समाजवादी पार्टी में बीते कुछ दिनों से चल रहा टकराव चरम पर पहुंच गया है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव सहित चार मंत्रियों की कैबिनेट से छुट्टी कर दी है. उधर, पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चाचा-भतीजे के टकराव के दौरान अखिलेश के साथ खड़े अपने भाई रामगोपाल यादव को पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है. इस निष्कासन की घोषणा करने के लिए बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने रामगोपाल की भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री उनके षडयंत्र को नहीं समझ रहे. उधर, रामगोपाल यादव का बयान आया है कि वे सपा में रहें न रहें लेकिन, इस धर्मयुद्ध में अखिलेश के साथ खड़े रहेंगे.

ताजा खबर यह है कि मुलायम सिंह ने अपने घर पर आपात बैठक की है. इसके खत्म होने के बाद बाहर खड़े मीडिया से उनका कहना था, 'जो पूछना है कल पूछिएगा.' इसके बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि सोमवार को कोई बड़ा ऐलान हो सकता है.

फिल्म शोले में हिटलर के जमाने के जेलर असरानी का एक चर्चित डायलॉग था - ‘आधे दाएं जाओ, आधे बाएं और बाकी मेरे पीछे आओ’. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का हाल भी कुछ ऐसा ही हो गया है. पार्टी के युवा एक तरफ बताए जा रहे हैं, पुराने लोग दूसरी तरफ और बाकी किस तरफ हैं किसी को पता नहीं.

हाल के दिनों में जिस तरह की घटनाएं हुई हैं, कहीं न कहीं वे यह भी दिखाती हैं कि अखिलेश झुकने को तैयार नहीं हैं

अब इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह जिस तरफ हैं, प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उस तरफ नहीं हैं और प्रदेश के अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव जिस तरफ हैं अखिलेश उस तरफ भी नहीं हैं. पिता पुत्र के बीच छत्तीस का आंकड़ा कुछ इस तरह बिगड़ता जा रहा है कि हर ओर ये अटकलें लगने लगी हैं कि अखिलेश अंतत: जाएंगे तो किस तरफ जाएंगे?

अखिलेश ने जब राहुल गांधी के खून की दलाली वाले बयान पर समर्थन दिखाया तो यह कहा जाने लगा कि अखिलेश उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अपनी राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं. मगर इसी के साथ यह भी चर्चा भी हो रही है कि अखिलेश की बीजेपी के साथ कुछ खिचड़ी पक सकती है. शिवपाल ने कहा ही कि रामगोपाल यादव की बीजेपी के साथ मिलीभगत है. हाल तक कुछ लोग यह भी मान रहे थे कि यह सब कुछ समय का झगड़ा है और जल्द ही पिता पुत्र के संबंध पटरी पर आ जाएंगे और फिर अखिलेश ही समाजवादी पार्टी के भविष्य का चेहरा घोषित कर दिए जाएंगे. लेकिन अब साफ है कि अखिलेश अब जितना आगे बढ़ चुके हैं वहां से पीछे लौटना उनके लिए असंभव है और अब अपनी आगे की राह वे अपनी इच्छा से ही तय करेंगे.

हाल के दिनों में जिस तरह की घटनाएं हुईं, कहीं न कहीं उनसे यह दिख ही रहा था कि अखिलेश झुकने को तैयार नहीं हैं. मुलायम के ‘मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा बाद में होने’ संबंधी बयान के बाद समाजवादी पार्टी के स्वयंभू प्रोफेसर रामगोपाल यादव का एक पत्र मीडिया में आया. इस पत्र में मुलायम सिंह यादव को चुनौती देते हुए कहा गया कि ‘समाजवादी पार्टी के पतन के लिए नेता जी आप ही जिम्मेदार होंगे. जो जनता समाजवादी पार्टी बनाने के लिए आपकी पूजा करती है वही जनता केवल आपको दोषी ठहराएगी.’ पत्र में यह भी कहा गया कि ‘मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस वक्त निर्विवाद रूप से यूपी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं. पर कुछ दिनों से जो हो रहा है, उससे पार्टी का मतदाता निराश और हताश है. अब उसमें नेतृत्व के प्रति भी आक्रोश पैदा हो रहा है.’

इस पत्र के तुरंत बाद पार्टी के एक उपाध्यक्ष किरणमय नंदा पहली बार लखनऊ में मीडिया से मुखातिब हुए और उन्होंने घोषणा की कि पार्टी का उपाध्यक्ष होने के नाते वे कह रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में अखिलेश ही मुख्यमंत्री का चेहरा रहेंगे. प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव तो लगातार पहले से कह ही रहे थे कि अखिलेश ही पार्टी के भावी मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन इस मामले पर मुलायम ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी. हालांकि इसके बाद मुखिया मुलायम ने खुद सुलह समझौते की एक और कोशिश की. उन्होंने एक एक कर अखिलेश और शिवपाल से बातचीत की और इसके बाद यह तय हुआ कि पांच नवंबर को पार्टी के रजत जयंती समारोह में अखिलेश की उपस्थिति में मुलायम बड़ी घोषणाएं करके सब कुछ ठीक कर देंगे.

जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वयं अखिलेश यादव हैं और नया नया कब्जे में लिया गया यह भवन अब पार्टी के निष्कासित नेताओं का नया अड्डा बन गया है

मगर इस युद्ध विराम समझौते को भी टूटने में देर नहीं लगी. पार्टी के असंतुष्ट, निष्कासित और अखिलेश समर्थकों की एक बैठक नए बने जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट में हुई. इस बैठक में तय हुआ कि पार्टी के युवा संगठन पार्टी के रजत जयंती समारोह का बहिष्कार करेंगे. बैठक में पार्टी से निष्कासित संजय लाठर, आनन्द भदौरिया जैसे अखिलेश समर्थकों के साथ रामगोपाल यादव के भांजे और विधान परिषद सदस्य अरविंद यादव भी शामिल थे. गौरतलब है कि जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वयं अखिलेश यादव हैं और नया-नया कब्जे में लिया गया यह भवन अब पार्टी के निष्कासित नेताओं का नया अड्डा बन गया है. बहिष्कार की इस घोषणा के बाद एक बार फिर अखिलेश समर्थकों के तीखे तेवर सामने आ गए. इस बार यह टकराव पार्टी के सबसे बड़े नेता मुलायम और समाजवादी पार्टी के साथ था. रविवार को अखिलेश ने भी इस टकराव पर मुहर लगा दी जब उन्होंने विधानमंडल की बैठक बुलाई और शिवपाल सहित चार मंत्रियों को कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

बहुत से जानकारों के मुताबिक अब अखिलेश के लिए एक राह पूरी तरह से बगावत करके नई पार्टी की घोषणा करना हो सकती है. अखिलेश के इस दांव से उन्हें सहानुभूति लहर का भी लाभ हो सकता है और इसके जरिए वे चाचा-ताउओं का बोझ भी एक झटके से उतार सकते हैं. उनके नई पार्टी बनाने के दावों को इस बात से भी हवा मिल रही है कि पिछले दिनों अखिलेश के एक करीबी रिश्तेदार ने चुनाव आयोग में जाकर नई पार्टी बनाने और चुनाव चिन्ह हासिल करने की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ की थी. इस संभावना को ही एकमात्र विकल्प मानने वालों का तर्क यह है कि जिस तरह इंदिरा गांधी ने सारे पुराने दिग्गजों को किनारे कर इंदिरा कांग्रेस बनाई और सफलता हासिल की थी ठीक वैसे ही अखिलेश भी इतिहास दोहरा सकते हैं. रविवार को अखिलेश ने विधानमंडल की जो बैठक बुलाई थी उसमें सपा के 229 में से 183 विधायकों के शामिल होने से फिलहाल कई उनका पलड़ा भारी देख रहे हैं.

हालांकि जानकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जिसे इसमें संदेह है. उसके मुताबिक अखिलेश के साथ दिखने वाली युवा टोली में न तो राजनीतिक समझ है न व्यावहारिक चतुराई. यह टोली सिर्फ और सिर्फ हुड़दंगियों की टोली है और इससे जुड़े ज्यादातर चेहरे जमीन हथियाने, गुंडागर्दी और दबंगई के लिए ज्यादा जाने जाते हैं, जमीनी राजनीति के लिए कम. अखिलेश एक मायालोक में जी रहे हैं. कभी लैपटाप में तो कभी राशन कार्डों में अपना चेहरा छपवा कर वे लोकप्रियता बटोरने का जो भ्रम पाल रहे हैं वह वोटों की फसल में बदल पाएगा, इसमें बड़ा संदेह और अनिश्चय है.