समाजवादी पार्टी ने पांच नवम्बर को लखनऊ में पार्टी का रजत जयन्ती समारोह मनाने का ऐलान किया है. 25 वर्ष के संघर्ष और उतार-चढ़ाव भरे सफर में उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व सफलता पाने वाली पार्टी के लिए यह मौका एक बड़ा उत्सव मनाने का मौका हो सकता था. लेकिन अंतःपुर की राजनीति के चलते स्थिति यह हो गई है कि उसका रजत जयन्ती वर्ष पार्टी में नई ऊर्जा का संचार करने के बजाय ‘यवनिका पतन’ का सीन लिखने में जा रहा है.

टेलीविजन के धारावाहिकों की तरह हर रोज सपा की अर्न्तकलह में कभी कुछ नए डायलॉग जुड़ जाते हैं तो कभी पूरा का पूरा सीन बिना संवादों के ही गुजर जाता है. समाजवादी कुनबे में ‘बिगबॉस’ मुलायम सिंह यादव और ‘छोटे उस्ताद’ अखिलेश यादव के बीच के रिश्तों में नाम भले ही पिता-पुत्र का जुड़ा हो मगर उन रिश्तों में घोर प्रतिद्वन्दियों जैसी कड़वाहट भर चुकी है. यह कड़वाहट सार्वजनिक तौर पर भी दिखाई देती है. अखिलेश लोहिया जयन्ती के कार्यक्रम में पहुंचते हैं, माल्यार्पण करते हैं और फिर पिता मुलायम सिंह यादव का इन्तजार किए बिना ही वहां से खिसक जाते हैं. फिर मुलायम आते हैं, वे भी माल्यार्पण करते हैं, अखिलेश का जिक्र किए बिना चले जाते हैं.

कुनबे में ‘बिगबॉस’ मुलायम सिंह यादव और ‘छोटे उस्ताद’ अखिलेश यादव के बीच के रिश्तों में नाम भले ही पिता-पुत्र का जुड़ा हो मगर उन रिश्तों में घोर प्रतिद्वन्दियों जैसी कड़वाहट भर चुकी है 

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. मुलायम के आने तक सब इन्तजार करते थे, उनके आने पर ही कार्यक्रम शुरू होता था. मगर अब सब उल्टा पुल्टा हो रहा है. अखिलेश बार बार यह जता रहे हैं कि वे कमजोर नहीं हैं और मुलायम को खुद बार बार यह कहना पड़ रहा है कि समाजवादी पार्टी में सब कुछ वे ही हैं और उनसे ऊपर कोई नहीं.

मगर खुद को मजबूत बताने के साथ साथ अखिलेश खुद को बेचारा साबित करने पर भी तुले हुए हैं. उनके समर्थक मीडिया में भी इस आइडिया को बेचने की हरसम्भव कोशिश करने में जुटे हैं. यह बताया जा रहा है कि सपा की कौरव सेना में वे ही इकलौते अभिमन्यु हैं. बिलकुल बेदाग, एकदम खरे, मगर परिस्थितियों के मारे. खुद अखिलेश अपने को बेचारा साबित करने के लिए कभी कहते हैं कि मुझे तो बचपन में अपना नाम तक खुद रखना पड़ा था. फिर वे कहते हैं कि मैं तो 14 साल हॉस्टल में अकेले रहा हूं और कोई साथ नहीं होगा तो भी मैं अकेले ही चुनाव अभियान में निकल पडूंगा. और यह सब कहते हुए वे यह दावा पेश करने में भी नहीं चूकते कि उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री भी वे ही हांगे. अपने कथित ‘अभूतपूर्व विकास’ के बूते पर सत्ता वापसी की वे पूरी उम्मीद जताते हैं. यह बताने की कोशिश भी करते हैं कि युवा शक्ति उनके साथ है और भविष्य युवाओं का है.

लेकिन धारावाहिक के अगले ही दृश्य में मुलायम प्रकट होते हैं. गायत्री पजापति जैसे ‘गरीब’ और पारिवारिक एकजुटता के प्रतीक शिवपाल जैसे भाई उनके दाएं बाएं होते हैं. अखिलेश के दावे को हवा में उड़ा कर वे कहते हैं, ’2012 में मेरे नाम पर वोट मांगे गए थे. बहुमत की सरकार बनने पर मैने ही अखिलेश को सीएम बनाया. 2017 के चुनाव के बाद अगला सीएम कौन बनेगा इसका फैसला विधानमण्डल दल, संसदीय बोर्ड और मैं करूंगा'. और ऐसा कहते हुए मुलायम के चेहरे पर जो भाव आते हैं वे साफ दिखाते हैं कि वे कितने गुस्से में हैं. साफ दिखता है कि यह गुस्सा एक आहत पिता का नहीं एक प्रतिद्वन्दी का गुस्सा है.

अखिलेश के ‘तुरुप के पत्ते’ और ‘रावण का वध’ करने जैसे सूत्र वाक्यों के खुलासे का इन्तजार करते हुए अब अखिलेश के पक्के समर्थक कहे जाने वाले चेहरे भी कुम्हलाने लगे हैं

मुलायम के इस गुस्से ने एक बात तो साफ कर दी है कि अखिलेश दावा चाहे जो भी करें मगर उनके लिए समाजवादी पार्टी के भावी मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे बढ़ने की राह अब बहुत आसान नहीं रह गई है. दूसरी बात यह है कि पिता पुत्र के बीच कटुता अब पारिवारिक कम और राजनीतिक अधिक हो गई है.

पार्टी में अखिलेश की पकड़ बहुत ही कमजोर है. जो युवा शक्ति उनके साथ दिखती है वह राजनीतिक जोड़ तोड़ में अनुभवहीन है. अखिलेश का मुस्कुराता चेहरा मतदाताओं का कितना विश्वास हासिल कर पाएगा यह अभी इसलिए यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके विरोधी उत्तर प्रदेश की बदहाली, जातिवादी प्रशासन और भ्रष्टाचार तथा कमजोर कानून व्यवस्था के लिए अखिलेश के मुस्कुराते चेहरे को ही निशाना बना रहे हैं. ऐसे में ‘एकला चलो’ का रास्ता अखिलेश की साइकिल को कहां पहुंचाएगा यह कोई नहीं जानता. अखिलेश के ‘तुरुप के पत्ते’ और ‘रावण का वध’ करने जैसे सूत्र वाक्यों के खुलासे का इन्तजार करते हुए अब अखिलेश के पक्के समर्थक कहे जाने वाले चेहरे भी कुम्हलाने लगे हैं. पार्टी में बरसों से जुड़े रहे खांटी समाजवादी भी अब उहापोह में हैं कि जाएं तो जाएं कहां क्योंकि बतौर प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव संगठन में भी अपनी पकड़ नहीं बना पाए और सरकार के मुखिया के तौर पर तो वे अप्रासंगिक हो चले है.

कल तक जो चेहरा पार्टी की चुनावी यात्रा का नायक बताया जा रहा था उसे अब खुद सपा के मुखिया खारिज कर रहे हैं. खुद मुलायम सिंह यादव का स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि वे चुनावी रथ पर सवारी कर सकें. तब ऐसे में समाजवादी पार्टी चुनाव में क्या दावेदारी लेकर जनता के बीच जाएगी, यह बड़ा सवाल है. साढ़े चार साल सरकार का चेहरा अखिलेश यादव रहे हैं. सरकार कितनी सफल रही है, इसकी घोषणा स्वयं मुलायम सिंह यादव अनेक मौकों पर सार्वजनिक तौर पर यह कह कर कर चुके हैं कि, ‘सरकार के मंत्री काम नहीं करते, रूपए कमाने में जुटे हैं. कार्यकर्ता जमीनें कब्जा कर रहे हैं, जनता की कोई सुधि नहीं ले रहा.‘ अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि को टिकट देकर और मुख्तार पर रजामंदी दिखा कर समाजवादी पार्टी अपना भावी चेहरा भी एक तरह से जनता के सामने प्रस्तुत कर ही चुकी है.

समाजवादी पार्टी से जुड़े कई कार्यकर्ताओं को भी अब ऐसा लगने लगा है कि अखिलेश यादव अकारण ही समाजवादी पार्टी के मुखिया से टकराव पर उतारू हैं

यानी कहीं से भी उम्मीद की कोई खिड़की खुलती नहीं दिख रही. ऐसे में 25 वर्ष का जश्न समाजवादी पार्टी के लिए आगे की राह को आसान बना पाएगा, ऐसा लगता नहीं. अखिलेश ने अब तक एक बार भी इतनी राजनीतिक संकल्प शक्ति नहीं दिखाई है कि पार्टी उनसे अपने दम पर अगली सरकार की उम्मीद कर सके और जो पार्टी के बिग बास हैं वे खुद ही इसकी लुटिया डुबाने पर उतारू दिख रहे हैं.

यानी समाजवादी पार्टी अपने पतन की पटकथा खुद ही लिख रही है. समाजवादी पार्टी से जुड़े कई कार्यकर्ताओं को भी अब ऐसा लगने लगा है कि अखिलेश यादव अकारण ही समाजवादी पार्टी के मुखिया से टकराव पर उतारू हैं. पार्टी के एक पुराने नेता मायूस होकर कहते हैं, ‘मुलायम जब चौतरफा घिरे हुए थे तब उनके जुझारू तेवरों को देख कर हमने नारा दिया था कि ‘जिसने कभी न झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम है.’ ऐसे मुलायम को झुकाने की कोशिश में अखिलेश का ही धड़ाम होना तय है. लेकिन इसमें तबाही तो अन्ततः समाजवादी पार्टी की ही हो रही है.’ क्या 25 साल का सफर ही समाजवादी का भविष्य होगा इस सवाल का जवाब समाजवादी पार्टी से जुड़ा हर चेहरा जानना चाह रहा है.