सेवानिवृत्त बैंककर्मी (स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया) अलकनंदा साने मध्य प्रदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की संपादक रही हैं और इंदौर में रहती हैं.


मैं एक भरे-पूरे संयुक्त परिवार में अपने माता-पिता की नौवीं संतान थी. सबसे बड़ी दो बहनें फिर छह भाई और फिर मैं. सबसे छोटे भाई और मुझमें छह साल का अंतर था और इसलिए मैं सबकी लाडली थी. खासतौर पर पिताजी की, उन्हें हम दादा कहते थे. दादा की गोद में बैठना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार था. मैं घर का सबसे छोटा बच्चा थी सो मेरे लिए इसके अपने फायदे और नुकसान थे. एक तरफ जहां मुझे कोई डांटता-फटकारता नहीं था वहीं दूसरी तरफ मेरे साथ खेलने और शैतानी करने वाला भी कोई नहीं था. छोटी होने और अकेली पड़ जाने के कारण मेरी शरारतों के कोटे में बहुत कम शरारतें हैं. यह कह सकते हैं कि घर के बड़ों को देख-देखकर मैं बचपन में ही अपनी उमर से बड़ी होने की भाव-भंगिमा में रहती थी इसलिए बेतरह शरारतें करने के मौके ज्यादा आए नहीं.

आज जिस उम्र में हूं तो नजर धुंधलाने के साथ-साथ अब तो उस दौर की यादें भी धुंधली पड़ गई हैं. बचपन की जो आखिरी याद अब भी मुझे है वो सन 1960-61 की बात होगी. तब मेरी उम्र 7-8 साल की रही होगी. मेरी बहनें मुझसे बहुत बड़ी थीं. सगे भाइयों के अलावा दो चचेरे भाई भी साथ में रहते थे.चाची जल्दी गुजर गई थीं तो उनका लालन पालन मेरी मां ने ही किया था. उम्र में वे भी मेरे भाइयों के बराबरी के ही थे, यानी मुझ से काफी बड़े थे. दादा के बाद मैं सबसे ज्यादा अपने भाइयों की लाडली थी. उनकी राजनीतिक चर्चाएं सुनते और शतरंज की चालें (इस दौरान उनकी हरकतें-बातें) देखते-देखते मेरे दिन बीता करते थे. भाइयों के साथ उठने-बैठने के कारण मेरा व्यवहार, चलना फिरना, बोलने का लहजा, सब कुछ लड़कों जैसा होने लगा था. कह सकते हैं कि मैं फ्रॉक पहनने वाला लड़का थी.

जिस बच्चे को रोज सिर्फ लाड मिलता हो उसे अचानक किसी दिन डांट पड़ जाए तो उसे ज्यादा बुरा लगता है. मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. मुझे लग रहा था कि मैं अब बड़ी हो गई थी और मां को मुझे इस तरह नहीं डांटना चाहिए था

मैं देखती रहती थी कि मां, बड़ी भाभी और दोनों बहनें घर के कामकाज में जुटी रहती थीं. इतना ही नहीं वे हर समय दादा और भाइयों की खिदमत में भी हाजिर रहतीं. आज से आधी सदी पहले तब की परम्पराओं के मुताबिक ही भाइयों का पुरुषोचित व्यवहार हुआ करता था. ऐसा तब भी होता था जब भाई बहनों से छोटे थे पर वे बहनों और भाभियों पर हुकुम ही चलाते थे. कहते हैं न कि बच्चे अनुसरण बहुत जल्दी करते हैं. भाइयों के साथ रहते मैं भी कुछ हरकतें सीख गई थीं, बस आयु के हिसाब से उनका अनुपात कम था.

एक दिन की बात है. दादा आम की टोकरी लेकर आए और तीन-चार भाई आमरस निकालने में लग गए. उस समय मिक्सर नहीं हुआ करते थे इसलिए रस के आम अलग और काटने के आम अलग आते थे. आम थे यानी गर्मी के दिन थे. एक भाई को प्यास लग रही थी लेकिन उसके दोनों हाथ आमरस से भरे थे. उसी समय मेरी एक बहन वहां आई. भाई ने उससे कहा – ‘ए ताई! (मराठी में बड़ी बहन को ताई कहते हैं) पानी पिला ना.’ मैं भी हमेशा की तरह वहीं भाइयों के आसपास थी. मैंने भी भाई की तरह बहन को आदेशित किया. मेरा आदेश ताई से पहले मां ने सुन लिया जो रसोई में कुछ काम कर रही थीं. मां वहीं से चिमटा उठाकर लाई और मुझे दिखाते हुए डपटकर बोली – ‘लड़की होकर हुकुम चलाती है वह भी बड़ी बहन पर? खबरदार! आइंदा ऐसा कुछ कहा तो इस चिमटे से जुबान खींच लूंगी.’ मैं सहम गई और कुछ नहीं बोली.

जिस बच्चे को रोज सिर्फ लाड मिलता हो उसे अचानक किसी दिन डांट पड़ जाए तो उसे ज्यादा बुरा लगता है. मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. मुझे लग रहा था कि मैं अब बड़ी हो गई थी और मां को मुझे इस तरह नहीं डांटना चाहिए था. पहले थोड़ा गुस्सा आया फिर जितना सोचा गुस्सा उतना ही बढ़ता गया. गुस्से-गुस्से में मैंने दिमाग लगाना शुरू किया जो लाजिम था कि उल्टी दिशा में ही लगना था. घर में दो दरवाजे थे. पिछवाड़े रसोई थी और बड़े-बड़े पेड़ थे. गर्मी के दिनों में अक्सर सब लोग ज्यादातर उधर ही रहते थे. उस दिन भी सब वहीं पर थे सो डांट पड़ने से नाराज मैं आगे की तरफ आई और घर से बाहर निकल गई. बड़ी देर तक किसी को पता नहीं चला. जब खाने का समय हुआ, सब लोग आवाज लगाने लगे. पर मैं तो थी ही नहीं. हमारा मकान खूब बड़ा था. सब मुझे जहां-तहां ढूंढ रहे थे और मैं घर से भाग चुकी थी. मैं बाजार की सड़कों पर थी.

तब मुझे एक और बात समझ आई थी कि वो गुस्सा करने वाली मां तो नकली थी, असली तो ये है जो अब मुझे दुलार कर रही है

बाजार में मुझे हमारे एक परिचित चाचाजी ने देख लिया. मैं भी गुस्से में निकल तो आई थी, पर बाद में घबराहट होने लगी. चाचाजी को देखकर रुलाई फूट पड़ी. वे मुझे अपने घर ले गए. चाचाजी समझ गए थे कि मैं डरी हुई हूं और भूखी भी हूं. पहले उन्होंने कुछ खिलाया फिर सारा माजरा सुना और आखिर में अपनी तरफ से कुछ बातें समझाईं. घर में बिना किसी को बताए कहीं नहीं जाना चाहिए, टाइप की उनकी बातें तो मुझे समझ में आ गईं लेकिन यह समझ नहीं आ रहा था कि अब घर जाकर घरवालों का सामना कैसे करूंगी? मैं सोच रही थी कि सबने मुझे यहां-वहां ढूंढा होगा और न पाकर कितने परेशान हुए होंगे. मां का दिखाया चिमटा भी याद आ रहा था. मैं घर पर घट सकने वाले दृश्यों की अलग-अलग कल्पनाओं में डूबी हुई थी और यह सब सोचने के साथ मेरी घबराहट बढ़ती जा रही थी.

घर पहुंची तो नजारा कुछ और ही था. सारे घरवाले वहां पर जमा होकर मेरा इंतज़ार कर रहे थे. थोड़ी देर में भाई जो मुझे ढूढ़ने यहां-वहां निकले थे, वे भी एक-एककर वापस आ रहे थे. मां, जिससे मुझे सबसे ज्यादा डर लग रहा था उसने तो मुझे गले ही लगा लिया. थपकी दी, पुचकारा, मेरे कद से बड़े मेरे गुस्से के लिए मुझे समझाइश भी दी. मैं इस सबसे अभिभूत थी. बहुत छोटी थी पर यह समझ आ रहा था कि मैं इस परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हूं और यहां सभी मुझे प्यार करते हैं.

कुछ घंटों के लिए गायब होने से सारे घरवालों की जान सांसत में आ गई थी और अब मुझे सही-सलामत वापस आया देखकर उनके चेहरे पर इत्मीनान भरी ख़ुशी थी. तब मुझे एक और बात समझ आई थी कि वो गुस्सा करने वाली मां तो नकली थी, असली तो ये है जो अब मुझे दुलार कर रही है. अभी बाजार में खुद को बुरी तरह लाचार मान रही मैं अचानक खुद को फिर से ताकतवर समझने लगी थी. हालांकि तब मैं यह सोचने के काबिल नहीं थी कि ऐसा क्यों हुआ.

यह घटना बचपन के बाद के सालों में भी हमेशा मेरे जेहन में रही और समझ बढ़ने के साथ-साथ याद दिलाती रही कि प्यार और अपनापन कितना जरूरी है और परिवार ही एक ऐसी जगह है जहां आपको इसका अनलिमिटेड पैकेज मिलता है. इसके बाद जीवन में तमाम मुश्किल क्षण आए, संघर्ष की एक लंबी पारी भी, पर यह सबक हमेशा काम आया कि कठिन परिस्थितियों का सामना करने में अपनों का साथ और प्यार ही सबसे बड़ी ताकत साबित होता है.