नवजोत सिंह सिद्धू ने जब राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी तो सबको यही लग रहा था कि उनका अगला कदम आम आदमी पार्टी में शामिल होना होगा. ऐसा लग रहा था कि दोनों पक्षों के बीच तकरीबन साल भर से चल रही बातचीत अब अमली रूप लेने वाली है. चर्चा यह भी थी कि सिद्धू को आम आदमी पार्टी पंजाब में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर सकती है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. तब से लेकर अब तक उन्होंने कई ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे लगता है कि आज 53 साल के होने जा रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने तकरीबन साढ़े बारह साल के राजनीतिक जीवन को गलत तरह से दांव पर लगा दिया है.

भारतीय क्रिकेट टीम में खेलने के बाद क्रिकेट मैचों की कमेंटरी करते हुए सिद्धू 2004 के लोकसभा चुनावों से राजनीति में आए. इस साल वे अमृतसर से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते भी. 2009 में भी उन्हें चुनाव जीतने में कामयाबी हासिल हुई. 2014 में अमृतसर से भाजपा ने अरुण जेटली को चुनाव लड़ाया. बताया जाता है कि उसी वक्त से भाजपा और सिद्धू के संबंध खराब होने शुरू हो गए. पिछले साल इन्हीं दिनों में यह खबर आने लगी थी कि सिद्धू आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. इस साल जब भाजपा ने उन्हें राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा भेजा तो लगा कि सिद्धू और भाजपा के संबंध सामान्य हो रहे हैं. लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने ने राज्यसभा से इस्तीफा देकर सभी को हैरान कर दिया.

यह सवाल उठता है कि जब आम आदमी पार्टी में उनकी स्पष्ट बात हुई ही नहीं थी तो फिर उन्होंने राज्यसभा और भाजपा छोड़ने का फैसला किस आधार पर किया? कई लोग इसे सिद्धू की राजनीतिक अपरिपक्वता बता रहे हैं

राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद सिद्धू ने भाजपा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर जो बातें कहीं उसका लब्बोलुआब यह था कि उन्होंने पंजाब के हितों को देखते हुए राज्यसभा और भाजपा छोड़ने का निर्णय लिया है. यानी कि उन्हें ऐसा नहीं लगता था कि प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई वाले शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर भाजपा पंजाब का भला कर सकती है. इसलिए पहले तो उन्होंने और उनके समर्थकों ने यह कोशिश की कि अकाली दल के साथ भाजपा का गठबंधन टूट जाए. लेकिन जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह साफ कर दिया कि गठबंधन बना रहेगा तो सिद्धू ने खुद को इस गठबंधन की राजनीति से दूर करने का फैसला किया.

सिद्धू भाजपा से निकलने के बाद जिस तरह की बातें कर रहे थे, कुछ उसी तरह की बातें पंजाब में आम आदमी पार्टी भी कर रही थी. ऐसे में यह लग रहा था कि दोनों में मेल होना स्वाभाविक है. सिद्धू और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी अरविंद केजरीवाल के बीच इस बारे में लंबे समय से बातचीत भी चल रही थी. इसकी जानकारी बाद में सिद्धू ने ही सार्वजनिक तौर पर तब दी जब उन्हें लग गया कि आम आदमी पार्टी में उनके लिए कोई अहम भूमिका नहीं हो सकती. जिस प्रेस वार्ता में सिद्धू यह जानकारी दे रहे थे, उसी में उन्होंने केजरीवाल पर भी जमकर निशाना साधा.

बताया जा रहा है कि केजरीवाल ने सिद्धू की दोनों अहम मांगों पर उनसे कोई ठोस वादा नहीं किया. सिद्धू की पहली मांग यह थी कि उऩको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए और दूसरी यह कि उनकी पत्नी और उस वक्त तक भाजपा विधायक रही नवज्योत कौर को भी विधायकी का टिकट दिया जाए. पति-पत्नी दोनों को टिकट देने में केजरीवाल ने आप के संविधान का हवाला दिया. केजरीवाल चाहते थे कि नवज्योत कौर चुनाव लड़ें और सिद्धू स्टार प्रचारक के तौर पर काम करें. सिद्धू को यह मंजूर नहीं था. जब बातचीत एक तरह से कहीं जाती नहीं दिखी तो सिद्धू ने प्रेस वार्ता करके इन बातों को सार्वजनिक कर दिया. यहीं से यह सवाल उठता है कि जब आम आदमी पार्टी में उनकी स्पष्ट बात हुई ही नहीं थी तो फिर उन्होंने राज्यसभा और भाजपा छोड़ने का फैसला किस आधार पर किया? कई लोग इसे सिद्धू की राजनीतिक अपरिपक्वता बता रहे हैं. जो लोग सियासत को जानते-समझते हैं, वे यह बताते हैं कि इस्तीफा तो सबसे अंतिम चीज होती है जबकि उसके पहले ही काफी चीजें दूसरी जगह तय हो गई होती हैं.

सिद्धू यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह कहकर एक बार फिर से सबको हैरान कर दिया कि कांग्रेस से गठबंधन करने के बारे में उनकी पार्टी सोच सकती है

कुछ लोग सिद्धू की सियासी अपरिपक्वता का अंत इसी निर्णय में नहीं देखते. बल्कि वे उसके बाद के सिद्धू के कदमों को भी इससे जोड़कर देखते हैं. आम धारणा यह बन रही है कि जब सिद्धू को आप में बात बनते नहीं दिखी तो उन्होंने आवाज-ए-पंजाब के नाम से राजनीतिक मंच की घोषणा कर दी. यहां तक तो सब ठीक था. कुछ लोग इस बात की कोशिश में भी लगे थे कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की अगुवाई वाली स्वराज अभियान की प्रस्तावित पार्टी, आप से निकाले गए सुच्चा सिंह छोटेपुर की पार्टी, आवाज-ए-पंजाब और अन्य दूसरे छोटे दलों को मिलाकर गठबंधन बन सके. लेकिन इसी बीच सिद्धू ने यह कहकर सबको फिर से हैरान कर दिया कि आवाज-ए-पंजाब चुनाव नहीं लड़ेगी. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि अगर चुनाव नहीं लड़ना था तो फिर अलग से राजनीतिक मंच की घोषणा का क्या मतलब था. इसे भी सिद्धू की सियासी अपरिपक्वता से जोड़कर देखा गया.

सिद्धू यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह कहकर एक बार फिर से सबको हैरान करदिया कि कांग्रेस से गठबंधन करने के बारे में उनकी पार्टी सोच सकती है. पहले तो पंजाब में कांग्रेस के कर्ताधर्ता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया लेकिन बाद में उन्होंने इस पर सकारात्मक रुख दिखाया. अब पंजाब से जो सूचनाएं मिल रही हैं, उनके मुताबिक सिद्धू को कांग्रेस आठ-दस सीटें देकर गठबंधन करने के लिए तैयार दिख रही है. सिद्धू को यह भी कहा जा रहा है कि अगर सूबे में कांग्रेस की सरकार बनी और कैप्टन मुख्यमंत्री बने तो इससे अमृतसर की जो लोकसभा सीट खाली होगी, वहां से उन्हें चुनाव लड़ाकर लोकसभा भेजा जाएगा. अब अगर कांग्रेस के साथ सिद्धू का गठबंधन हो भी जाए तो यह सवाल स्वाभाविक तौर पर पूछा जाएगा कि अगर इसी तरह का सियासी मोलभाव करना था तो फिर भाजपा में ही क्या बुराई थी?

हालांकि, कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि अब भी सिद्धू आम आदमी पार्टी के साथ कोई सहमति बनाना चाहते हैं. अलग राजनीतिक मंच की घोषणा और फिर कांग्रेस से गठबंधन की संभावनाओं को सिद्धू द्वारा हवा दिए जाने को कुछ लोग आप पर दबाव बढ़ाने की रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं.

पंजाब चुनावों में बमुश्किल चार महीने का वक्त बचा है लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि सिद्धू इन चुनावों में कहां खड़े हैं. आने वाले दो-तीन हफ्ते बेहद अहम हैं. इनमें यह पता चलेगा कि सिद्धू अपनी दबाव की राजनीति में कामयाब होते हैं या फिर अपनी साढ़े बारह साल की सियासी कमाई को गंवा देने की राह पर थोड़ा और आगे बढ़ जाते हैं.