हर व्यक्ति के कुछ न कुछ पूर्वग्रह होते हैं: वे उसकी शिक्षा-दीक्षा, परिवार, रुचियों, मित्रों, पुस्तकों, जीवनानुभवों, दूसरों से संबंध और संवाद आदि से बनते-बिगड़ते हैं. जिसे हम जीवनदृष्टि कहते हैं वह अकसर कुछ बद्धमूल पूर्वग्रहों का सुघर समुच्चय भर होती है. सभी पूर्वग्रह अनुचित हों यह सही नहीं है: उन्हीं पूर्वग्रहों को अनुचित कहा जा सकता है जो स्वार्थ, असहिष्णुता, घृणा, भेदभाव, दूसरों का अहित और उनको हानि आदि पहुंचाते हों. कुछ पूर्वग्रह कभी समाज-विरोधी लग सकते हैं: नाज़ी मानसिकता को जर्मन समाज में लोकतांत्रिक मान्यता मिल गयी थी जबकि वह मनुष्य-विरोधी थी. उस समय अल्बर्ट आइन्स्टीन जैसे वैज्ञानिक, टामस मान और बर्तोल्त ब्रेख़्त जैसे लेखकों के नाजियों को लेकर पूर्वग्रह समाजविरोधी लग सकते थे लेकिन मानवीय और ज़रूरी थे.

इन दिनों देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर जो हिंसा और अनाचार बेहद फैल और संभवतः लोकप्रिय हो रहे हैं तो इस समय उनके विरुद्ध पूर्वग्रह सर्वथा उचित और गहरे अर्थ में भारतीय है. पाकिस्तानी सरकार, राजनीति और सेना के विरुद्ध पूर्वग्रह उचित हैं लेकिन पाकिस्तानी जनता और साहित्य-कलाओं के विरुद्ध पूर्वग्रह अनुचित और निराधार हैं. किसी भी तरह के युद्ध, दंगे, हिंसा, घृणा, शोषण, अत्याचार, हत्या आदि के विरुद्ध पूर्वग्रह सर्वथा उचित हैं. जिस तरह हमारी आज की राजनीति वाग्छल, पाखंड, जुगाड़, परपीड़न आदि पर आधारित हो गयी है उसके प्रति पूर्वग्रह से काम लेना उचित है.

अपने कुछ निजी पूर्वग्रह मुझे पता हैं. मैं लगभग चालीस वर्षों से अज्ञेय-शमशेर-मुक्तिबोध की बृहत्त्रयी पर अड़ा रहा हूं: इनके विरुद्ध जो लिखा गया और जाता है उसे पढ़कर भी मेरा पूर्वग्रह नहीं बदला. गांधी जी के विरुद्ध तरह-तरह की बातें और कई बार तथ्य लिखे जाते हैं. ऐसे लोग भी हैं जो गांधी-द्रोह को अपना धर्म मानते हैं. पर इस सबने मेरे इस बुनियादी पूर्वग्रह को कभी कमज़ोर नहीं किया है कि वे पिछले एक हज़ार बरस के सबसे बड़े भारतीय हैं और उस अवधि के विश्वव्यापी महामानवों में से एक, जिनमें मैं कार्ल मार्क्स और आइन्स्टीन को भी गिनता हूं. मुझे बाज़ार और बाज़ारूपन के विरुद्ध अपने पूर्वग्रह पर पुनर्विचार करने का अवसर कभी नहीं आया: दोनों के विस्तार के साथ ही दुनिया और भारत में धर्मान्धता, आतंक, साम्प्रदायिकता, विद्वेष, हिंसा आदि बढ़े हैं. फ़िल्मी संगीत, बम्‍बईया फ़िल्मों, लोकप्रियता आदि के विरुद्ध मुझमें दशकों से पूर्वग्रह रहे हैं और उनमें फेरबदल का अवसर कभी नहीं आया, कम से कम मेरे नज़दीक.

इस पूर्वग्रह से भी मैंने अब तक छुटकारा नहीं पाया है कि हिन्दी आलोचना में कृतिकार-आलोचना के मूल्य और नवाचार को हिन्दी अकादेमिकों ने कभी खुले मन से स्वीकार नहीं किया: अज्ञेय, मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा, मलयज आदि हमारे बड़े आलोचक हैं और रहेंगे. मेरा यह भी बद्धमूल पूर्वग्रह है कि प्रगतिशील और जनवादिता ने हिन्दी में संकीर्णता, दुर्व्याख्या, वैचारिक छुआछूत को बढ़ावा दिया है भले ही कई अर्थों में हिन्दी को अधिक लोकतांत्रिक बनने में भी भूमिका निभायी है. इस पूर्वग्रह से कभी मुक्ति अब तक नहीं मिली है कि हिंदी भाषा और साहित्य का बहुत अहित हिन्दी अध्यापकों, हिन्दी अधिकारियों और हिन्दी मीडिया ने किया है. यह पूर्वग्रह तो इधर और गहरा हो गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भारतीय परम्परा, सभ्यता और इतिहास की बहुत कम समझ है और वह भारत की औपनिवेशिक समझ का ही एक हिंसक-आक्रामक संस्करण है.

मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता

जो लोग हिन्दी कविता के लम्बे इतिहास से परिचित हैं वे इतना तो जानते रहे हैं कि मुग़ल शासनकाल में सत्ता और कलाओं के बीच गहरा संबंध था. प्रायः सभी बड़े मुग़ल शासक कलाप्रेमी और उनके आश्रयदाता थे. पर, कम से कम मुझे, यह पता नहीं था कि उनमें से प्रायः सभी ने स्वयं कविता भी लिखी थी. कविकीर्ति अन्तिम मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र के ही, वह भी उर्दू कविता के लिए, हिस्से आयी है. विद्वान्-आलोचक मैनेजर पांडे ने हाल ही में ‘मुग़ल बादशाहों की हिन्दी कविता’ शीर्षक से (राजकमल द्वारा प्रकाशित) एक पुस्तक संपादित-संकलित की है. उसे पढ़कर यह जानना लोमहर्षक है कि मुग़ल शासकों में से कई कितने अच्छे-सुघर कवि थे. यह भी कि भारतीय लोकजीवन में वे बहुत रसे-बसे थे: उनमें अकबर से लेकर औरंगज़ेब तक शामिल हैं. दिलचस्प यह भी है कि ये कविताएं अधिकांशतः संगीत के एक ग्रन्थ ‘संगीतकल्पद्नुम’ में संकलित हुई थीं: ज़ाहिर है तब कविता और संगीत में घनिष्ठ संबंध बना हुआ था जो हमारे समय में पूरी तरह से टूट चुका है.

‘लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में’ जैसी उर्दू कविता-पंक्ति के लिए विख्यात ज़फ़र की हिन्दी कविता है:

जिन गलिन में पहले देखीं लोगन की रंगरलियां थीं.

फिर देखा जो उन लोगन बिन सूनी पड़ी व गलियां थीं.

ऐसी अंखियां मीचे पड़े हैं करवट भी नहीं ले सकते,

जिनकी चालें अलबेली और चलने में छलबलियां थीं.

ख़ाक का उनका बिस्तर है और सर के नीचे पत्थर है,

हाय! वह शकलें प्यारी प्यारी किस किस चाव से पलियां थीं..

अकबर का पद्य है:

मान उदोतकरण तिमिरहरण प्रकाशपति

ज्योतीसरूप अपनो दया जनाववै.

सप्तदीप नवखंड परजोरी किरण तनी तनावै..

दृष्टि न जुरत महाप्रताप तेज एसौ करतार

दियो जनावै.

साह अकबर प्रभुको प्रसाद व्यापत भयो याते

जग रसाल लेगावै..

शाहजहां का एक छन्द है:

दादुर चातक मोर करौ किन सोर सुहावन को भरु है.

नाह तेही सोई पायी सखी मोहि भाग सोहागहु बरु है..

जानि सिरोमनि साहिजहां ढिग बैठो महा विरहा-हरु है.

चपला चमको, गरजो बरसो घन, पास पिया तो कहां डरु है.

औरंगजेब का पद है:

अब घरी आवत हेरी लाल माईरी अबधको दिन आज.

वेग प्रफुलित भयो सगन्ध मंजन कर कर आभूषण

वसन बनाये पहरे प्यारी तबही अरगजा भेटत

लगाए जब होवे मन भावतो काज..

यह देखो वे गए मनमोहन वलमा अन्तरयामी

खामी करवन वरण कारण विरहन कारण तेरे

अनगन मानो पतितन को दीनो सुख समाज.

शाह औरंगजेब जीनी गलेहो लगाय कीनो निहाल

तोहे वाल दोनों ढिग विव सुहाग भाग आनन्द राज..

मुहम्मद शाह का पद्य है:

फूलीं सब डारियां भई हैं बहारियां नैनन निहारियां क्यारियां

लागें अत प्यारियां सो लेकर पिचकारियां और गावें गीत गारिया

सीस लिये गड़वा फूलन को खेलत बसन्त नवलाइयां मारियां

सब मिल करें किलोल नारियां एक एक के संग दे दे तारियां

इन कविताओं को पढ़कर यह स्पष्ट होता है कि इन शासक-कवियों पर भक्ति-रीति का प्रभाव था और उस समय हिन्दी में जो कविता हो रही थी उसकी समझ थी, उससे सीधा संवाद था. आधुनिक काल आते-आते सत्ता और कविता का संबंध तनाव भरा हो गया और लोकतंत्र के बाद तो ज्‍़यादातर कविता सत्ताविरोधी हो गयी. जो नहीं हुई उसकी कोई सार्थकता लगभग नहीं बची.