह सोचने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई.

खैर, पॉपिंस की मिठास ने उस शख्स के लिए मेरे दिल में ऐसा प्यार भर दिया कि वो मेरे सबसे ज्यादा चहेते बन गए. मैं उन पर जान छिड़कती थी. उनके हंसमुख व्यवहार से मेरे मां-बाप ऐसे भाव विभोर हो गए कि अपने छोटे-छोटे बच्चे लगभग उन्हीं के भरोसे छोड़कर चले जाते थे. कुछ दिनों बाद हमारा आधे से ज्यादा वक़्त उन्हीं के कमरे में बीतने लगा. अंकल ड्यूटी से पापा के साथ ही आते और मैं अपने पापा की गोद में चढ़ने के बजाय उनकी गोद में जा चढ़ती. अब सोचकर बुरा लगता है कि मेरे पापा ने कभी यह क्यों नहीं सोचा कि उनकी छोटी सी बच्ची उनसे ज्यादा किसी और के पास रहने लगी है.

फिर सर्दियां आयीं और रजाइयां निकलीं. उनके कमरे में टीवी नहीं था. वो जब हमारे कमरे में आकर टीवी देखते मैं फ़ौरन उनकी गोद में जाकर बैठ जाती. और फिर जो कुछ होता वह लगभग दो-तीन साल तक मुझे समझ ही नहीं आया. हालांकि यह सब होता लगभग रोज ही था. अंकल रजाई की आड़ में मुझे ऐसी-ऐसी जगह छूते जहां बस मम्मी छुआ करती थीं, नहलाते हुए. वो जिस तरह अपने हाथ रजाई में चलाते, बाद में घर के गलियारे में चलाने लगे, जब लाइट चली जाती थी. उसके बाद जब भी, जैसे भी, जहां भी उन्हें मौका मिलता वो वह सब करने की कोशिश करते जो वे उतने वक्त में कर सकते थे.

अंकल में इतना आत्मविश्वास था कि यह सब करते हुए भी हमेशा उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट बनी रहती थी. कभी उन्हें इस बात के लिए झिझकते या डरते नहीं देखा

अंकल में इतना आत्मविश्वास था कि यह सब करते हुए भी हमेशा उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट बनी रहती थी. कभी उन्हें इस बात के लिए झिझकते या डरते नहीं देखा कि अगर मैंने यह सब किसी को बता दिया तो अंजाम क्या हो सकता था. शायद उन्हें मेरे मां-बाप के सीधेपन या कहें मूर्खता पर ज्यादा यकीन था. अब तो मुझे ठीक से याद भी नहीं कि यह सब कब तक चलता रहा. लेकिन हां जब तक वो घर में किराए पर रहे किसी न किसी बहाने से मुझे ऐसे ही छूते रहे. अब तक पॉपिंस का जादू हवा हो चुका था. अब मैं उन्हें देखते ही सहमने लगती थी. उनके इरादे और मेरा डर कभी मेरे मां-बाप को पता नहीं चले. मैं भी, जो आमतौर बहुत बोला करती थी, इस मामले में कभी किसी से कुछ नहीं कह पाई. मैं जानती थी जो कुछ हो रहा वह ‘गंदी बात’ है. शायद वो माहौल मेरे घर पर नहीं था जिसमें मैं अपनी गंदी बात किसी को बता सकती.

खैर, वक्त बीतता गया और बाइस साल हो गए. ये बातें अनकही ही रह गईं. एक दिन अचानक मां को सब बताने का मौका तब मिला जब उन्होंने बताया कि वह शख्स बहुत बीमार है. उसे एक ऐसी बीमारी हो गयी है जिसका कोई इलाज नहीं है. इस पर मेरे मुंह से निकला कि ‘अच्छा हुआ जो आप नहीं कर सके भगवान ने कर दिया.’ आश्चर्य इस बात का है कि सालों पहले की किसी हत्या का राज़ खुलने पर हत्यारे को सजा मिल जाती है लेकिन बचपन में किए यौन अपराधों के दोषी के बारे में पता चलने पर भी वे उसी तरह आजाद रहते हैं. सोचती हूं अगर मेरे घर का कोई गहना चोरी हुआ होता तो उसे माता-पिता शायद अब तक ढूंढ़ते और मिल जाने की उम्मीद करते. लेकिन खोये बचपन को ढूढ़ने का प्रयास करने के बजाय मां ने सिर्फ ‘हमें तो कभी ऐसा लगा ही नहीं’ कहकर बात ख़तम कर दी.

मैं भी जानती हूं कि जो मैंने खो दिया वह कीमती बचपन अब मुझे वापस नहीं मिल सकता. लेकिन यह सब सोचकर आज भी गुस्से से भर जाती हूं. गुस्सा उस शख्स से ज्यादा अपने माता-पिता पर आता है. उनकी लापरवाही की कीमत मैंने अपनी मासूमियत देकर चुकाई.

मेरे बाद की पीढ़ी बेटियों की ही है और मेरी पूरी कोशिश रहती है कि अपनेपन की आड़ में कभी भी कोई भी मेरी भतीजियों और भांजी की निजता और गरिमा में सेंध न लगा सके. मैं उन्हें और उनके दोस्तों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में समझाती हूं. बच्चों को समझा पाना इतना भी मुश्किल नहीं है बशर्ते वे आप पर यकीन करते हों और कोई बुरी नीयत वाला उनका भरोसा जीते इससे पहले आप ऐसा कर लें.


('दहलीज पर दिल' और 'खुलती गिरहें' शीर्षक से दो उपन्यास लिख चुकी चंचल शर्मा स्वतंत्र लेखिका हैं और नोएडा में रहती हैं)